राजनीति में गुम होती नैतिकता और जवाबदेही का संकट
धर्मेन्द्र सुन्देशा
लाल बहादुर शास्त्री जयंती विशेष
भारतीय राजनीति के इतिहास में कुछ पन्ने ऐसे हैं जो आज भी मील का पत्थर माने जाते हैं। जब भी सार्वजनिक जीवन में शुचिता और जवाबदेही की बात होती है, पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री का नाम सबसे पहले आता है। 1956 में अरियालुर रेल दुर्घटना की नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए उनका रेल मंत्री के पद से इस्तीफा देना, उस दौर की राजनीति का एक ऐसा आदर्श था, जिसकी मिसालें आज भी दी जाती हैं। लेकिन वर्तमान परिदृश्य को देखते हुए यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या आज की व्यवस्था से वह ‘नैतिकता’ पूरी तरह से विदा हो चुकी है?
हाल के दिनों में देश ने कई ऐसे घटनाक्रम देखे हैं, जहां जनता और विपक्षी दलों ने नैतिक आधार पर इस्तीफे की पुरजोर मांग की, लेकिन व्यवस्था के शीर्ष पर बैठे लोगों ने इससे किनारा कर लिया। शिक्षा व्यवस्था और प्रतियोगी परीक्षाओं में कथित अनियमितताओं को लेकर हुए हालिया युवा आंदोलनों में केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान से नैतिक आधार पर इस्तीफे की मांग उठी। इसी तरह, चुनाव प्रक्रिया में पारदर्शिता को लेकर उठते सवालों, राजनीतिक ध्रुवीकरण और ‘वोट चोरी’ जैसे गंभीर आरोपों के बीच, मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को लेकर भी विपक्ष ने नैतिक जिम्मेदारी तय करने की बात कही।
इन घटनाओं में राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप की सत्यता या कानूनी पहलू अपनी जगह हो सकते हैं, लेकिन यहां मूल विमर्श ‘नैतिक जिम्मेदारी’ के अवमूल्यन का है। आज के दौर में इस्तीफा देना किसी राजनेता या शीर्ष अधिकारी के लिए अपनी विफलता या दोष स्वीकार करने जैसा मान लिया गया है, जिसे राजनीतिक दल अपनी कमजोरी के रूप में देखते हैं। शास्त्री जी के दौर में इस्तीफा एक प्रायश्चित और लोकतांत्रिक व्यवस्था के प्रति जनता का विश्वास बनाए रखने का माध्यम था। आज पद पर बने रहना ही ताकत और राजनीतिक वर्चस्व का प्रतीक मान लिया गया है।
हम एक ऐसे युग में प्रवेश कर चुके हैं जहां ‘नीति’ (पॉलिसी) तो बहुत हैं, लेकिन ‘नीयत’ और ‘नैतिकता’ हाशिए पर चली गई हैं। अब जवाबदेही केवल कानूनी पैमानों और अदालती फैसलों तक सीमित कर दी गई है। यह एक अलिखित नियम बन गया है कि जब तक कानून या अदालत किसी को दोषी नहीं ठहराती, तब तक कोई नैतिक जिम्मेदारी नहीं बनती। लेकिन हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि लोकतंत्र केवल संविधान के अक्षरों और कानूनी दांव-पेंच से नहीं, बल्कि उसकी भावना, लोक-लाज और जनता के भरोसे से चलता है।जब तक सार्वजनिक जीवन में बैठे लोग अपनी अंतरात्मा और जनता के प्रति सीधे तौर पर जवाबदेह नहीं होंगे, तब तक व्यवस्था में संस्थागत सुधार की गुंजाइश कम ही रहेगी।
लाल बहादुर शास्त्री जी का वह कदम केवल एक व्यक्ति का निर्णय नहीं था, बल्कि वह एक जीवंत और संवेदनशील लोकतंत्र की पहचान था। आज नितांत आवश्यकता है कि राजनीति और प्रशासन को सत्ता बचाने के खेल से ऊपर उठाकर, वापस सेवा और जवाबदेही के उसी उच्च मापदंड पर लाया जाए, जहां कुर्सी से बड़ी नैतिकता हो।
