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क्षमा पर्व: आत्मशुद्धि, अहिंसा और संबंधों को पुनर्जीवित करने का जैन दर्शन

प्रकाशित: 13 September 2026, 2:49 pm

भाद्रपद मास में जब देश के अनेक हिस्सों में गणेश चतुर्थी का उत्सव मनाया जाता है, लगभग उसी कालखंड में जैन समाज का सबसे महत्त्वपूर्ण आत्मशुद्धि पर्व—पर्युषण, संवत्सरी और क्षमावाणी—आता है। दोनों पर्वों का एक ही समय के आसपास पड़ना कैलेंडर का संयोग है; जैन क्षमा पर्व की अपनी स्वतंत्र धार्मिक परंपरा, साधना और दार्शनिक पृष्ठभूमि है।

जैन धर्म में क्षमा मांगना केवल सामाजिक औपचारिकता या शिष्टाचार नहीं, बल्कि आत्मा पर पड़े क्रोध, अहंकार, कपट, लोभ और वैर के आवरण को हटाने की आध्यात्मिक प्रक्रिया माना गया है। इसका उद्देश्य इतना भर नहीं कि हमारे कारण किसी व्यक्ति को दुख पहुंचा हो तो उससे “माफ कीजिए” कह दिया जाए। इसका वास्तविक अर्थ है—अपनी भूल को पहचानना, उसका पश्चात्ताप करना, उसे दोहराने से बचने का संकल्प लेना और मन में संचित प्रतिशोध को समाप्त करना।

क्षमा पर्व की ऐतिहासिक परंपरा

जैन परंपरा स्वयं को अनादि मानती है और क्षमा, अहिंसा तथा आत्मसंयम की शिक्षा को तीर्थंकरों की प्राचीन परंपरा से जोड़ती है। ऐतिहासिक दृष्टि से इसकी व्यवस्थित साधना भगवान महावीर और उनसे चली श्रमण परंपरा में स्पष्ट दिखाई देती है। वर्षा ऋतु में साधु-साध्वियां एक स्थान पर रहकर चातुर्मास करते थे, क्योंकि वर्षाकाल में भ्रमण करने से छोटे जीवों और वनस्पतियों को हानि पहुंचने की संभावना अधिक रहती थी। इसी स्थिर निवास के दौरान आत्मचिंतन, तप, स्वाध्याय, उपवास और ‘प्रतिक्रमण’ की साधना विशेष रूप से की जाती थी।

‘पर्युषण’ का सामान्य भाव अपने भीतर ठहरने, आत्मा के निकट रहने और सांसारिक विकारों से लौटकर आत्मनिरीक्षण करने से जुड़ा है। श्वेतांबर परंपरा में पर्युषण आठ दिनों तक मनाया जाता है और अंतिम दिन ‘संवत्सरी’ का विशेष प्रतिक्रमण होता है। कल्पसूत्र में भगवान महावीर के वर्षावास और पर्युषण से संबंधित उल्लेख मिलते हैं। उपलब्ध कल्पसूत्र की पाठ-परंपरा को विद्वान प्रारंभिक मध्यकाल तक सुव्यवस्थित मानते हैं, जबकि उसमें वर्णित धार्मिक अनुशासन उससे कहीं पुरानी श्रमण परंपरा से जुड़ा है। इसलिए क्षमा पर्व की कोई एक निश्चित “स्थापना-तिथि” बताना ऐतिहासिक रूप से उचित नहीं होगा।

दिगंबर जैन परंपरा में भाद्रपद शुक्ल पंचमी से अनंत चतुर्दशी तक ‘दशलक्षण पर्व’ मनाया जाता है। इसके दस धर्म हैं—उत्तम क्षमा, मार्दव, आर्जव, शौच, सत्य, संयम, तप, त्याग, आकिंचन्य और ब्रह्मचर्य। इसके बाद क्षमावाणी दिवस पर परस्पर क्षमा मांगी जाती है। इस प्रकार श्वेतांबर परंपरा में संवत्सरी और दिगंबर परंपरा में क्षमावाणी की तिथियां तथा अनुष्ठान कुछ अलग हो सकते हैं, लेकिन दोनों का मूल संदेश एक है—आत्मालोचन, प्रायश्चित्त, मैत्री और वैर का विसर्जन।

प्रतिक्रमण: अपने ही कदमों की समीक्षा

क्षमा पर्व की आत्मा ‘प्रतिक्रमण’ में निहित है। प्रतिक्रमण का अर्थ है—गलत दिशा में बढ़े कदमों से वापस लौटना। मनुष्य दिनभर अनेक प्रकार की हिंसा करता है। यह हिंसा केवल किसी को शारीरिक चोट पहुंचाना नहीं है; कटु वचन, अपमान, ईर्ष्या, छल, अनुचित लाभ, क्रोध, दुर्भावना और किसी के प्रति मन में वैर रखना भी हिंसा के ही रूप हैं।

संवत्सरी प्रतिक्रमण में पूरे वर्ष के आचरण का आत्मपरीक्षण किया जाता है। व्यक्ति विचार करता है कि उसने मन, वचन या शरीर से; जानकर या अनजाने में; प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप से किसी जीव को पीड़ा तो नहीं पहुंचाई। गलती स्वीकार करने के बाद वह प्रायश्चित्त करता है और संयमपूर्ण जीवन का संकल्प लेता है। प्राचीन उत्तराध्ययन सूत्र क्षमा मांगने को मन की प्रसन्नता, मैत्रीभाव, चारित्रिक शुद्धि और निर्भयता से जोड़ता है।

‘मिच्छामि दुक्कडम्’ का गहरा अर्थ

संवत्सरी के अवसर पर श्वेतांबर परंपरा में कहा जाता है—“मिच्छामि दुक्कडम्।” इसका सामान्य भाव है—मेरे द्वारा किया गया अनुचित कर्म निष्फल हो; मुझसे आपको कोई दुख पहुंचा हो तो मुझे क्षमा करें।

जैन क्षमा-प्रार्थना का व्यापक भाव इस सूत्र में प्रकट होता है—

“मैं सभी जीवों को क्षमा करता हूं। सभी जीव मुझे क्षमा करें। मेरी समस्त जीवों से मैत्री है और किसी से वैर नहीं है।”

इसमें दो समान रूप से महत्त्वपूर्ण बातें हैं। व्यक्ति केवल अपने लिए क्षमा नहीं मांगता, बल्कि पहले दूसरों को क्षमा भी करता है। जब तक मनुष्य स्वयं वैर छोड़ने को तैयार न हो, उसकी क्षमा-याचना अधूरी रहती है। दूसरी विशेषता यह है कि क्षमा का दायरा केवल परिवार, मित्रों अथवा मनुष्यों तक सीमित नहीं है; वह समस्त जीव-जगत तक फैला हुआ है। यही क्षमा को जैन अहिंसा का सक्रिय और सार्वभौमिक रूप बनाता है।

क्षमा कमजोरी नहीं, आत्मविजय है

सामान्य जीवन में क्षमा को कई बार कमजोरी समझ लिया जाता है। जैन दर्शन इसके ठीक विपरीत कहता है। क्रोध के क्षण में प्रतिकार करना सहज है, लेकिन अहंकार को रोककर सत्यपूर्वक अपनी गलती स्वीकार करना अत्यंत कठिन है। इसलिए कहा गया है—“क्षमा वीरस्य भूषणम्”, अर्थात क्षमा वीर का आभूषण है।

यह वीरता बाहरी शत्रु को जीतने की नहीं, अपने भीतर के क्रोध, मान, माया और लोभ को जीतने की है। जैन दर्शन में इन्हें ‘कषाय’ कहा गया है। ये आत्मा को अशांत करते हैं और कर्म-बंधन का कारण बनते हैं। क्षमा क्रोध की विरोधी शक्ति है। वह हिंसक प्रतिक्रिया की शृंखला को तोड़ती है और नए वैर को जन्म लेने से रोकती है। तत्त्वार्थसूत्र की व्याख्या-परंपरा क्षमा, आत्मसंयम और प्रायश्चित्त को कर्मों के प्रवाह को रोकने तथा आत्मशुद्धि का साधन मानती है।

आज के समाज में क्षमा पर्व का महत्त्व

आज परिवारों में छोटे विवाद वर्षों तक चलते हैं, व्यापारिक मतभेद व्यक्तिगत शत्रुता बन जाते हैं और सोशल मीडिया पर एक असहमति अपमान तथा घृणा में बदल जाती है। ऐसे समय में क्षमा पर्व हमें अपनी भाषा, व्यवहार और डिजिटल आचरण का भी वार्षिक लेखा-जोखा करने की प्रेरणा देता है।

व्यापारिक जीवन में इसका अर्थ है—अनुचित लाभ से बचना, वचन निभाना, समय पर भुगतान करना, गलती होने पर उसे स्वीकार करना और संबंधों को अहंकार से ऊपर रखना। पारिवारिक जीवन में इसका अर्थ है—पुराने तानों, शिकायतों और मनमुटाव को ढोते रहने के बजाय संवाद द्वारा उन्हें समाप्त करना। सामाजिक जीवन में इसका अर्थ है—मतभेद के बावजूद दूसरे व्यक्ति की गरिमा को स्वीकार करना।

लेकिन सच्ची क्षमा अन्याय को छिपाने या पीड़ित व्यक्ति पर समझौते का दबाव डालने का नाम नहीं है। जहां अधिकारों का उल्लंघन हुआ हो, वहां सत्य, उत्तरदायित्व और न्याय आवश्यक हैं। क्षमा का अर्थ अपराध को उचित ठहराना नहीं, बल्कि स्वयं को प्रतिशोध और स्थायी घृणा से मुक्त करना है। गंभीर भूल के बाद केवल संदेश भेज देना पर्याप्त नहीं; सुधार, क्षतिपूर्ति और भविष्य में गलती न दोहराने का संकल्प भी जरूरी है।

एक दिन नहीं, जीवन की साधना

यदि क्षमा केवल पर्व के दिन भेजा गया एक संदेश बनकर रह जाए और अगले दिन व्यवहार फिर वैसा ही हो जाए, तो उसका आध्यात्मिक उद्देश्य पूरा नहीं होता। क्षमा पर्व वास्तव में व्यक्ति को विनम्रता से यह स्वीकार करना सिखाता है कि उससे भी भूल हो सकती है। यह स्वीकारोक्ति अहंकार को छोटा और मनुष्यत्व को बड़ा करती है।

इस पर्व का सबसे सुंदर संदेश यही है—संबंधों को जीतने के लिए तर्क में जीतना आवश्यक नहीं; कभी-कभी अपनी भूल स्वीकार करना, किसी को क्षमा करना और प्रेमपूर्वक पुनः संवाद शुरू करना ही सबसे बड़ी विजय होती है।

“मन, वचन और कर्म से, जाने-अनजाने में, मेरे कारण किसी भी जीव को दुख पहुंचा हो तो मैं अंतःकरण से क्षमा चाहता हूं। मैं भी सभी को क्षमा करता हूं। मेरी सब जीवों से मैत्री है और किसी से वैर नहीं है—मिच्छामि दुक्कडम्।”