नगर परिषद जालौर चुनाव: आरक्षण में बदलाव से बदले राजनीतिक समीकरण
नगर परिषद जालौर के वर्ष 2026 के चुनाव के लिए हुई वार्ड आरक्षण लॉटरी ने शहर की राजनीति के पुराने समीकरण बदल दिए हैं। वर्ष 2019 में जिन वर्गों के लिए वार्ड आरक्षित थे, उनमें से कई अब दूसरी श्रेणी में चले गए हैं। इससे पिछले चुनाव के अनेक विजेताओं को नया वार्ड तलाशना पड़ सकता है, जबकि कुछ वार्डों में नए चेहरों के लिए अवसर बने हैं।
2019 में ऐसी थी नगर परिषद की तस्वीर
वर्ष 2019 के चुनाव में नगर परिषद के कुल 40 वार्डों में भाजपा ने 18, कांग्रेस ने 14 और निर्दलीय प्रत्याशियों ने आठ वार्ड जीते थे। भाजपा सबसे बड़ा दल बनी, लेकिन उसे अपने दम पर 21 सदस्यों का बहुमत नहीं मिला था। बाद में सभापति चुनाव में भाजपा के अंबालाल ने 21 मत प्राप्त कर कांग्रेस के मिश्रीमल को दो मतों से पराजित किया था।
इस बार सभापति पद सामान्यवर्ष 2026 में जालौर नगर परिषद के सभापति का पद सामान्य अथवा अनारक्षित घोषित किया गया है। इसका अर्थ यह है कि किसी भी सामाजिक वर्ग का निर्वाचित पार्षद सभापति पद का उम्मीदवार बन सकता है। इसलिए चुनाव के बाद बहुमत का आंकड़ा, निर्दलीय पार्षदों की भूमिका और राजनीतिक दलों के बीच संभावित गठजोड़ महत्त्वपूर्ण रहेगा।
40 में से 22 वार्डों का स्वरूप बदलावर्ष 2019 और 2026 की आरक्षण स्थिति की तुलना करने पर 18 वार्डों का आरक्षण पूरी तरह यथावत है। शेष 22 वार्डों में सामाजिक वर्ग अथवा महिला आरक्षण की स्थिति बदली है। इनमें 12 वार्ड ऐसे हैं, जिनका मूल सामाजिक वर्ग बदल गया है, जबकि 10 वार्डों में महिला और खुले वर्ग के बीच परिवर्तन हुआ है।
सामान्य से ओबीसी हुए ये वार्ड
पिछले चुनाव में वार्ड 13 और 36 सामान्य वर्ग के लिए खुले थे। इस बार वार्ड 13 को ओबीसी और वार्ड 36 को ओबीसी महिला के लिए आरक्षित किया गया है। वार्ड 22 वर्ष 2019 में सामान्य महिला था, जो अब ओबीसी महिला हो गया है। वार्ड 16 भी सामान्य महिला से बदलकर ओबीसी खुला हो गया है।
इन परिवर्तनों के कारण संबंधित पुराने विजेता तभी उसी वार्ड से चुनाव लड़ सकेंगे, जब वे वर्तमान आरक्षण की पात्रता पूरी करते हों।ओबीसी से सामान्य हुए वार्डवार्ड 14, 15 और 37 पिछले चुनाव में ओबीसी वर्ग के लिए आरक्षित थे, लेकिन इस बार सामान्य अथवा अनारक्षित हो गए हैं। वार्ड 30 वर्ष 2019 में ओबीसी महिला के लिए आरक्षित था, जो अब सामान्य हो गया है। इन वार्डों से अब किसी भी सामाजिक वर्ग का पात्र उम्मीदवार चुनाव लड़ सकेगा।
वार्ड 1 और 5 में महिला आरक्षण बरकरार
वार्ड 1 और 5 पिछले चुनाव में ओबीसी महिला के लिए आरक्षित थे। इस बार दोनों को सामान्य महिला श्रेणी में रखा गया है। यहां महिला आरक्षण कायम है, लेकिन ओबीसी वर्ग की अनिवार्यता समाप्त हो गई है। इससे सभी सामाजिक वर्गों की महिला उम्मीदवारों के लिए चुनाव का रास्ता खुल गया है।
वार्ड 26 में सबसे बड़ा वर्गीय परिवर्तन
वार्ड 26 पिछले चुनाव में अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित था और यहां से कांग्रेस के कालूराम जीते थे। इस बार यह वार्ड ओबीसी महिला के लिए आरक्षित किया गया है। इस कारण पिछले पुरुष विजेता इस वार्ड से चुनाव नहीं लड़ सकेंगे और यहां नया महिला चेहरा सामने आना लगभग तय है।
एससी के सात वार्ड
वर्ष 2026 में वार्ड 2, 8, 17, 18, 23, 24 और 31 अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित हैं। इनमें वार्ड 2 और 24 एससी महिला के लिए रखे गए हैं। वार्ड 2, 17, 18, 23, 24 और 31 की मूल आरक्षण श्रेणी पहले जैसी है। वार्ड 8 पहले एससी महिला था, लेकिन अब एससी खुला हो गया है। यहां महिला के साथ पुरुष उम्मीदवार भी चुनाव लड़ सकेंगे।
एसटी के तीन वार्ड
वार्ड 27, 28 और 29 अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित हैं। वर्ष 2019 में भी यही तीन वार्ड एसटी वर्ग के लिए थे, लेकिन महिला आरक्षण में बदलाव हुआ है।पिछले चुनाव में वार्ड 27 एसटी महिला था, जो अब एसटी खुला हो गया है। वहीं वार्ड 28 पहले एसटी खुला था, जिसे इस बार एसटी महिला के लिए आरक्षित किया गया है। वार्ड 29 एसटी खुला ही बना हुआ है।
ओबीसी के आठ वार्ड
वार्ड 13, 16, 19, 22, 25, 26, 36 और 39 ओबीसी वर्ग के लिए आरक्षित किए गए हैं। इनमें वार्ड 22, 26 और 36 ओबीसी महिला के लिए हैं। वार्ड 19 और 25 की आरक्षण स्थिति यथावत है। वार्ड 13, 16, 22, 26, 36 और 39 में वर्ग अथवा महिला आरक्षण की स्थिति बदली है। इन बदलावों से ओबीसी वर्ग में कई नए संभावित उम्मीदवारों के लिए अवसर पैदा हुए हैं।
सात वार्ड सामान्य महिला के लिए
वार्ड 1, 5, 9, 11, 32, 35 और 38 सामान्य महिला के लिए आरक्षित किए गए हैं। इनमें वार्ड 11 पहले भी सामान्य महिला था। वार्ड 1 और 5 पहले ओबीसी महिला थे, जबकि वार्ड 9, 32, 35 और 38 पिछले चुनाव में सामान्य खुले वार्ड थे।
वार्ड 9 से पिछली बार निर्दलीय अमजद खान, वार्ड 32 से भाजपा के महेश भट्ट, वार्ड 35 से निर्दलीय सांवलाराम और वार्ड 38 से भाजपा के हीराराम जीते थे। अब इन चारों वार्डों के महिला आरक्षित होने से पिछले पुरुष विजेता उसी वार्ड से चुनाव नहीं लड़ सकेंगे।
इन वार्डों से हटा महिला आरक्षण
वार्ड 4, 8, 20, 27, 30 और 40 में पिछले चुनाव के दौरान महिला आरक्षण था, जो इस बार समाप्त हो गया है। इन वार्डों से अब संबंधित सामाजिक वर्ग का कोई भी पात्र पुरुष या महिला उम्मीदवार चुनाव लड़ सकता है।वार्ड 4 और 20 सामान्य महिला से सामान्य, वार्ड 8 एससी महिला से एससी, वार्ड 27 एसटी महिला से एसटी, वार्ड 30 ओबीसी महिला से सामान्य और वार्ड 40 सामान्य महिला से सामान्य हो गया है।
पुराने विजेताओं के सामने चुनौती
वार्ड 9, 26, 32, 35, 36 और 38 के पिछले पुरुष विजेताओं के सामने सबसे स्पष्ट चुनौती है, क्योंकि ये वार्ड अब महिलाओं के लिए आरक्षित हो गए हैं। ऐसे नेताओं को चुनाव लड़ने के लिए दूसरा उपयुक्त वार्ड तलाशना पड़ सकता है या अपने परिवार अथवा राजनीतिक समूह से किसी महिला उम्मीदवार को मैदान में उतारना पड़ सकता है।
वार्ड 13, 16, 22 और 39 के पुराने विजेताओं की पात्रता उनके सामाजिक वर्ग पर निर्भर करेगी। केवल उम्मीदवार के नाम के आधार पर उसकी जातीय श्रेणी निर्धारित नहीं की जा सकती; इसलिए इस विषय में आधिकारिक दस्तावेज के बिना किसी व्यक्ति विशेष के बारे में निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा।
नए चेहरों के लिए खुला रास्ता
आरक्षण परिवर्तन के कारण कई वार्डों में स्थापित नेताओं की जगह नए उम्मीदवार सामने आ सकते हैं। विशेषकर महिला आरक्षित हुए वार्डों में राजनीतिक दलों को मजबूत स्थानीय महिला चेहरों की तलाश करनी होगी। दूसरी ओर, आरक्षण से मुक्त हुए वार्डों में पिछले उम्मीदवारों के साथ नए दावेदारों की संख्या भी बढ़ सकती है।
निर्दलीयों की भूमिका फिर हो सकती है महत्त्वपूर्ण
पिछले चुनाव में आठ निर्दलीय उम्मीदवारों ने जीत दर्ज की थी। किसी भी बड़े दल को स्पष्ट बहुमत नहीं मिलने के कारण बोर्ड गठन में निर्दलीय पार्षदों की भूमिका निर्णायक बनी थी। इस बार भी 22 वार्डों में आरक्षण परिवर्तन के कारण टिकट वितरण, उम्मीदवार चयन और स्थानीय असंतोष बढ़ सकता है। इससे बागी तथा निर्दलीय प्रत्याशियों के लिए राजनीतिक संभावना बन सकती है।
लॉटरी ने बदला चुनावी मैदाननई आरक्षण व्यवस्था ने केवल उम्मीदवारों की पात्रता नहीं बदली है, बल्कि राजनीतिक दलों की रणनीति भी बदल दी है। जिन वार्डों में पुराने मजबूत उम्मीदवार चुनाव नहीं लड़ सकेंगे, वहां संगठन, सामाजिक समीकरण और स्थानीय स्वीकार्यता के आधार पर नए नाम सामने आएंगे। इसलिए जालौर नगर परिषद का आगामी चुनाव पुराने अनुभव, नए उम्मीदवारों और बदले हुए आरक्षण समीकरणों का दिलचस्प मुकाबला बन सकता है।
