बाबा रामदेवजी : रूणीचा धाम विशेष (अंक – 7)
सातवाँ अंक
समाधि से संसार तक: बाबा रामदेवजी की अमर विरासत और रूणीचा का सबसे बड़ा पर्चा
भादवा की एकादशी का स्मरण आते ही बाबा रामदेवजी के भक्तों का मन रूणीचा की ओर मुड़ जाता है। लोकमान्यता के अनुसार इसी तिथि पर बाबा ने जीवित समाधि ली थी। भक्त इसे जीवन का अंत नहीं मानते; उनके लिए यह बाबा के लोकचेतना में सदा उपस्थित रहने का आरंभ है।
रामदेवरा का मंदिर बाबा का ‘अंतिम विश्राम स्थल’ माना जाता है। राजस्थान पर्यटन विभाग के अनुसार सभी धर्मों के लोग यहाँ आते हैं और भाद्रपद के विशाल मेले में रातभर भक्ति-गीत गाए जाते हैं।
बाबा का समाधि लेने का निर्णय
बाबा की समाधि से जुड़ी कई लोककथाएँ प्रचलित हैं। सामान्य मान्यता है कि उन्होंने अल्पायु में ही अपने सांसारिक दायित्व पूर्ण होने की घोषणा की और जीवित समाधि लेने का निर्णय किया। परिवार, भक्तों और प्रजा ने उन्हें रोकने का प्रयास किया, लेकिन बाबा ने समझाया कि शरीर नश्वर है और सत्यस्वरूप चेतना कभी समाप्त नहीं होती।
यह विवरण धार्मिक और लोकपरंपरा का हिस्सा है। तिथियों तथा घटनाक्रम के अलग-अलग संस्करण उपलब्ध हैं। किंतु कथा का आध्यात्मिक भाव स्पष्ट है—मनुष्य को शरीर और पद के अहंकार से ऊपर उठकर लोककल्याण के लिए जीना चाहिए।
डालीबाई की समाधि
लोककथा के अनुसार जब डालीबाई को बाबा के समाधि लेने का समाचार मिला, तो वे रूणीचा पहुँचीं और बाबा से पहले समाधि लेने का आग्रह किया। सरकारी पैनोरमा में भी इस प्रसंग का वर्णन है।
आज डालीबाई की समाधि बाबा की समाधि के निकट होना समानता की उस परंपरा को स्थायी रूप देता है जिसमें जन्म से अधिक भक्ति का महत्त्व है।
समाधि पर पहुँचते ही आँखें क्यों भर आती हैं?
लंबी यात्रा के बाद जब जातरू समाधि के सामने पहुँचता है, तो उसके मन में कई वर्षों की स्मृतियाँ एक साथ उमड़ आती हैं। घर का संकट, बीमारी, रोजगार की चिंता, संतान की कामना, किसी प्रियजन का बिछोह अथवा पूरी हुई मन्नत—सब कुछ उस एक क्षण में सामने आ जाता है।
कई श्रद्धालु समाधि के सामने शब्द भी नहीं बोल पाते। वे केवल सिर रखकर रोते हैं। यह रोना दुर्बलता नहीं, भीतर जमा भार का विसर्जन होता है।
भक्त कहता है—
“बाबा, म्हारी अरज थां जाणो।”
अर्थात मुझे सब कुछ कहने की आवश्यकता नहीं; आप मेरे मन की प्रार्थना जानते हैं।
मन्नत पूरी होने का अर्थ
किसी की मनोकामना पूरी होती है तो वह दोबारा यात्रा करता है। कोई नेजा चढ़ाता है, कोई राम रसोड़ा लगाता है, कोई प्रसाद बाँटता है और कोई जरूरतमंद व्यक्ति की सहायता करता है।
मन्नत का श्रेष्ठ रूप वह है जिसमें निजी प्रसन्नता समाज की सेवा में बदल जाए। यदि किसी की संतान स्वस्थ हुई तो वह किसी निर्धन बच्चे की पढ़ाई का खर्च उठा सकता है। यदि व्यापार में सफलता मिली तो वह यात्रियों के लिए भोजन अथवा चिकित्सा शिविर लगा सकता है। यदि रोग से राहत मिली तो रक्तदान अथवा रोगियों की सहायता कर सकता है।
यही बाबा की कृपा का सामाजिक प्रतिदान है।
प्रमुख पर्चों का समग्र संदेश
बाबा की लोकगाथाओं में भैरव का दमन, सारथिया खाती को जीवनदान, पाँच पीरों के पात्र मँगाना, बहन सुगना की सहायता, संकटग्रस्त व्यापारी की रक्षा, डालीबाई का समर्पण और अनेक भक्तों की मनोकामनाएँ पूरी होने जैसे प्रसंग मिलते हैं।
सरकारी सांस्कृतिक साहित्य में भी भैरव, सारथिया, पाँच पीर, बैलदेव, बहन सुगना और डालीबाई से संबंधित प्रसंगों का उल्लेख मिलता है।
इन कथाओं की संख्या और विवरण अलग-अलग गायन परंपराओं में बदलते हैं। अतः ‘चौबीस’, ‘बत्तीस’ अथवा किसी अन्य संख्या को निर्विवाद ऐतिहासिक सूची कहना कठिन है। लेकिन सभी पर्चों का केंद्रीय भाव लगभग एक है—
अत्याचार के विरुद्ध निर्भयता
पीड़ित के प्रति करुणा
जातिगत भेदभाव का विरोध
अतिथि और दूसरे धर्म का सम्मान
संकट में पड़े व्यक्ति की सहायता
गुरु, सत्य और भाव-भक्ति का महत्त्व
रूणीचा का सबसे बड़ा जीवित पर्चा
शायद बाबा का सबसे बड़ा पर्चा किसी प्राचीन कथा में नहीं, आज की यात्रा में दिखाई देता है। लाखों लोग सीमित साधनों के बावजूद सैकड़ों किलोमीटर की यात्रा करते हैं। हजारों लोग बिना किसी निजी लाभ के उनके लिए भोजन बनाते हैं। कोई अजनबी व्यक्ति दूसरे अजनबी के घायल पैर पर मरहम लगाता है। कोई परिवार अपनी गाड़ी रोककर थके पदयात्री को पानी देता है।
यह सब किस सरकारी आदेश से नहीं होता। इसके पीछे श्रद्धा है।
जब किसी नाम से लाखों मनुष्यों में सेवा जाग उठे, तो वह अपने आप में असाधारण सामाजिक शक्ति है। यही रूणीचा का जीवित पर्चा है।
लोक में बाबा की अमर उपस्थिति
राजस्थान के गाँवों में बाबा की ‘पगलियाँ’ स्थापित मिलती हैं। घरों में उनकी तस्वीर रहती है। विवाह, संतान-जन्म, नया व्यापार, नया वाहन और बीमारी से मुक्ति जैसे अवसरों पर उन्हें याद किया जाता है। अनेक परिवार प्रतिवर्ष ‘बाबे री बीज’ पर पूजा और जम्मा करते हैं।
भक्तों की बोली में भाव है—
“रूणीचा दूर सही, बाबा मन सूँ दूर नहीं।”
भौगोलिक दूरी चाहे हजार किलोमीटर हो, भक्त मानता है कि बाबा का स्मरण करते ही रूणीचा उसके हृदय में उपस्थित हो जाता है।
बाबा की भक्ति की वास्तविक परीक्षा
बाबा को विष्णु का अवतार मानना श्रद्धा का विषय है। लेकिन उनके अवतारी स्वरूप की वास्तविक स्वीकृति हमारे आचरण में दिखाई देनी चाहिए।
यदि हम बाबा के भक्त हैं तो हमें जाति के कारण किसी का अपमान नहीं करना चाहिए। धर्म के आधार पर वैर नहीं रखना चाहिए। कमजोर व्यक्ति को दबाना नहीं चाहिए। व्यापार में छल नहीं करना चाहिए। यात्रियों की सेवा के साथ अपने आसपास के भूखे, बीमार और अशिक्षित लोगों की चिंता भी करनी चाहिए।
केवल मेला भरने से परंपरा जीवित नहीं रहती; उसके मूल्यों को जीवन में उतारने से रहती है।
अंतिम भजन-स्मरण
“खम्मा-खम्मा रूणीचा रा धणी,
दुखियां री अरजी सुणजो धणी।”
यहाँ भक्त बाबा से अपना दुःख सुनने की प्रार्थना करता है। लेकिन संभव है कि बाबा का उत्तर भी यही हो—मैं तुम्हारी अरजी सुनूँगा, तुम भी अपने आसपास के दुःखी मनुष्य की अरजी सुनो।
रूणीचा की यात्रा समाधि पर समाप्त नहीं होती। वहाँ से लौटकर मनुष्य जब सेवा, समानता और सद्भाव का मार्ग अपनाता है, तब यात्रा पूर्ण होती है।
समापन-संदेश: बाबा का नेजा केवल मंदिर पर नहीं, हमारे चरित्र पर भी दिखाई देना चाहिए। हमारे शब्दों में करुणा, व्यवहार में समानता और हाथों में सेवा होगी, तो संसार के प्रत्येक कोने में रूणीचा धाम का प्रकाश पहुँचता रहेगा।
