ब्रेकिंग न्यूज़
अनंत चतुर्दशी 2026
युवा अभिव्यक्ति एवं रोचक तथ्य

वीर विक्रमादित्य की अमर कथाएँ : अंक 3

प्रकाशित: 9 September 2026, 4:03 pm

बेताल पच्चीसी

आज की कथा: सबसे महान त्याग किसका?

उज्जयिनी के परम प्रतापी राजा विक्रमादित्य अपने साहस, न्यायप्रियता और प्रजावत्सलता के लिए प्रसिद्ध थे। वे कठिन से कठिन परिस्थिति में भी सत्य और धर्म का मार्ग नहीं छोड़ते थे। एक योगी को दिए वचन के अनुसार वे हर रात श्मशान में स्थित वृक्ष से बेताल को उतारकर अपने कंधे पर बैठाते और उसे योगी के पास ले जाने का प्रयास करते। रास्ते में बेताल एक कथा सुनाता और अंत में प्रश्न पूछता। सही उत्तर जानते हुए भी मौन रहने पर राजा का सिर फट जाने की चेतावनी के कारण विक्रम को उत्तर देना पड़ता और बेताल फिर उड़कर उसी वृक्ष पर जा लटकता।

एक बार राजा विक्रमादित्य बेताल को वृक्ष से उतारकर कंधे पर डालकर चल पड़े। कुछ दूर जाने पर बेताल बोला, “राजन! मार्ग लंबा है। समय काटने के लिए मैं तुम्हें त्याग और स्वामिभक्ति की एक कथा सुनाता हूँ।”

बहुत समय पहले वर्धमान नामक राज्य में राजा रूपसेन का शासन था। वह वीर, न्यायप्रिय और प्रजा का हित चाहने वाला शासक था। उसी नगर में वीरवर नाम का एक पराक्रमी युवक आया। उसने राजदरबार में उपस्थित होकर कहा, “महाराज! मैं आपकी सेवा करना चाहता हूँ। मैं हर परिस्थिति में आपके प्राण और राज्य की रक्षा करूँगा।”

राजा ने उसकी योग्यता परखकर उसे अपना अंगरक्षक नियुक्त कर लिया। वीरवर को प्रतिदिन अच्छा वेतन मिलता था, लेकिन वह उस धन का अधिकांश भाग देवपूजा, ब्राह्मणों, निर्धनों और जरूरतमंद लोगों की सहायता में खर्च कर देता था। शेष धन से अपने परिवार का पालन करता। उसके परिवार में पत्नी धर्मवती, पुत्र शक्तिधर और एक पुत्री थी।

वीरवर रात-दिन राजा की सुरक्षा में तैनात रहता। वर्षा, सर्दी अथवा गर्मी—किसी भी परिस्थिति में वह अपने कर्तव्य से पीछे नहीं हटता था।

एक रात घनघोर वर्षा हो रही थी। चारों ओर अंधकार छाया हुआ था। राजा रूपसेन ने महल के बाहर से किसी स्त्री के रोने की आवाज सुनी। राजा ने वीरवर को बुलाकर आदेश दिया, “पता लगाओ कि आधी रात में कौन स्त्री रो रही है और उसके दुःख का कारण क्या है।”

वीरवर तलवार लेकर आवाज की दिशा में चल पड़ा। राजा को उसके साहस और निष्ठा की परीक्षा लेने की इच्छा हुई, इसलिए वह भी कुछ दूरी बनाकर चुपचाप उसके पीछे चल दिया।

वीरवर नगर से बाहर पहुँचा तो उसने आभूषणों से सजी एक दिव्य स्त्री को विलाप करते देखा। उसने पूछा, “देवी! आप कौन हैं और क्यों रो रही हैं?”

स्त्री ने उत्तर दिया, “मैं इस राज्य की राजलक्ष्मी हूँ। राजा रूपसेन धर्मात्मा शासक हैं, लेकिन तीन दिन बाद उनकी मृत्यु होने वाली है। राजा के निधन के बाद इस राज्य की समृद्धि और सुख-शांति समाप्त हो जाएगी। इसी कारण मैं रो रही हूँ।”

वीरवर ने व्याकुल होकर पूछा, “क्या महाराज के प्राण बचाने का कोई उपाय नहीं है?”

राजलक्ष्मी ने कहा, “एक उपाय है, लेकिन वह अत्यंत कठिन है। नगर के बाहर स्थित देवी के मंदिर में यदि कोई पिता स्वेच्छा से अपने पुत्र का बलिदान चढ़ाए तो राजा की मृत्यु टल सकती है और वे सौ वर्षों तक जीवित रह सकते हैं।”

इतना कहकर वह स्त्री अदृश्य हो गई।

वीरवर तुरंत अपने घर पहुँचा। उसने पत्नी और बच्चों को जगाकर सारी बात बताई। पिता की बात सुनकर पुत्र शक्तिधर ने बिना किसी भय के कहा, “पिताजी! हमारा जीवन राजा और राज्य की रक्षा के लिए ही है। यदि मेरे प्राण देने से धर्मात्मा राजा का जीवन बच सकता है और हजारों प्रजाजनों का कल्याण हो सकता है, तो इससे बड़ा सौभाग्य मेरे लिए क्या होगा?”

माता धर्मवती ने आँसू रोकते हुए कहा, “पुत्र ने धर्म का मार्ग चुना है। मैं उसके निर्णय में बाधा नहीं बनूँगी।”

पूरा परिवार देवी के मंदिर पहुँचा। उनके पीछे छिपकर राजा रूपसेन भी यह सब देख रहा था।

मंदिर में शक्तिधर ने देवी को प्रणाम किया और कहा, “हे माता! मेरे जीवन के बदले हमारे महाराज की रक्षा कीजिए। उनका जीवन प्रजा के लिए आवश्यक है।”

वीरवर ने भारी मन से अपने पुत्र का बलिदान दे दिया।

भाई को मृत देखकर वीरवर की पुत्री असहनीय दुःख में डूब गई। उसने कहा, “जिस भाई के बिना मेरा जीवन निरर्थक है, उसके बिना मैं जीवित नहीं रह सकती।” उसने भी अपने प्राण त्याग दिए।

दोनों बच्चों को मृत देखकर धर्मवती ने पति से कहा, “हमारी संतानें चली गईं। अब मेरे जीवन का भी कोई प्रयोजन नहीं रहा। आप मुझे भी उनके साथ जाने की अनुमति दें।” इतना कहकर उसने भी प्राण त्याग दिए।

पत्नी और दोनों बच्चों को मृत देखकर वीरवर कुछ समय मौन खड़ा रहा। फिर उसने विचार किया, “जिस परिवार का पालन करना मेरा कर्तव्य था, वह पूरा परिवार राजा की रक्षा के लिए बलिदान हो चुका है। अब मेरे अकेले जीवित रहने का कोई अर्थ नहीं है।”

उसने देवी को प्रणाम किया और अपनी तलवार से स्वयं का भी बलिदान कर दिया।

यह सब देखकर राजा रूपसेन स्तब्ध रह गया। उसकी आँखों से आँसू बहने लगे। उसने सोचा, “मेरे जीवन की रक्षा के लिए मेरे सेवक ने अपना पूरा परिवार समाप्त कर दिया। ऐसे निष्ठावान सेवक के बिना मुझे जीवित रहने का कोई अधिकार नहीं है।”

राजा ने तलवार उठाई और अपने प्राण त्यागने के लिए तैयार हो गया। उसी क्षण देवी प्रकट हुईं। उन्होंने राजा का हाथ पकड़ लिया और कहा, “राजन! मैं तुम्हारी प्रजावत्सलता और अपने सेवक के प्रति प्रेम से प्रसन्न हूँ। वर माँगो।”

राजा ने हाथ जोड़कर कहा, “देवी! मुझे अपने लिए कुछ नहीं चाहिए। यदि आप प्रसन्न हैं तो वीरवर, उसकी पत्नी और उसके दोनों बच्चों को पुनः जीवित कर दीजिए।”

देवी ने राजा की प्रार्थना स्वीकार कर ली। उनके आशीर्वाद से वीरवर और उसका पूरा परिवार पुनर्जीवित हो गया। राजा उन्हें जीवित देखकर अत्यंत प्रसन्न हुआ। उसने वीरवर को सम्मानित कर राज्य में ऊँचा पद प्रदान किया।

कथा सुनाकर बेताल ने पूछा, “राजन! इस कथा में सबसे महान त्याग किसका था—पुत्र शक्तिधर का, माता धर्मवती का, वीरवर का अथवा राजा रूपसेन का?”

राजा विक्रमादित्य ने उत्तर दिया, “बेताल! शक्तिधर ने अपने पिता की आज्ञा और राजधर्म के लिए प्राण दिए। धर्मवती ने पत्नी और माता का धर्म निभाया। वीरवर राजा का सेवक था, इसलिए उसने स्वामिभक्ति में अपना सर्वस्व अर्पित किया। इन सभी के त्याग महान थे, लेकिन सबसे महान त्याग राजा रूपसेन का था।”

बेताल ने पूछा, “वह कैसे?”

विक्रम ने कहा, “राजा रूपसेन चाहता तो वीरवर के परिवार के बलिदान से मिले जीवन को स्वीकार कर सकता था। फिर भी वह अपने सेवक और उसके परिवार के लिए स्वयं के प्राण त्यागने को तैयार हो गया। राजा होकर सेवक के लिए अपना जीवन अर्पित करना उसके कर्तव्य की अनिवार्यता नहीं थी। उसका निर्णय करुणा, कृतज्ञता और न्याय से उत्पन्न हुआ था। इसलिए उसका त्याग सबसे महान था।”

बेताल हँसकर बोला, “राजन! तुमने एक बार फिर सही न्याय किया, लेकिन उत्तर देकर अपना मौन तोड़ दिया।”

इतना कहकर बेताल राजा के कंधे से उड़ गया और वापस उसी श्मशान के वृक्ष पर जाकर उल्टा लटक गया। राजा विक्रमादित्य बिना विचलित हुए फिर उसे लेने के लिए वृक्ष की ओर चल पड़े।

कथा का संदेश

सच्चा नेतृत्व केवल दूसरों से त्याग माँगने में नहीं, बल्कि आवश्यकता पड़ने पर अपने सहयोगियों और सेवकों के लिए स्वयं त्याग करने में दिखाई देता है। कर्तव्यनिष्ठ व्यक्ति का सम्मान करना और उसके उपकार के प्रति कृतज्ञ रहना ही श्रेष्ठ शासक तथा श्रेष्ठ मनुष्य की पहचान है।