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कच्चा तेल 102 डॉलर के पार, परिवहन और उत्पादन लागत बढ़ने का खतरा
नई दिल्ली। मध्य-पूर्व में बढ़ते तनाव के कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार में ब्रेंट कच्चे तेल की कीमत 102 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर पहुँच गई है। महंगा कच्चा तेल भारत में परिवहन, प्लास्टिक, पेंट, रसायन, पैकेजिंग और विभिन्न औद्योगिक उत्पादों की लागत बढ़ा सकता है।
इसका प्रभाव मार्बल-ग्रेनाइट, स्टील, सीमेंट, पाइप और अन्य भारी सामग्री के व्यापार पर भी पड़ने की आशंका है। लंबी दूरी तक माल भेजने वाले कारोबारियों के लिए मालभाड़ा बढ़ सकता है। ऐसे में व्यापारियों के लिए बड़े और दीर्घकालीन ऑर्डर स्वीकार करते समय परिवहन लागत तथा ईंधन की कीमत में बदलाव की शर्त स्पष्ट रखना उपयोगी होगा।
डॉलर के मुकाबले रुपया कमजोर, आयातित सामान महंगा होने की आशंका
मुंबई। अमेरिकी डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपया लगातार तीसरे कारोबारी सत्र में कमजोर होकर 95.44 रुपये प्रति डॉलर पर बंद हुआ। कच्चे तेल की बढ़ती कीमत, आयातकों की डॉलर माँग और वैश्विक बाजारों में अस्थिरता को रुपये की गिरावट के प्रमुख कारणों में शामिल किया गया है।
कमजोर रुपये से आयातित मशीनरी, इलेक्ट्रॉनिक उपकरण, मोबाइल एवं उसके पुर्जे, सोलर उपकरण, प्लास्टिक का कच्चा माल, विदेशी रसायन और कुछ धातुएँ महंगी हो सकती हैं। आयात आधारित कारोबारियों को नए ऑर्डर का मूल्य तय करते समय विनिमय दर के जोखिम का ध्यान रखना होगा। दूसरी ओर, निर्यातकों को डॉलर में प्राप्त राशि के बदले अधिक रुपये मिलने का लाभ हो सकता है।
बाजार से अतिरिक्त नकदी घटाने के लिए RBI ने किया डॉलर-रुपया स्वैप
मुंबई। भारतीय रिजर्व बैंक ने रुपये पर बढ़ते दबाव के बीच लगातार दूसरे दिन डॉलर-रुपया ‘सेल-बाय स्वैप’ का सहारा लिया। इसके माध्यम से बाजार में उपलब्ध अतिरिक्त रुपये की तरलता कम करने का प्रयास किया गया है।
इस कार्रवाई के बाद विदेशी मुद्रा बाजार में फॉरवर्ड डॉलर प्रीमियम बढ़ा है। एक वर्षीय वार्षिक फॉरवर्ड दर लगभग 3.37 प्रतिशत तक पहुँच गई। इससे भविष्य में किए जाने वाले डॉलर भुगतान को पहले से सुरक्षित करने की लागत बढ़ सकती है। आयातकों के लिए मुद्रा जोखिम से बचाव महंगा हो सकता है, जबकि निर्यातकों को अपनी भावी डॉलर आय बेचने के बेहतर अवसर मिल सकते हैं।
GST परिषद की 57वीं बैठक अब 7 अक्टूबर को प्रस्तावित
नई दिल्ली। वस्तु एवं सेवा कर परिषद की 57वीं बैठक अब 7 अक्टूबर 2026 को प्रस्तावित है। बैठक में GST संबंधी मुकदमेबाजी कम करने, इनपुट टैक्स क्रेडिट से जुड़ी समस्याओं का समाधान करने और पंजीयन प्रक्रिया को सरल बनाने जैसे विषयों पर विचार होने की संभावना है।
बड़े कारोबारियों के लिए समान GST पंजीयन प्रक्रिया विकसित करने पर भी चर्चा की जा सकती है। फिलहाल किसी नई GST दर अथवा नियम में बदलाव की अंतिम घोषणा नहीं हुई है। व्यापारियों को परिषद के आधिकारिक निर्णय से पहले अपुष्ट सूचनाओं के आधार पर बिलिंग अथवा मूल्य निर्धारण व्यवस्था में परिवर्तन करने से बचना चाहिए।
त्योहारों से पहले चीनी की आपूर्ति बढ़ाने के निर्देश
नई दिल्ली। केंद्र सरकार ने चीनी मिलों से त्योहारों के दौरान बाजार में पर्याप्त आपूर्ति बनाए रखने और उचित कीमत पर चीनी उपलब्ध कराने को कहा है। सरकार ने कीमतों में असामान्य वृद्धि के पीछे जमाखोरी को भी एक कारण बताया है और आवश्यकता पड़ने पर सुधारात्मक कार्रवाई का संकेत दिया है।
घरेलू उपलब्धता बढ़ाने के लिए दस लाख टन चीनी के शुल्क-मुक्त आयात की अनुमति दी गई है। इसमें लगभग आठ लाख टन के आयात के लिए आवेदन प्राप्त होने की जानकारी सामने आई है। सरकारी कदम से किराना, मिठाई, बेकरी, होटल और खाद्य प्रसंस्करण कारोबारियों को राहत मिलने की संभावना है। हालांकि त्योहारों की माँग के कारण थोक कीमतों में तत्काल बड़ी गिरावट निश्चित नहीं मानी जा रही।
शेयर बाजार की नई क्लोजिंग ऑक्शन व्यवस्था में तेज उतार-चढ़ाव
मुंबई। भारतीय शेयर बाजार में नई क्लोजिंग ऑक्शन व्यवस्था लागू होने के बाद कारोबार के अंतिम चरण में तेज उतार-चढ़ाव देखने को मिल रहा है। नियमित कारोबार के बाद मामूली कमजोरी में रहे सेंसेक्स और निफ्टी में नीलामी सत्र के दौरान अचानक एक प्रतिशत से अधिक की तेजी आई, लेकिन दोनों सूचकांक अंत में सीमित बढ़त पर बंद हुए।
क्लोजिंग ऑक्शन के दौरान अपेक्षाकृत कम खरीद-बिक्री होने से भावों में अचानक बड़ा परिवर्तन हो सकता है। बाजार विशेषज्ञों के अनुसार छोटे निवेशकों को अंतिम नीलामी सत्र के दौरान बिना निर्धारित मूल्य वाले ‘मार्केट ऑर्डर’ देने में सावधानी रखनी चाहिए। निर्धारित भाव वाले ‘लिमिट ऑर्डर’ से अप्रत्याशित कीमत पर सौदा होने का जोखिम घटाया जा सकता है।
वित्त और बुनियादी ढाँचे की कमी से जूझ रहे राजस्थान के छोटे उद्योग
जयपुर। राजस्थान के सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्योगों के विस्तार में वित्त तक सीमित पहुँच, कमजोर औद्योगिक बुनियादी ढाँचा, विभागीय समन्वय की कमी और नीतियों का असमान क्रियान्वयन बड़ी बाधाओं के रूप में सामने आए हैं।
प्रदेश में निवेश आकर्षित करने और MSME को प्रोत्साहन देने के लिए कई नीतियाँ लागू हैं, लेकिन उद्योग जगत का कहना है कि जमीनी स्तर पर ऋण, औद्योगिक भूमि, बिजली, परिवहन और समयबद्ध स्वीकृतियाँ मिलने में कठिनाई बनी हुई है। इसका प्रभाव मार्बल-ग्रेनाइट, हस्तशिल्प, वस्त्र, खनिज, कृषि प्रसंस्करण और सूक्ष्म विनिर्माण इकाइयों पर पड़ रहा है। कारोबारियों ने एकल-खिड़की व्यवस्था को अधिक प्रभावी बनाने और वित्तीय सहायता तक आसान पहुँच की आवश्यकता बताई है।

