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सीटी बजाओ, लोकतंत्र बचाओ: जब दिल्ली पुलिस के सुरों में दब गई जनता की आवाज़

प्रकाशित: 26 September 2026, 5:27 am

धर्मेन्द्र सुन्देशा

हालिया घटना पर व्यंग्य

जंतर-मंतर पर 25 सितंबर की धूप जरा तीखी थी, लेकिन दिल्ली पुलिस की तैयारियों के सामने फीकी पड़ गई। कानून-व्यवस्था का इतना मुस्तैद सुरक्षा चक्र कि हवा भी बिना ‘अनुमति’ के इधर-उधर बहने से कतरा रही थी।

मुख्य चुनाव आयुक्त के इस्तीफे की मांग लेकर पहुंचे छात्र संगठनों और नेताओं को संभालने का तरीका इस बार ऐतिहासिक था। पुलिसकर्मियों के होठों पर सीटियां थीं, और फेफड़ों में लोकतंत्र को सुरक्षा देने का अटूट जज्बा। जैसे ही किसी प्रदर्शनकारी ने अपना गला साफ किया या किसी पत्रकार ने माइक आगे बढ़ाकर “आपकी मांग क्या है?” पूछना चाहा, सुर-संग्राम शुरू हो गया।

पीऽऽऽऽऽऽ! पीऽऽऽऽऽऽ!

उधर से छात्र चिल्लाए—”न्याय…” इधर से सीटी गूंजी—”पीऽऽऽऽ!”

पत्रकार ने पूछा—”सर, रिकॉर्डिंग…” पुलिस ने सीटी में और जोर भरा—”पीऽऽऽऽऽऽऽऽ!”

क्या अद्भुत विचार है! ना लाठी चलाने की झंझट, ना वाटर कैनन का पानी बर्बाद करने की जरूरत। सीधा ‘संगीत थेरेपी’ से विरोध का इलाज। इस मामले में तो भारतीय पुलिस ने अमेरिका और यूरोप के देशों को भी मीलों पीछे छोड़ दिया है। जहाँ वे लाठी-डंडों और रबर की गोलियों के पुराने तरीकों पर अटके हैं, हमारी पुलिस ने प्रदर्शनकारियों को नियंत्रित करने का एक बिल्कुल नया, अहिंसक और बेहद ‘सुरीला’ तरीका ईजाद कर लिया है।

आखिरकार, अगर सामने वाला कुछ बोल ही नहीं पाएगा, तो सुना कैसे जाएगा? वैसे भी, जब सरकार ही इतनी गहरी नींद में या ‘कान बंद’ करके बैठी हो कि उसे जनता की चीखें-पुकारें सुनाई न दें, तो पुलिस बेचारी भी क्या करे? उसने सोच लिया होगा कि जब ऊपर कुछ सुनाई नहीं दे रहा, तो नीचे भी किसी को कुछ सुनाई नहीं देना चाहिए। जब बहरेपन का ऐसा राष्ट्रीय माहौल हो, तो सीटी बजाना ही सबसे निष्पक्ष राष्ट्रीय ध्वज-गीत बन जाता है।

पत्रकारों के माइक संभालने और कैमरे ऑन करने की कोशिशों को बड़े प्यार से संभाला गया। कुछ के उपकरण सुरक्षा कारणों से (या शायद सीटी की तेज आवाज से टूटने से बचाने के लिए) जमा कर लिए गए, तो कुछ को बस यह अहसास कराने के लिए हिरासत में लिया गया कि ‘रिपोर्टिंग’ से ज्यादा जरूरी ‘विश्राम’ है। पुलिस ने बड़े साफ शब्दों में कह ही दिया है कि मीडिया के साथ कोई बदसलूकी नहीं हुई—वह तो बस हवा में तैरती सीटी की धुन थी, जिसे पत्रकारों ने गलती से अपनी आवाज दबाना समझ लिया।

90 से अधिक लोगों को बस में बिठाकर अलग-अलग थानों की सैर पर ले जाया गया। देवेंद्र यादव हों या दीपांकर भट्टाचार्य, सबको यह मुफ्त सैर इसलिए मिली क्योंकि उन्होंने ‘अनुमति’ नहीं ली थी।

लोकतंत्र में सवाल पूछने की अनुमति मांगना कितना जरूरी है, यह उन सीटियों ने बहुत सुरीले अंदाज में समझा दिया। अब जंतर-मंतर पर सन्नाटा है, या शायद कानों में अभी भी वही एक ही धुन गूंज रही है—पीऽऽऽऽऽऽ!