साँस-साँस में राम
लेखिका: सीमा बहन, जयंतिलाल माली
स्वतंत्रता सेनानी नगर, वाडज, अहमदाबाद
एक छोटे से गाँव के किनारे मिट्टी और घास-फूस से बनी एक झोंपड़ी में एक वृद्धा रहती थी। आगे-पीछे उसका कोई नहीं था—न कोई संतान और न ही कोई ऐसा संबंधी, जिस पर वह अपने जीवन का भार डाल सके। वृद्धावस्था के कारण उसका शरीर कमजोर हो चुका था, लेकिन उसका मन संतोष और भगवान की भक्ति से भरा हुआ था।
वह प्रतिदिन गाँव के आसपास से गायों का गोबर एकत्र करती, उसके कंडे बनाती और उन्हें धूप में सुखाती। कंडे सूख जाने के बाद वह उन्हें गाँव में बेच देती। उनसे मिलने वाले थोड़े-से पैसों से आटा, नमक और दूसरी आवश्यक वस्तुएँ खरीदकर अपना जीवन चलाती थी।
उस वृद्धा की सबसे बड़ी पूँजी उसकी झोंपड़ी या कंडे नहीं, बल्कि भगवान राम के प्रति उसकी अटूट श्रद्धा थी। गोबर एकत्र करते हुए, कंडे बनाते हुए, उन्हें धूप में रखते हुए और घर के दूसरे काम करते हुए उसके मुख से लगातार एक ही ध्वनि निकलती रहती—
“राम… राम… राम…”
मानो उसकी प्रत्येक साँस के साथ राम का नाम जुड़ गया था। उसके हाथ काम करते रहते और मन भगवान के चरणों में लगा रहता।
एक दिन वृद्धा आवश्यक सामान लेने गाँव से बाहर गई हुई थी। उसी समय कुछ चोर उसकी झोंपड़ी के पास पहुँचे। वहाँ बड़ी संख्या में सूखे हुए कंडे रखे देखकर उनके मन में लालच आ गया।
उन्होंने सोचा, “यह अकेली और असहाय बुढ़िया हमारा क्या बिगाड़ लेगी?”
चोर उसके सारे कंडे उठाकर अपने साथ ले गए।
वृद्धा लौटकर आई तो कई दिनों की मेहनत गायब देखकर उसकी आँखों में आँसू आ गए। उन कंडों को बेचकर ही उसके अगले कई दिनों के भोजन की व्यवस्था होनी थी। आसपास पूछताछ करने पर कुछ लोगों ने बताया कि गाँव के अमुक व्यक्तियों को उसके कंडे ले जाते हुए देखा गया था।
वृद्धा न्याय की आशा लेकर राजा के दरबार में पहुँची। उसने हाथ जोड़कर कहा, “महाराज! मैं निर्धन और अकेली हूँ। गोबर के कंडे बनाकर अपना पेट पालती हूँ। गाँव के कुछ लोग मेरे सारे कंडे चुराकर ले गए हैं। कृपा करके मुझे न्याय दिलाइए।”
राजा ने आरोपित लोगों को दरबार में बुलवाया। वे चोर बहुत चालाक थे। उन्होंने साफ इनकार करते हुए कहा, “महाराज! ये कंडे हमारे ही बनाए हुए हैं। यह वृद्धा गरीब अवश्य है, लेकिन गरीबी का लाभ उठाकर हमारे कंडों को अपना बता रही है।”
राजा ने वृद्धा से पूछा, “तुम्हारे पास क्या प्रमाण है कि ये कंडे तुम्हारे हैं? सभी कंडे देखने में एक जैसे होते हैं। बिना किसी निशान अथवा साक्ष्य के न्याय कैसे किया जाए?”
राजा का प्रश्न सुनकर वृद्धा कुछ क्षण के लिए मौन हो गई। उसके पास न कोई लिखित प्रमाण था, न कोई पहचान का चिह्न और न ही कोई प्रभावशाली गवाह। तभी उसने आँखें बंद कीं और अपने आराध्य भगवान राम का स्मरण किया। अचानक उसके चेहरे पर विश्वास की चमक आ गई।
वृद्धा ने कहा, “महाराज! इन कंडों पर मेरा कोई बाहरी निशान नहीं है, परंतु इन्हें बनाते समय मेरी प्रत्येक साँस के साथ राम का नाम निकला है। मेरे हाथों ने जितनी बार इन्हें थपथपाया, उतनी बार मेरे मुख ने ‘राम-राम’ कहा है। आप इन कंडों को अपने कान के पास लगाकर सुनिए। यदि इनमें से राम-नाम की ध्वनि सुनाई दे, तो समझिए कि ये मेरे हैं। यदि कोई ध्वनि सुनाई न दे, तो मैं अपना दावा छोड़ दूँगी।”
पूरा दरबार आश्चर्यचकित होकर वृद्धा की ओर देखने लगा। राजा ने सेवकों को कंडे लाने का आदेश दिया। राजा ने उनमें से एक कंडा उठाकर अपने कान के पास लगाया।
जैसे ही राजा ने ध्यान से सुना, उसके अंतर्मन में एक मधुर और निरंतर ध्वनि गूँजने लगी—
“राम… राम… राम…”
राजा ने दूसरा कंडा उठाया और फिर तीसरा। प्रत्येक कंडे से उसे वही पवित्र ध्वनि सुनाई दी। पूरा दरबार राम-नाम की महिमा और वृद्धा की निष्कपट भक्ति के सामने नतमस्तक हो गया।
चोर भय से काँपने लगे। उनका झूठ सबके सामने खुल चुका था। उन्होंने राजा के सामने अपना अपराध स्वीकार कर लिया।
राजा ने चोरी किए गए सभी कंडे वृद्धा को वापस दिलाए और चोरों को उचित दंड दिया। वृद्धा की निर्धनता और असहाय अवस्था देखकर राजा ने राजकोष से उसके भोजन तथा जीवन-निर्वाह की नियमित व्यवस्था भी कर दी।
वृद्धा ने हाथ जोड़कर कहा—
“महाराज! न्याय आपने किया है, लेकिन मेरी लाज मेरे राम ने रखी है।”
यह कथा हमें समझाती है कि सच्ची भक्ति केवल मंदिर में बैठकर की गई पूजा नहीं है। जब मनुष्य अपने प्रत्येक कार्य को ईश्वर का कार्य समझकर सत्य, परिश्रम और निष्ठा के साथ करता है, तब उसका साधारण-से-साधारण श्रम भी पूजा बन जाता है।
भगवान का नाम केवल होंठों पर नहीं, बल्कि हमारे व्यवहार, परिश्रम और चरित्र में भी उतरना चाहिए।
जिसके मन में राम बसते हैं, उसके कर्मों में भी राम-नाम की सुगंध और ध्वनि बस जाती है।
