योगिराज श्री जलंधरनाथ जी महाराज (अंक–9)
अंक–9

जलंधरनाथ जी का योग-दर्शन और जालंधर बन्ध
जलंधरनाथ जी का दर्शन किसी एक लिखित ग्रंथ तक सीमित नहीं है। इसे नाथ परम्परा की योग-साधना, गुरु-भक्ति, वैराग्य, देह-साधना, सहजयान और उनसे जुड़ी कथाओं के माध्यम से समझा जाता है।
उनकी शिक्षाओं का मूल संदेश था कि मनुष्य की वास्तविक मुक्ति बाहर की दुनिया को जीतने से नहीं, बल्कि अपने भीतर के मन, प्राण, इच्छाओं और अहंकार पर विजय प्राप्त करने से होती है।
नाथ दर्शन शरीर को केवल नश्वर या अशुद्ध मानकर उसका तिरस्कार नहीं करता। शरीर को साधना का आवश्यक माध्यम माना जाता है। इसी शरीर में श्वास, प्राण, मन और चेतना का अनुभव होता है।
नाथ योगी शरीर को भोग का साधन नहीं, बल्कि योग की प्रयोगशाला मानता है। वह आहार, निद्रा, श्वास, वाणी और इन्द्रियों को अनुशासित करके शरीर को उच्च चेतना का पात्र बनाता है।
नाथ दर्शन का एक महत्वपूर्ण सिद्धान्त है—जो कुछ ब्रह्माण्ड में है, उसका सूक्ष्म रूप मानव शरीर अर्थात पिण्ड में भी विद्यमान है। इसलिए अंतिम आध्यात्मिक यात्रा बाहरी नहीं, अन्तर्मन की यात्रा मानी जाती है।
नाथ योग के अनुसार श्वास, प्राण और मन का गहरा संबंध है। इसी कारण प्राणायाम, मुद्रा, बन्ध और ध्यान को विशेष महत्व दिया गया।
जलंधरनाथ जी के नाम से प्रसिद्ध जालंधर बन्ध हठयोग की तीन प्रमुख बन्ध क्रियाओं में से एक माना जाता है। इसमें ठोड़ी को नियंत्रित ढंग से कंठ या वक्षस्थल की ओर टिकाकर प्राण के प्रवाह को साधने का अभ्यास किया जाता है।
इस बन्ध का सीधा ऐतिहासिक संबंध जलंधरनाथ जी से था या बाद की परम्परा ने इसे उनके नाम से जोड़ा, इस पर पूर्ण सहमति नहीं है।
ऐसी योगक्रियाएं योग्य गुरु के निर्देशन में ही करनी चाहिए।
