वीर विक्रमादित्य और अक्षय स्वर्ण-थैली की कथा
उज्जैन की लोकपरंपरा और ‘सिंहासन बत्तीसी’ से प्रेरित आज की कथा
उज्जयिनी के प्रतापी सम्राट वीर विक्रमादित्य अपने पराक्रम, न्याय, निर्भीकता और दानशीलता के लिए दूर-दूर तक प्रसिद्ध थे। उनके दरबार में आने वाला कोई भी जरूरतमंद खाली हाथ नहीं लौटता था। प्रजा उन्हें संसार का सबसे बड़ा दानी मानती थी, लेकिन विक्रमादित्य को अपनी प्रशंसा सुनने से अधिक सत्य जानने में रुचि थी।
एक दिन राजमहल में विशाल भोज आयोजित हुआ। इसमें विद्वान, ब्राह्मण, व्यापारी और राज्य के प्रतिष्ठित लोग उपस्थित थे। चर्चा के दौरान प्रश्न उठा—संसार का सबसे बड़ा दानी कौन है?
दरबार में उपस्थित लोगों ने एक स्वर में सम्राट विक्रमादित्य का नाम लिया। तभी राजा की दृष्टि एक ब्राह्मण पर पड़ी, जो मौन बैठा था। उसके चेहरे से लग रहा था कि वह सबकी बात से सहमत नहीं है।
विक्रमादित्य ने उससे निर्भय होकर अपना विचार रखने को कहा। ब्राह्मण ने विनम्रता से बताया कि समुद्र पार एक राज्य के राजा कीर्तिध्वज प्रतिदिन एक लाख स्वर्ण मुद्राएँ दान करने के बाद ही अन्न-जल ग्रहण करते हैं। उसने स्वयं कई दिनों तक वहाँ रहकर यह देखा था।
यह सुनकर विक्रमादित्य क्रोधित नहीं हुए। उन्होंने सत्य बताने के लिए ब्राह्मण को सम्मान और पुरस्कार देकर विदा किया। लेकिन उनके मन में यह जानने की जिज्ञासा उत्पन्न हुई कि कीर्तिध्वज को प्रतिदिन इतनी स्वर्ण मुद्राएँ कहाँ से मिलती हैं।
विक्रमादित्य ने राजसी वस्त्र उतारकर सामान्य नागरिक का वेश बनाया और समुद्र पार कीर्तिध्वज के राज्य पहुँच गए। वहाँ उन्होंने राजा से नौकरी माँगी और कहा, “मैं वह कार्य कर सकता हूँ, जिसे सामान्य व्यक्ति नहीं कर सकता।”
कीर्तिध्वज ने उन्हें महल का द्वारपाल नियुक्त कर दिया।
कुछ दिनों तक विक्रमादित्य ने देखा कि कीर्तिध्वज वास्तव में प्रतिदिन एक लाख स्वर्ण मुद्राएँ दान करते हैं। वे तब तक भोजन नहीं करते, जब तक निर्धारित दान पूरा न हो जाए। प्रत्येक शाम कीर्तिध्वज अकेले किसी अज्ञात स्थान पर जाते और लौटते समय उनके पास स्वर्ण मुद्राओं से भरी थैली होती।
एक रात विक्रमादित्य चुपचाप उनके पीछे चल पड़े। समुद्र तट के पास पहुँचकर उन्होंने देखा कि कीर्तिध्वज स्नान कर एक देवी-मंदिर में गए। पूजा करने के बाद वे खौलते तेल के विशाल कड़ाह में कूद गए। देवी की कृपा से कुछ समय बाद उन्हें पुनर्जीवन मिला और एक लाख स्वर्ण मुद्राएँ प्रदान की गईं।
अब विक्रमादित्य को कीर्तिध्वज के दान का रहस्य समझ में आ गया। वे यह देखकर प्रभावित हुए कि कीर्तिध्वज प्रतिदिन प्राणों की पीड़ा सहकर भी अपना दान-व्रत निभाते हैं।
अगले दिन कीर्तिध्वज के लौटने के बाद विक्रमादित्य स्वयं उस स्थान पर पहुँचे। उन्होंने देवी की आराधना की और खौलते तेल के कड़ाह में कूद गए। देवी ने उन्हें पुनर्जीवित कर स्वर्ण मुद्राएँ देनी चाहीं, लेकिन विक्रमादित्य ने मुद्राएँ लेने से इनकार कर दिया।
उन्होंने यह कठिन परीक्षा बार-बार दी। अंततः देवी उनके साहस और संकल्प से प्रसन्न हुईं और मनचाहा वरदान माँगने को कहा।
विक्रमादित्य ने धन नहीं माँगा। उन्होंने वह अक्षय थैली माँगी, जिससे प्रतिदिन स्वर्ण मुद्राएँ निकलती थीं। देवी ने उन्हें थैली दे दी। थैली प्राप्त होते ही मंदिर और कड़ाह अदृश्य हो गए।
अगले दिन कीर्तिध्वज वहाँ पहुँचे तो मंदिर को गायब देखकर दुखी हो गए। स्वर्ण मुद्राएँ नहीं मिलने के कारण उनका वर्षों पुराना दान-व्रत टूटने लगा। उन्होंने अन्न-जल त्याग दिया और उनका शरीर कमजोर होने लगा।
विक्रमादित्य उनके पास पहुँचे और दुख का कारण पूछा। कीर्तिध्वज ने उन्हें पूरी बात बता दी। तब विक्रमादित्य ने देवी से प्राप्त अक्षय स्वर्ण-थैली उनके हाथों में रख दी।
उन्होंने कहा कि अब कीर्तिध्वज को प्रतिदिन प्राणों का कष्ट सहने की आवश्यकता नहीं पड़ेगी और उनका दान-व्रत भी निरंतर चलता रहेगा।
जब कीर्तिध्वज को पता चला कि साधारण द्वारपाल के रूप में उनके सामने खड़े व्यक्ति वास्तव में उज्जयिनी के सम्राट विक्रमादित्य हैं, तो वे भाव-विभोर हो गए। उन्होंने कहा कि प्राणों की पीड़ा सहकर दान करना कठिन है, लेकिन इतनी कठिन तपस्या से प्राप्त अक्षय संपदा को बिना किसी स्वार्थ के दूसरे को सौंप देना उससे भी बड़ा त्याग है।
इस प्रकार वीर विक्रमादित्य ने सिद्ध किया कि सच्चा दानी वह नहीं, जो केवल अपनी संपत्ति में से कुछ दे; सच्चा दानी वह है, जो किसी दूसरे के धर्म, संकल्प और लोककल्याण की रक्षा के लिए अपना सबसे मूल्यवान अधिकार भी त्याग दे।
आज की सीख: मनुष्य की महानता उसके पास उपलब्ध धन से नहीं, बल्कि उस धन और शक्ति के उपयोग से निर्धारित होती है। अपनी प्रशंसा सुनने के बजाय सत्य की खोज करना और किसी दूसरे के अच्छे कार्य को आगे बढ़ाना ही वास्तविक नेतृत्व है।
टिप्पणी: यह प्रसंग उज्जैन के वीर विक्रमादित्य से संबंधित लोककथा-परंपरा और ‘सिंहासन बत्तीसी’ की कथाओं पर आधारित साहित्यिक प्रस्तुति है; इसे प्रमाणित ऐतिहासिक घटना के रूप में नहीं पढ़ा जाना चाहिए। विक्रमादित्य को परंपरा में उज्जैन का आदर्श राजा माना गया है, किंतु उनके काल और ऐतिहासिक पहचान को लेकर विद्वानों में मतभेद हैं।
