श्रीकांत बोला: आँखों में रोशनी नहीं, लेकिन सोच में पूरे समाज को दिशा देने वाला प्रकाश
गरीबी, दिव्यांगता और सामाजिक उपेक्षा—इनमें से कोई एक परिस्थिति भी किसी व्यक्ति का आत्मविश्वास तोड़ सकती है। लेकिन आंध्र प्रदेश के एक निर्धन किसान परिवार में जन्मे श्रीकांत बोला ने इन तीनों चुनौतियों को पराजित करते हुए न केवल स्वयं को सफल उद्यमी बनाया, बल्कि अपनी सफलता को दिव्यांग और वंचित लोगों के लिए रोजगार का माध्यम भी बनाया। उनका जीवन बताता है कि समृद्धि का वास्तविक अर्थ केवल धन अर्जित करना नहीं, बल्कि अपने साथ दूसरों के जीवन को भी ऊपर उठाना है।
निर्धन किसान परिवार से आरंभ हुआ जीवन
श्रीकांत बोला का जन्म 7 जुलाई 1991 को आंध्र प्रदेश के एक ग्रामीण किसान परिवार में हुआ। वे जन्म से दृष्टिबाधित हैं। प्रतिष्ठित मैसाचुसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी—MIT के प्रकाशित परिचय के अनुसार उनके पिता अशिक्षित धान किसान थे और परिवार की आर्थिक स्थिति अत्यंत कमजोर थी।
गाँव में उनके लिए शिक्षा तक पहुँचना आसान नहीं था। दृष्टिबाधित होने के कारण उनसे बहुत कम अपेक्षाएँ रखी गईं। लेकिन श्रीकांत ने अपनी शारीरिक स्थिति को भविष्य की सीमा मानने से इनकार कर दिया। रिश्तेदार के सुझाव पर वे दृष्टिबाधित बच्चों के विद्यालय पहुँचे। प्रारंभिक कठिनाइयों के बाद उन्होंने अंग्रेजी सीखी, पढ़ाई में श्रेष्ठ प्रदर्शन किया और उच्च शिक्षा की ओर बढ़े।
जब व्यवस्था ने रोका, तब संघर्ष का रास्ता चुना
दसवीं के बाद श्रीकांत विज्ञान विषय पढ़ना चाहते थे, लेकिन दृष्टिबाधित होने के कारण उन्हें विज्ञान लेने से रोक दिया गया। उन्होंने इस निर्णय को चुपचाप स्वीकार नहीं किया। अपने आधिकारिक जीवन-परिचय में श्रीकांत बताते हैं कि उन्होंने दृष्टिबाधित विद्यार्थियों को विज्ञान पढ़ने का समान अवसर दिलाने के लिए व्यवस्था से संघर्ष किया।
उनकी कहानी का यह हिस्सा विशेष रूप से प्रेरणादायक है। उन्होंने अपनी असफलता का दोष परिस्थितियों को देकर लक्ष्य नहीं छोड़ा, बल्कि अवसर के लिए संघर्ष किया। बाद में उन्हें अमेरिका के प्रतिष्ठित MIT में प्रवेश मिला। MIT के अनुसार वे वहाँ प्रबंधन विज्ञान का अध्ययन करने वाले पहले अंतरराष्ट्रीय दृष्टिबाधित विद्यार्थियों में शामिल थे।
विदेश में पढ़ाई पूरी करने के बाद उनके सामने आरामदायक और आर्थिक रूप से सुरक्षित जीवन चुनने का अवसर था। लेकिन उन्होंने भारत लौटकर ऐसा उद्यम स्थापित करने का निर्णय लिया, जिसमें लाभ के साथ सामाजिक उत्तरदायित्व भी जुड़ा हो।

रोजगार के साथ सम्मान देने वाला उद्यम
वर्ष 2012 में श्रीकांत ने सहयोगियों के साथ हैदराबाद में बोलैंट इंडस्ट्रीज की स्थापना की। यह कंपनी प्राकृतिक पत्तियों, पुनर्चक्रित कागज और दूसरी पर्यावरण-अनुकूल सामग्री से पैकेजिंग तथा उपयोगी उत्पाद बनाती है।
कंपनी की सबसे विशेष बात उसका समावेशी रोजगार मॉडल है। बोलैंट दृष्टिबाधित, श्रवणबाधित और शारीरिक दिव्यांगता वाले लोगों को प्रशिक्षण और रोजगार प्रदान करती है। श्रीकांत की आधिकारिक वेबसाइट के अनुसार कंपनी के कार्यबल में लगभग 36 प्रतिशत कर्मचारी शारीरिक रूप से दिव्यांग रहे हैं।
इस प्रकार श्रीकांत ने तीन समस्याओं का एक साथ समाधान खोजने का प्रयास किया—दिव्यांग लोगों में बेरोजगारी, पर्यावरण को नुकसान पहुँचाने वाली पैकेजिंग और अकुशल लोगों के लिए सम्मानजनक काम की कमी।
कंपनी को उद्योग जगत से निवेश और समर्थन मिला, जिसमें दिवंगत उद्योगपति रतन टाटा का निवेश भी शामिल था। श्रीकांत की आधिकारिक वेबसाइट कंपनी का मूल्यांकन 60 मिलियन अमेरिकी डॉलर से अधिक बताती है। यह कंपनी का स्वयं घोषित व्यावसायिक मूल्यांकन है, श्रीकांत की व्यक्तिगत संपत्ति का प्रमाण नहीं। इसलिए उन्हें केवल किसी निश्चित नेटवर्थ के आधार पर “करोड़पति” कहना उचित नहीं होगा। उनकी वास्तविक उपलब्धि एक बड़े और सामाजिक उद्देश्य वाले उद्यम का निर्माण है।
सफलता मिली, लेकिन मूल उद्देश्य नहीं बदला
सफलता के बाद भी श्रीकांत की सार्वजनिक पहचान केवल उद्योगपति की नहीं बनी। MIT में अध्ययन के दौरान उन्होंने दृष्टिबाधित विद्यार्थियों के लिए कंप्यूटर प्रशिक्षण केंद्र और डिजिटल पुस्तकालय विकसित करने में योगदान दिया। MIT के पब्लिक सर्विस सेंटर ने इस परियोजना को सहयोग दिया था।
उनकी कंपनी का उद्देश्य भी दिव्यांग कर्मचारियों को दया के आधार पर काम देना नहीं, बल्कि प्रशिक्षण देकर उन्हें उत्पादक, सक्षम और आर्थिक रूप से स्वतंत्र बनाना है। यह दृष्टिकोण मर्यादित नेतृत्व का उदाहरण है—जहाँ व्यक्ति अपनी कठिनाइयों को निजी प्रसिद्धि का साधन बनाने के बजाय सामाजिक समाधान में बदलता है।
विश्व आर्थिक मंच ने 2021 में श्रीकांत बोला को अपने यंग ग्लोबल लीडर्स समूह में शामिल किया। इससे पहले 2017 में फोर्ब्स ने उन्हें एशिया की “30 अंडर 30” सूची में स्थान दिया था। वर्ष 2024 में उनके जीवन से प्रेरित हिंदी फिल्म श्रीकांत भी प्रदर्शित हुई, लेकिन उनके जीवन को समझने के लिए फिल्मी प्रस्तुति और सत्यापित वास्तविक तथ्यों में अंतर रखना आवश्यक है।
युवाओं के लिए पाँच बड़े संदेश
श्रीकांत बोला का जीवन सबसे पहले यह सिखाता है कि समाज द्वारा निर्धारित सीमा को अपनी वास्तविक सीमा नहीं मानना चाहिए। दूसरा, शिक्षा केवल नौकरी प्राप्त करने का साधन नहीं, बल्कि अन्यायपूर्ण व्यवस्था को बदलने की शक्ति है। तीसरा, विदेश में मिली श्रेष्ठ शिक्षा का उपयोग अपने देश और समाज की समस्याओं के समाधान में किया जा सकता है।
चौथा, व्यवसाय में लाभ और लोककल्याण एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं। पर्यावरण-अनुकूल उत्पाद बनाते हुए दिव्यांग लोगों को रोजगार देना इसका प्रमाण है। पाँचवाँ और सबसे महत्वपूर्ण संदेश यह है कि सफलता का श्रेष्ठ रूप वही है, जिसमें व्यक्ति अकेला ऊपर न उठे, बल्कि दूसरों के लिए भी आगे बढ़ने का मार्ग बनाए।
श्रीकांत बोला की जीवन-यात्रा गरीबी से आर्थिक सफलता तक पहुँचने की कहानी अवश्य है, लेकिन उससे कहीं अधिक यह उपेक्षा से सम्मान, निर्भरता से आत्मनिर्भरता और व्यक्तिगत संघर्ष से सामाजिक परिवर्तन तक पहुँचने की कहानी है।
वे हमें बताते हैं कि आँखों से दिखाई देना ही दृष्टि नहीं है। वास्तविक दृष्टि वह है, जिसमें मनुष्य आने वाले कल की संभावना देख सके और उस संभावना को साकार करने के लिए साहस, परिश्रम और संवेदनशीलता के साथ काम करे।
