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जब पूरा जंगल एक घायल चिड़िया के साथ खड़ा हुआ

प्रकाशित: 17 September 2026, 4:42 pm

बहुत समय पहले एक विशाल जंगल में अनेक प्रकार के पशु-पक्षी रहते थे। उसी जंगल के बीच एक पुराना बरगद था, जिसकी डालियों पर गौरैया, कबूतर, मैना और तोतों के घोंसले थे। अलग-अलग स्वभाव और बोलियां होने के बावजूद वे संकट के समय एक-दूसरे की सहायता करते थे।

एक दिन कहीं से एक चालाक लोमड़ी जंगल में आई। उसने देखा कि सभी पशु-पक्षी मिल-जुलकर रहते हैं। उसे लगा कि यदि इनमें फूट डाल दी जाए तो शिकार करना आसान हो जाएगा।

लोमड़ी प्रतिदिन किसी एक पक्षी के पास जाकर दूसरे के विरुद्ध झूठी बात कहती। वह गौरैया से कहती, “कबूतर तुम्हारे बच्चों का दाना खा जाते हैं।” कबूतरों से कहती, “मैना तुम्हें इस पेड़ से हटाने की योजना बना रही है।” मैना से कहती, “तोते कहते हैं कि तुम्हारी आवाज जंगल का वातावरण खराब करती है।”

धीरे-धीरे बरगद के मित्र पक्षियों के बीच संदेह पैदा हो गया। उन्होंने एक-दूसरे से बातचीत बंद कर दी। अब कोई किसी के बच्चों की देखभाल नहीं करता था और न संकट में सहायता के लिए आगे आता था।

एक दिन जंगल में भयंकर आंधी आई। तेज हवा के कारण एक नन्ही गौरैया अपने घोंसले से गिरकर घायल हो गई। उसकी मां सहायता के लिए पुकारती रही, लेकिन पुराने विवादों के कारण कोई पक्षी आगे नहीं आया।

लोमड़ी पास की झाड़ियों में छिपकर इसी अवसर की प्रतीक्षा कर रही थी। जैसे ही वह घायल गौरैया की ओर बढ़ी, बरगद की सबसे बूढ़ी मैना ने उसे देख लिया। वह अपने पुराने मतभेद भूलकर जोर से चिल्लाई, “पहले इस बच्ची को बचाओ, बाकी शिकायतें बाद में कर लेना!”

उसकी आवाज सुनते ही कबूतरों का झुंड नीचे उतर आया। उन्होंने अपने पंख फैलाकर घायल गौरैया को घेर लिया। तोतों ने लोमड़ी की आंखों और सिर पर चोंच से प्रहार किया। मैना ने पूरे जंगल को सावधान कर दिया। कुछ ही क्षणों में हिरण, बंदर और हाथी भी वहां पहुंच गए। इतने पशु-पक्षियों को एक साथ देखकर लोमड़ी जान बचाकर भाग गई।

घायल गौरैया को सुरक्षित घोंसले में पहुंचा दिया गया। उसकी मां की आंखों में आंसू थे। उसने कहा, “आज मेरी बच्ची को किसी एक पक्षी ने नहीं, बल्कि पूरे जंगल ने बचाया है।”

बूढ़ी मैना ने सबको समझाया, “हमारे बीच मतभेद अचानक पैदा नहीं हुए थे। किसी ने हमारी भावनाओं, भय और संदेह का उपयोग करके हमें एक-दूसरे से दूर कर दिया था। हमने बात की होती तो झूठ उसी दिन समाप्त हो जाता।”

पक्षियों ने अपनी भूल स्वीकार की। उन्होंने निश्चय किया कि भविष्य में किसी के बारे में कोई बात सुनकर तुरंत विश्वास नहीं करेंगे। पहले संबंधित साथी से पूछेंगे, तथ्य जानेंगे और फिर निर्णय करेंगे।

कुछ दिनों बाद लोमड़ी फिर जंगल में आई, लेकिन अब उसकी झूठी बातों पर किसी ने विश्वास नहीं किया। सभी ने एक स्वर में कहा, “जो हमें बांटना चाहता है, वह हमारा हितैषी नहीं हो सकता।”

लोमड़ी सिर झुकाकर जंगल से चली गई। बरगद पर फिर से अलग-अलग पक्षियों की आवाजें गूंजने लगीं। वे आवाजें भिन्न थीं, लेकिन उनमें अब अविश्वास नहीं, अपनापन था।

नीति: अफवाह, आधी-अधूरी सूचना और भड़काऊ संदेश समाज को इतनी आसानी से नहीं तोड़ सकते, जितनी आसानी से हमारा बिना जांचे उन पर विश्वास करना तोड़ देता है। मतभेद स्वाभाविक हैं, लेकिन संवाद समाप्त होते ही छल करने वालों के लिए रास्ता खुल जाता है। संकट में जाति, भाषा, विचार और समुदाय नहीं—मनुष्यता काम आती है।