ब्रेकिंग न्यूज़
देश-विदेश समाचार

प्रमुख राष्ट्रीय/अंतर्राष्ट्रीय समाचार

प्रकाशित: 1 September 2026, 4:19 pm

धीमी शुरुआत के बाद ‘हनुमान अंश’ बनी बड़ी सफलता, 50 करोड़ के पार पहुंची कमाई

मुंबई। प्रसिद्ध संत नीम करोली बाबा के जीवन और शिक्षाओं से प्रेरित फिल्म हनुमान अंश ने बॉक्स ऑफिस पर धीमी शुरुआत के बाद असाधारण वापसी की है। करीब दो करोड़ रुपये के सीमित बजट में बनी इस फिल्म ने प्रदर्शन के 25वें दिन तक भारत में लगभग 53.82 करोड़ रुपये की सकल कमाई कर ली। फिल्म की भारतीय नेट कमाई करीब 45.63 करोड़ रुपये बताई गई है।

विशाल चतुर्वेदी के निर्देशन में बनी फिल्म ने पहले दिन केवल करीब 10 लाख रुपये की कमाई की थी। प्रारंभिक दिनों में इसे अपेक्षित दर्शक नहीं मिले, लेकिन दूसरे सप्ताह के बाद दर्शकों की मौखिक प्रशंसा और सोशल मीडिया पर हुई चर्चा से फिल्म की कमाई तेजी से बढ़ने लगी। बड़ी फिल्मों की प्रतिस्पर्धा के बीच भी हनुमान अंश सिनेमाघरों में बनी रही।

फिल्म के संगीत ने भी इसकी सफलता में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। दृष्टिबाधित बुंदेली लोकगायक सुनील लोधी का गाया गीत “मैंने तेरे ही भरोसे” दर्शकों के बीच लोकप्रिय हुआ। सीमित बजट और मामूली शुरुआत के बावजूद लगातार बढ़ी दर्शक संख्या ने हनुमान अंश को वर्ष की उल्लेखनीय सफल फिल्मों में शामिल कर दिया है।

ग्रैमी विजेता रिकी केज ने घोषित किया ‘डमरूह’ संगीत दौरा, अक्टूबर से होगा प्रारंभ

नई दिल्ली। तीन बार ग्रैमी पुरस्कार जीत चुके भारतीय संगीतकार रिकी केज ने अपने नए बहु-शहरी भारतीय संगीत दौरे “डमरूह—डांस टू द कॉस्मिक स्पिरिट” की घोषणा की है। यह संगीत दौरा अक्टूबर 2026 से शुरू होकर दिसंबर तक चलेगा। इसके अंतर्गत देश के विभिन्न शहरों में बड़े स्तर के संगीत कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे।

“डमरूह” को पारंपरिक संगीत समारोह से अलग एक व्यापक दृश्य और श्रव्य अनुभव के रूप में तैयार किया जा रहा है। इसमें सिम्फनी ऑर्केस्ट्रा, इलेक्ट्रॉनिक संगीत, भारतीय लय, मंत्रों और आध्यात्मिक ध्वनियों का संयोजन प्रस्तुत किया जाएगा। कार्यक्रम का उद्देश्य भारतीय संगीत परंपराओं को आधुनिक वैश्विक संगीत शैली के साथ जोड़ना है।

पद्मश्री से सम्मानित रिकी केज पर्यावरण और प्रकृति से जुड़े अपने संगीत के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचाने जाते हैं। वह संयुक्त राष्ट्र के सद्भावना दूत भी हैं। दौरे के शहरों, कार्यक्रमों की तारीखों, आयोजन स्थलों और टिकटों से संबंधित विस्तृत जानकारी चरणबद्ध रूप से घोषित की जाएगी।

भारतीय आध्यात्मिक संगीत को आधुनिक तकनीक और बड़े मंच की प्रस्तुति से जोड़ने के कारण “डमरूह” को इस वर्ष के प्रमुख संगीत आयोजनों में शामिल किया जा रहा है। हिंदुस्तान टाइम्स

नाउरू ने औपनिवेशिक नाम छोड़ अपनाया पारंपरिक नाम ‘नाओएरो’

नाओएरो। प्रशांत महासागर में स्थित दुनिया के तीसरे सबसे छोटे देश नाउरू ने अपना आधिकारिक नाम बदलकर “रिपब्लिक ऑफ नाओएरो” कर लिया है। देश की संसद द्वारा मई 2026 में पारित संवैधानिक संशोधन के माध्यम से यह परिवर्तन किया गया। सरकार ने नाम परिवर्तन को अपनी मूल भाषा, सांस्कृतिक विरासत और राष्ट्रीय पहचान के संरक्षण की दिशा में महत्त्वपूर्ण कदम बताया है।

“नाओएरो” इस द्वीपीय देश का पारंपरिक स्थानीय नाम है। यूरोपीय उपनिवेशवाद के दौरान स्थानीय उच्चारण को ठीक से नहीं बोल पाने के कारण यह नाम धीरे-धीरे “नाउरू” के रूप में प्रचलित हो गया था। अब देश ने उसी स्थानीय नाम को दोबारा अपनी आधिकारिक पहचान बनाया है, जिसका उपयोग वहां के लोग लंबे समय से दैनिक जीवन में करते रहे हैं।

नई व्यवस्था के अंतर्गत देश का संक्षिप्त नाम “नाओएरो”, अंतरराष्ट्रीय कोड “NRO” और नागरिकों के लिए “देई-नाओएरो” संबोधन अपनाया जाएगा। लगभग 12 हजार की आबादी वाले इस देश की सरकार ने अंतरराष्ट्रीय संगठनों और दूसरे देशों को परिवर्तन की सूचना देना शुरू कर दिया है। आधिकारिक सरकारी वेबसाइट पर भी “द गवर्नमेंट ऑफ द रिपब्लिक ऑफ नाओएरो” नाम प्रदर्शित किया जा रहा है।

भीषण गर्मी ने स्पेन में लौटाया सदियों पुराना ‘अबानिको’, युवाओं में भी बढ़ा आकर्षण

मैड्रिड। पश्चिमी यूरोप में लगातार चली भीषण गर्मी के बीच स्पेन का सदियों पुराना मोड़कर रखा जाने वाला हाथ का पंखा “अबानिको” एक बार फिर लोगों की पसंद बन गया है। मैड्रिड की मेट्रो, संगीत समारोहों, बाजारों और सार्वजनिक स्थलों पर हर आयु के लोग इन रंग-बिरंगे पंखों का इस्तेमाल करते दिखाई दे रहे हैं।

छोटे आकार के कारण अबानिको को आसानी से जेब या बैग में रखा जा सकता है। बिजली अथवा बैटरी की आवश्यकता नहीं होने के कारण यह गर्मी से राहत पाने का सरल और पर्यावरण अनुकूल साधन भी है। कभी इसे मुख्यतः महिलाओं और फ्लेमेंको नृत्य से जोड़कर देखा जाता था, लेकिन अब पुरुष और युवा भी इसे उपयोगिता और फैशन—दोनों के लिए अपना रहे हैं।

हाथ के पंखे की शुरुआत एशिया में मानी जाती है। पुर्तगाली व्यापारियों के माध्यम से यह 15वीं और 16वीं शताब्दी में यूरोप पहुंचा और धीरे-धीरे स्पेनिश संस्कृति का हिस्सा बन गया। मैड्रिड और वेलेंसिया हस्तनिर्मित पंखों के प्रमुख केंद्र रहे हैं।

स्पेन में सामान्य पंखों के साथ हाथ से तैयार कलात्मक अबानिको भी बिकते हैं, जिनकी कीमत हजारों यूरो तक पहुंच सकती है। बढ़ते तापमान ने इस पारंपरिक वस्तु को फिर उपयोगी और लोकप्रिय बना दिया है।

भोजन पहुंचाने वाला रोबोट देखकर हैरान हुए भारतीय माता-पिता, प्रतिक्रिया ने जीता लोगों का दिल

वाशिंगटन। अमेरिका में अपनी बेटी के पास पहुंचे भारतीय माता-पिता की भोजन पहुंचाने वाले रोबोट को देखकर दी गई सहज प्रतिक्रिया सोशल मीडिया पर लोगों को खूब पसंद आ रही है। वीडियो में एक छोटा स्वचालित रोबोट सड़क के किनारे बने पैदल मार्ग पर भोजन लेकर चलता दिखाई देता है। उसे देखकर दंपती पहले आश्चर्य में पड़ जाते हैं और फिर उत्सुकता से पलटकर उसे आगे जाते देखते हैं।

वीडियो साझा करने वाली भारतीय महिला ने अपने माता-पिता की पहली प्रतिक्रिया को कैमरे में रिकॉर्ड किया। रोबोट को देखकर उनके चेहरे पर दिखाई देने वाला आश्चर्य, उलझन और उत्साह वीडियो का सबसे रोचक हिस्सा बन गया। सोशल मीडिया पर लोगों ने इसे नई तकनीक से पुराने और नए अनुभवों के मिलन का सहज पारिवारिक क्षण बताया।

अमेरिका के कई शहरों और विश्वविद्यालय परिसरों में छोटी दूरी के लिए स्वचालित भोजन वितरण रोबोटों का इस्तेमाल बढ़ रहा है। ये रोबोट कैमरे, सेंसर, डिजिटल नक्शे और कृत्रिम बुद्धिमत्ता की सहायता से पैदल मार्ग पर चलते हुए ग्राहक तक सामान पहुंचाते हैं।

तकनीक की जटिल जानकारी के बजाय माता-पिता की स्वाभाविक प्रतिक्रिया ने वीडियो को मनोरंजक बनाया। इसे देखने वाले अनेक भारतीय उपयोगकर्ताओं ने अपने माता-पिता के ऐसे ही संभावित अनुभवों से इसकी तुलना की।