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पंचतंत्र की नीतिकथा : आधा घड़ा पानी

प्रकाशित: 15 September 2026, 3:40 pm

बहुत समय पहले एक राज्य में भयंकर अकाल पड़ा। नदियाँ सूख गईं, तालाबों की मिट्टी फट गई और कुओं का जल बहुत नीचे चला गया। राजा ने आदेश दिया कि प्रत्येक व्यक्ति को प्रतिदिन केवल एक घड़ा पानी दिया जाएगा।

उसी राज्य में धर्मदत्त नाम का एक व्यापारी रहता था। वह धनवान था, लेकिन अत्यंत कंजूस और स्वार्थी था। उसके घर के नीचे एक पुराना गुप्त कुआँ था, जिसमें पर्याप्त पानी बचा हुआ था। धर्मदत्त ने किसी को इसकी जानकारी नहीं दी। वह स्वयं भरपूर पानी इस्तेमाल करता, जबकि पड़ोसी प्यास से व्याकुल रहते।

एक दिन एक वृद्ध साधु उसके द्वार पर पहुँचे और बोले, “पुत्र! बहुत प्यास लगी है। एक लोटा पानी मिल जाए तो प्राण बच जाएँगे।”

धर्मदत्त ने उत्तर दिया, “महाराज! अकाल पड़ा है। हमारे पास स्वयं के लिए पानी नहीं है। आप कहीं और जाइए।”

साधु बिना कुछ कहे आगे बढ़ गए। कुछ दूर रहने वाली एक गरीब वृद्धा ने यह बातचीत सुन ली। उसके पास केवल आधा घड़ा पानी था, जो उसे पूरे दिन चलाना था। फिर भी उसने साधु को बुलाया और सम्मानपूर्वक एक लोटा पानी पिला दिया।

साधु ने पूछा, “माता! तुम्हारे पास स्वयं बहुत कम पानी है। फिर भी तुमने मुझे क्यों दिया?”

वृद्धा ने कहा, “महाराज! पानी बचाकर मैं एक दिन अधिक जीवित रह सकती हूँ, लेकिन किसी प्यासे को पानी न देकर जीवनभर अपने मन की दृष्टि में गिर जाऊँगी। मनुष्य का जीवन केवल अपने प्राण बचाने के लिए नहीं मिला।”

साधु प्रसन्न होकर चले गए।

उसी रात तेज भूकंप आया। धर्मदत्त के घर के नीचे बना गुप्त कुआँ धँस गया और उसका सारा पानी धरती में समा गया। मकान की दीवारें भी टूट गईं। घबराया हुआ धर्मदत्त सहायता के लिए बाहर निकला, लेकिन जिन पड़ोसियों से उसने अपना पानी छिपाया था, वे उससे मुँह मोड़ने लगे।

चलते-चलते वह उसी गरीब वृद्धा की झोपड़ी के पास पहुँचा। उसका गला सूख रहा था और पैरों में चलने की शक्ति नहीं बची थी। वृद्धा ने उसे देखा तो अपने आधे घड़े में बचा हुआ अंतिम लोटा पानी उसके सामने रख दिया।

धर्मदत्त ने आश्चर्य से पूछा, “मैंने किसी की सहायता नहीं की। उस प्यासे साधु को भी लौटा दिया था। फिर तुम मुझे अपना अंतिम पानी क्यों दे रही हो?”

वृद्धा ने शांत स्वर में कहा, “तुम्हारा व्यवहार तुम्हारे संस्कार थे; मेरा व्यवहार मेरे संस्कार हैं। दूसरे की कठोरता देखकर यदि मैं भी कठोर बन जाऊँ, तो मुझमें और तुममें क्या अंतर रह जाएगा?”

धर्मदत्त की आँखों से आँसू बहने लगे। उसने पहली बार समझा कि तिजोरी में रखा धन और छिपाकर रखा पानी संकट के समय मनुष्य की रक्षा नहीं करते। संकट में वही सद्भाव लौटकर आता है, जो हमने दूसरों को दिया होता है।

अगले दिन राजा के सैनिक राहत सामग्री लेकर गाँव पहुँचे। धर्मदत्त ने अपना बचा हुआ धन अकाल पीड़ितों की सहायता के लिए दे दिया। उसने गाँव में एक सार्वजनिक कुआँ बनवाने का संकल्प लिया और उसके प्रवेश द्वार पर लिखवाया—

“जल को रोककर रखने वाला केवल अपना घड़ा भरता है, लेकिन जल बाँटने वाला असंख्य हृदयों में अपना स्थान बना लेता है।”

नीति : विपत्ति में संग्रह से अधिक सहयोग काम आता है। मनुष्य की वास्तविक संपत्ति उसका धन नहीं, बल्कि वह सद्भाव है जो उसने दूसरों के हृदय में अर्जित किया है।