तथाकथित गुरु, अंधभक्ति और ‘गुरु आत्माराम’
एक बार मेरे मित्र मुझे अपने तथाकथित ज्ञानी गुरु के आश्रम ले गए। वहाँ हज़ारों लोग एक देहधारी के चरणों में सिर झुकाए खड़े थे। जब गुरु जी ने मुझसे पूछा कि मैं अज्ञानी की तरह दूर क्यों खड़ा हूँ, तो मैंने उनके सामने एक कड़वा प्रश्न रखा:
“गुरु जी, यदि चेला अपना पूरा जीवन गुरु को सौंप दे और बाद में गुरु कपटी या अज्ञानी निकले, तो चेले के बर्बाद जीवन का ज़िम्मेदार कौन?”
गुरु जी ने चालाकी से कहा— “बेटा, गुरु का कर्म गुरु जाने, चेले को देखने की ज़रूरत नहीं।”
उनकी इस चालाकी पर मैंने अपना अंतिम और निर्णायक प्रश्न दागा:
“गुरु जी, यदि अज्ञानी या कपटी गुरु से चेले को कोई फ़र्क नहीं पड़ता—तो फिर आप मुझे अपना गुरु बना लीजिए, आपको क्या फ़र्क पड़ता है?”
बस, उस एक प्रश्न ने पूरे आश्रम में सन्नाटा छा दिया। जिसके पास हज़ारों उपदेश थे, उस कड़वे सत्य के सामने उसकी जुबाँ बंद हो गई।
कड़वा सच:
जो आपको स्वयं से बाँधे, वह गुरु नहीं, केवल अंधभक्ति का व्यापारी है। सच्चा गुरु वह है जो आपको आपके भीतर बैठे ‘विवेक’ (गुरु आत्माराम) के सामने खड़ा कर दे।
शिवम् सत्य सुंदरम शिवोहम शिवोहम शिवोहम
प्रस्तुति- सुरेश कुमार माली, चेन्नई
