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वैश्विक शांति का ध्वजवाहक या महाशक्तियों का अखाड़ा: 81 वर्षों के सफर में संयुक्त राष्ट्र की साख और प्रासंगिकता

प्रकाशित: 24 October 2026, 8:16 am

24 अक्टूबर 1945 को द्वितीय विश्व युद्ध की भीषण तबाही और नरसंहार की राख से ‘संयुक्त राष्ट्र संघ’ (UN) का जन्म हुआ था। इसका मूल उद्देश्य दुनिया को तीसरे विश्व युद्ध की विभीषिका से बचाना, अंतरराष्ट्रीय शांति व सुरक्षा बनाए रखना, मानव अधिकारों का संरक्षण करना और राष्ट्रों के बीच संप्रभु समानता व आर्थिक-सामाजिक सहयोग को बढ़ावा देना था।

लीग ऑफ नेशंस की विफलताओं से सबक लेते हुए, संयुक्त राष्ट्र को एक ऐसे वैश्विक मंच के रूप में अभिकल्पित किया गया था, जहाँ छोटे-बड़े सभी देश अपनी आवाज उठा सकें और विवादों का समाधान कूटनीति के माध्यम से हो।

हालाँकि, 1990 के दशक में शीत युद्ध के अवसान के बाद जब वैश्वीकरण, निजीकरण और उदारीकरण का दौर शुरू हुआ, तो वैश्विक शक्ति संतुलन पूरी तरह बदल गया। एकध्रुवीय विश्व में अमेरिका की अप्रतिम आर्थिक और सैन्य श्रेष्ठता ने संयुक्त राष्ट्र की निष्पक्षता पर गहरे प्रश्नचिह्न लगाए। इस दौर में कई बार यह आरोप लगा कि संयुक्त राष्ट्र वैश्विक पूंजीवाद और अमेरिकी विदेश नीति के हाथों की कठपुतली या मोहरा (Pawn) बनकर रह गया है। 2003 में संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की स्पष्ट सहमति के बिना इराक पर अमेरिकी आक्रमण और विभिन्न आर्थिक प्रतिबंधों में पश्चिमी देशों के प्रभाव ने इसकी स्वायत्तता की छवि को गंभीर चोट पहुँचाई। सुरक्षा परिषद में वीटो पावर का चुनिंदा इस्तेमाल और बहुराष्ट्रीय निगमों का बढ़ता प्रभाव इस बात का प्रमाण बना कि वैश्विक निर्णय प्रक्रिया में शक्तिशाली देशों का वर्चस्व कायम रहा।

लेकिन आज का उत्तर-आधुनिक काल एक नई वास्तविकता पेश करता है। दुनिया अब केवल एकध्रुवीय नहीं रही, बल्कि बहुध्रुवीय (Multipolar) बन चुकी है, जहाँ भारत, चीन और ‘ग्लोबल साउथ’ की आवाजें अधिक मुखर हुई हैं। वर्तमान में मानवता जिन संकटों से जूझ रही है—जैसे जलवायु परिवर्तन, साइबर युद्ध, महामारी, कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) के बहुआयामी जोखिम और जैव-विविधता का ह्रास—वे सीमाहीन चुनौतियाँ हैं। इन जटिल समस्याओं का मुकाबला कोई भी महाशक्ति अकेले नहीं कर सकती। इस नवीन परिप्रेक्ष्य में संयुक्त राष्ट्र की उपयोगिता खत्म होने के बजाय और भी अधिक बढ़ गई है, क्योंकि यही एकमात्र ऐसा वैश्विक मंच है जो सभी राष्ट्रों को एक साथ लाने की क्षमता रखता है।

यदि इस बात का मूल्यांकन करें कि क्या संयुक्त राष्ट्र ने स्वयं को सही साबित किया है, तो जवाब मिला-जुला है। एक ओर जहाँ यह संघ बड़े पैमाने पर परमाणु युद्ध को रोकने, विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) व यूनिसेफ (UNICEF) के माध्यम से स्वास्थ्य व मानवीय संकटों से निपटने और खाद्य सुरक्षा प्रदान करने में बेहद सफल रहा है; वहीं दूसरी ओर, वर्तमान रूस-यूक्रेन संघर्ष और मध्य पूर्व के संकटों के दौरान सुरक्षा परिषद की पंगुता इसके संस्थागत ढांचे की विफलता को दर्शाती है। 1945 की विजेता शक्तियों के आधार पर बना वीटो ढाँचा आज के यथार्थ से परे हो चुका है।

निष्कर्षतः, संयुक्त राष्ट्र संघ पूरी तरह से असफल नहीं रहा है, लेकिन यदि इसे उत्तर-आधुनिक काल में खुद को पूर्णतः प्रासंगिक और न्यायसंगत बनाए रखना है, तो इसमें तत्काल संरचनात्मक सुधारों की आवश्यकता है। भारत जैसे उभरते और विश्व की विशाल आबादी का प्रतिनिधित्व करने वाले देशों को सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यता देना और वीटो व्यवस्था का लोकतांत्रीकरण करना ही इसे वास्तव में एक निष्पक्ष वैश्विक संस्था बना सकता है। अल्बर्ट आइंस्टीन के शब्दों में कहें तो, “संयुक्त राष्ट्र परिपूर्ण नहीं है, लेकिन इसके बिना दुनिया कहीं अधिक खतरनाक होती।”