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आखिर भैंस किसकी है…

प्रकाशित: 27 August 2026, 10:01 am

थाने से राजनीति और अब DNA लैब तक पहुँचा मालिकाना विवाद

गयाजी (बिहार)।

देश में जमीन-जायदाद और सत्ता के दावों का फैसला अदालतों तक पहुँचते देखा गया है, लेकिन बिहार के गयाजी जिले में एक भैंस के असली मालिक का फैसला अब DNA टेस्ट से होगा। एक भैंस, दो दावेदार, पुलिस की उलझन, समर्थकों का हंगामा, एससी-एसटी एक्ट के तहत मुकदमा और फिर राजनेताओं का आईजी तक पहुँचना—इस रोचक घटनाक्रम ने पूरे मामले को साधारण पशु-विवाद से उठाकर प्रशासनिक और राजनीतिक चर्चा का विषय बना दिया है।

राजस्थान पत्रिका में प्रकाशित समाचार के अनुसार, अतरी थाना क्षेत्र के सेउतर गांव निवासी सुरेश यादव की भैंस कुछ दिन पहले गायब हो गई थी। दो दिन बाद उन्हें जानकारी मिली कि नौरंगा टोली में प्रकाश मांझी के घर एक भैंस बंधी हुई है। सुरेश यादव वहाँ पहुँचे और भैंस को अपनी बताते हुए घर ले आए।

मामले में असली मोड़ तब आया, जब प्रकाश मांझी ने भी उसी भैंस पर अपना दावा ठोक दिया। प्रकाश का कहना था कि उनकी भैंस लगभग चार वर्ष पहले चोरी हो गई थी और अब वापस लौटकर उनके घर आई है। इस प्रकार एक पक्ष के लिए वह कुछ दिन पहले गायब हुई भैंस थी, जबकि दूसरे पक्ष के अनुसार चार साल पहले बिछड़ी भैंस स्वयं लौटकर आई थी।

मामला अतरी थाने पहुँचा तो पुलिस भैंस को थाने ले आई। सुरेश यादव के समर्थकों के हंगामे के बाद पुलिस ने भैंस सुरेश को सौंप दी। इससे विवाद और बढ़ गया। प्रकाश मांझी ने सुरेश यादव के विरुद्ध एससी-एसटी एक्ट के तहत मामला दर्ज करा दिया।

भैंस के मालिकाना विवाद में इसके बाद राजनीति भी प्रवेश कर गई। अतरी के पूर्व राजद विधायक अजय यादव और हिंदुस्तानी अवाम मोर्चा के राष्ट्रीय प्रवक्ता श्याम सुंदर शरण आईजी विकास वैभव के पास पहुँचे और मामले की निष्पक्ष जाँच की मांग की। अंततः आईजी ने भैंस के वास्तविक मालिक की पहचान के लिए DNA टेस्ट कराने का निर्णय लिया। रिपोर्ट आने तक भैंस पुलिस की निगरानी में रहेगी।

कैसे होगा भैंस का DNA टेस्ट?

पशु चिकित्सक विवादित भैंस के रक्त, बाल की जड़ अथवा त्वचा का नमूना ले सकते हैं। इसके बाद दावेदार के पास पहले से मौजूद उस भैंस के कथित बच्चे का भी नमूना लिया जाएगा। दोनों नमूने प्रयोगशाला भेजकर उनके आनुवंशिक संकेतकों का मिलान होगा।

यदि विवादित भैंस और दावेदार के पास मौजूद बच्चे के DNA में जैविक माँ-संतान का संबंध प्रमाणित होता है, तो वह संबंधित दावेदार के पक्ष में अत्यंत महत्त्वपूर्ण वैज्ञानिक साक्ष्य होगा। यदि दोनों दावेदारों के पास भैंस के बच्चे होने का दावा है, तो आवश्यकतानुसार दोनों पक्षों के पशुओं के नमूने लिए जा सकते हैं। अंतिम कानूनी निष्कर्ष पुलिस जाँच, उपलब्ध दस्तावेजों, गवाहों और DNA रिपोर्ट को साथ देखकर निकाला जाएगा।

यह घटना देश की व्यवस्था की एक दिलचस्प विडंबना भी सामने लाती है। पशु की पहचान के सामान्य साधन—खरीद रसीद, टैग, बीमा, टीकाकरण रिकॉर्ड या पंजीकरण—स्पष्ट नहीं होने के कारण एक भैंस का विवाद थाने से राजनीतिक प्रतिनिधियों, वरिष्ठ पुलिस अधिकारी और अब वैज्ञानिक प्रयोगशाला तक पहुँच गया। फिलहाल भैंस स्वयं मौन है, दोनों दावेदार अपने-अपने दावे पर कायम हैं और सभी को उस DNA रिपोर्ट की प्रतीक्षा है, जो बताएगी—आखिर भैंस किसकी है…