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रेलवे सिग्नल परियोजना के भुगतान में रिश्वत का आरोप, अब काम की गुणवत्ता और यात्री सुरक्षा पर भी उठे सवाल

प्रकाशित: 19 August 2026, 2:32 pm

मंडल में करीब 48 करोड़ रुपये का काम; सीबीआई कार्रवाई के बाद तकनीकी ऑडिट और स्वतंत्र सुरक्षा जांच की मांग

बीकानेर। उत्तर पश्चिम रेलवे के बीकानेर मंडल में सिग्नल प्रणाली से जुड़ी करीब 48 करोड़ रुपये की परियोजना के बिलों के भुगतान में कथित रिश्वतखोरी का मामला सामने आने के बाद अब सवाल केवल वित्तीय अनियमितता तक सीमित नहीं रह गया है। मामला ऐसी व्यवस्था से जुड़ा है, जिसका सीधा संबंध ट्रेनों के सुरक्षित परिचालन और लाखों यात्रियों की जान से है। ऐसे में परियोजना के भुगतान के साथ उसके तकनीकी निष्पादन, गुणवत्ता परीक्षण और सुरक्षा मानकों की भी गहन जांच आवश्यक मानी जा रही है।

प्राप्त जानकारी के अनुसार, बीकानेर मंडल के लगभग 1,500 किलोमीटर रेल नेटवर्क में सिग्नलिंग प्रणाली से संबंधित काम के लिए करीब 48 करोड़ रुपये का ठेका दिया गया था। आरोप है कि परियोजना से जुड़े बिलों को अनुकूल रूप से आगे बढ़ाने और भुगतान कराने के बदले रिश्वत मांगी गई। सीबीआई ने कार्रवाई करते हुए उत्तर पश्चिम रेलवे के वरिष्ठ अनुभाग अधिकारी राजेंद्र चौधरी और लेखा सहायक राकेश कुमार को कथित तौर पर 1.20 लाख रुपये की रिश्वत लेते गिरफ्तार किया। मामले में कोलकाता की संबंधित कंपनी के कर्मचारी नवल किशोर की भूमिका भी जांच के दायरे में बताई गई है। आरोपों की अंतिम सत्यता जांच और न्यायिक प्रक्रिया से ही निर्धारित होगी।

प्रकाशित रिपोर्ट में परियोजना की राशि का लगभग दस प्रतिशत, यानी करीब पांच करोड़ रुपये, कथित रूप से रिश्वत में बांटे जाने का आरोप भी उल्लेखित है। हालांकि इतनी बड़ी राशि के लेन-देन की आधिकारिक पुष्टि अभी सामने नहीं आई है। इसलिए इसे जांच के अधीन आरोप के रूप में ही देखा जाना चाहिए।

वित्तीय जांच के साथ तकनीकी जांच भी जरूरी

रेलवे की सिग्नल प्रणाली ट्रेन की गति, मार्ग निर्धारण, सुरक्षित दूरी और एक ही रेलखंड पर ट्रेनों की आवाजाही को नियंत्रित करने वाली अत्यंत संवेदनशील व्यवस्था है। यदि किसी परियोजना में कमीशन या रिश्वत के कारण घटिया उपकरण लगाए गए हों, निर्धारित परीक्षण पूरे नहीं किए गए हों अथवा कागजी रिकॉर्ड के आधार पर भुगतान कर दिया गया हो, तो इससे गंभीर सुरक्षा जोखिम उत्पन्न हो सकता है।

हालांकि भुगतान में कथित रिश्वतखोरी सामने आने मात्र से यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि सिग्नल प्रणाली दोषपूर्ण है या उससे कोई दुर्घटना हुई है। लेकिन मामले की प्रकृति को देखते हुए केवल खातों और बिलों की जांच पर्याप्त नहीं होगी। जिन रेलखंडों में काम हुआ है, वहां उपकरणों की गुणवत्ता, केबल की गहराई, सुरक्षा परत, फेल-सेफ व्यवस्था, इलेक्ट्रॉनिक इंटरलॉकिंग, साइट परीक्षण और स्वीकृति प्रमाणपत्रों की स्वतंत्र जांच आवश्यक है।

रिपोर्ट के अनुसार, रेलवे बोर्ड के अनुसंधान अभिकल्प एवं मानक संगठन—आरडीएसओ—के विशेषज्ञों से तकनीकी ऑडिट और फोरेंसिक जांच कराए जाने की तैयारी की जा रही है। जांच में यह देखा जाना चाहिए कि काम स्वीकृत तकनीकी मानकों के अनुरूप हुआ या नहीं और भुगतान से पहले जिन परीक्षणों को पूरा दिखाया गया, वे वास्तव में स्थल पर हुए थे या केवल दस्तावेजों में दर्ज किए गए।

यह मामला व्यवस्था के सामने गंभीर प्रश्न रखता है—यदि रेल सुरक्षा से जुड़े कार्यों के भुगतान में भी रिश्वत का प्रवेश हो जाए, तो गुणवत्ता की निष्पक्ष निगरानी कौन सुनिश्चित करेगा? सीबीआई जांच के साथ निष्पक्ष तकनीकी और सुरक्षा ऑडिट ही यह स्पष्ट कर सकता है कि मामला केवल भुगतान संबंधी भ्रष्टाचार तक सीमित है अथवा इसके कारण यात्रियों की सुरक्षा भी किसी स्तर पर प्रभावित हुई है।