जब बीमारी भी बन जाए कमाई का जरिया: चिकित्सा क्षेत्र में फर्जीवाड़े पर सरकारी जांचों ने उठाए गंभीर सवाल
आलेख:- महिपाल सिंह (सह-संपादक)
फर्जी डॉक्टर से लेकर संदिग्ध आयुष्मान कार्ड तक—NHRC, केंद्र सरकार और CAG के रिकॉर्ड बताते हैं कि मरीजों का भरोसा बचाने के लिए निगरानी और पारदर्शिता कितनी जरूरी
चिकित्सक और अस्पताल पर मरीज का भरोसा चिकित्सा व्यवस्था की बुनियाद है। मरीज सामान्यतः यह मानकर चलता है कि उसकी जांच रिपोर्ट सही है, डॉक्टर योग्य है और जिस ऑपरेशन या महंगे इलाज की सलाह दी जा रही है, उसकी वास्तव में आवश्यकता है। लेकिन देश में सामने आए कुछ आधिकारिक मामले बताते हैं कि इसी भरोसे का दुरुपयोग होने पर मरीज की जेब के साथ उसकी जान भी खतरे में पड़ सकती है।
दमोह में फर्जी कार्डियोलॉजिस्ट का मामला
मध्य प्रदेश के दमोह स्थित मिशन अस्पताल का मामला बेहद गंभीर उदाहरण है। राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग (NHRC) ने 7 जुलाई 2025 को जारी अपनी जांच रिपोर्ट में कहा कि अस्पताल में एक फर्जी डॉक्टर के कार्डियोलॉजिस्ट के रूप में काम करने के मामले में कई अनियमितताएं पाई गईं।
NHRC ने उपचार के बाद मृत्यु हुई सात मरीजों के परिजनों को 10-10 लाख रुपये की राहत देने की सिफारिश की। आयोग ने डॉक्टर और अस्पताल मालिक के खिलाफ FIR सहित आवश्यक कानूनी कार्रवाई तथा अस्पताल के लाइसेंस को मामले के अंतिम निस्तारण तक रद्द करने की भी सिफारिश की।
इतना ही नहीं, आयोग ने मध्य प्रदेश में कार्यरत Cath Labs में डॉक्टरों की योग्यता सत्यापित कराने तथा मिशन अस्पताल द्वारा आयुष्मान भारत योजना के संभावित दुरुपयोग की आर्थिक अपराध शाखा और आयकर विभाग से जांच कराने की सिफारिश भी की।
आयुष्मान योजना में 3,167 अस्पतालों पर कार्रवाई
यह समस्या किसी एक अस्पताल तक सीमित नहीं है। केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय ने 19 अगस्त 2025 को राज्यसभा में बताया कि आयुष्मान भारत-प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना की शुरुआत से उस समय तक 3,167 अस्पताल अनियमितताओं अथवा उल्लंघनों के दोषी पाए गए।
इनमें 1,114 अस्पतालों को योजना के पैनल से बाहर किया गया, 549 अस्पतालों को निलंबित किया गया और 1,504 अस्पतालों पर कुल ₹122 करोड़ का जुर्माना लगाया गया।
सरकार ने बताया कि धोखाधड़ी और योजना के दुरुपयोग की पहचान तथा जांच के लिए National Anti-Fraud Unit और State Anti-Fraud Units काम कर रही हैं।
जिन आयुष्मान कार्डों का रिकॉर्ड नहीं, उन पर भी भुगतान
बिहार में CAG की Performance Audit Report ने एक और चौंकाने वाला तथ्य सामने रखा। ऑडिट में पाया गया कि 139 आयुष्मान कार्डों पर ₹25.25 लाख का भुगतान किया गया, जबकि जांच में ये कार्ड न संबंधित BIS डेटाबेस में मिले और न योजना के Beneficiary Portal पर।
CAG ने स्पष्ट रूप से कहा कि इन 139 कार्डों के आधार पर किए गए ₹25.25 लाख के भुगतान के संदिग्ध होने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता। संबंधित राज्य एजेंसी ने मामला National Health Authority को भेजे जाने की जानकारी दी।
मरीज के भरोसे की रक्षा सबसे जरूरी
इन मामलों से पूरे चिकित्सा क्षेत्र को संदेह की नजर से देखना उचित नहीं है। देश में लाखों डॉक्टर और स्वास्थ्यकर्मी पूरी निष्ठा से मरीजों का उपचार करते हैं। लेकिन कुछ गंभीर मामले यह बताते हैं कि डॉक्टर की योग्यता, जांच रिपोर्ट, महंगे इलाज की आवश्यकता और सरकारी स्वास्थ्य योजनाओं के दावों की मजबूत निगरानी जरूरी है।
मरीजों को भी जहां संभव हो, बड़ी सर्जरी या अत्यधिक महंगे इलाज से पहले जांच रिपोर्ट की प्रति लेने, डॉक्टर की योग्यता सत्यापित करने और आवश्यकता पड़ने पर दूसरी चिकित्सकीय राय लेने में संकोच नहीं करना चाहिए।
चिकित्सा सेवा विश्वास का पेशा है। बीमारी को भय दिखाकर अथवा व्यवस्था की कमजोरियों का लाभ उठाकर कमाई का साधन बनने से रोकना सरकार, अस्पतालों, चिकित्सा संस्थाओं और नियामक एजेंसियों—सभी की साझा जिम्मेदारी है।
