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बाबा रामदेवजी : रूणीचा धाम विशेष (अंक – 5)

प्रकाशित: 11 September 2026, 3:14 pm

पाँचवाँ अंक

डालीबाई की भक्ति: जिसे समाज ने पीछे रखा, बाबा ने अपने पास स्थान दिया

रामदेवरा में बाबा रामदेवजी की समाधि के समीप डालीबाई की समाधि स्थित है। इन दोनों समाधियों की निकटता केवल भौगोलिक नहीं, बल्कि एक महान सामाजिक संदेश की प्रतीक है। यह संदेश है—भक्ति में कोई ऊँचा या नीचा नहीं होता।

डालीबाई का नाम बाबा रामदेवजी की अनन्य भक्त, शिष्या और धर्मबहन के रूप में लिया जाता है। वे मेघवाल समुदाय से जुड़ी मानी जाती हैं। उनके जीवन की अधिकांश जानकारी लोककथाओं, मौखिक परंपराओं और बाद में लिखे गए साहित्य से आती है। राजस्थान हिस्ट्री कांग्रेस से संबंधित शोध सामग्री भी स्वीकार करती है कि डालीबाई के बारे में स्वतंत्र ऐतिहासिक स्रोत सीमित हैं।

इसलिए डालीबाई की कथा को ईमानदारी से लोकस्मृति के रूप में प्रस्तुत करना चाहिए। लेकिन यह लोकस्मृति इतनी शक्तिशाली है कि सदियों बाद भी लाखों श्रद्धालु बाबा के साथ डालीबाई को प्रणाम करते हैं।

वृक्ष के नीचे मिली बालिका

एक प्रचलित लोककथा के अनुसार डालीबाई बाल्यावस्था में बाबा को एक वृक्ष के नीचे मिली थीं। कथा के रूप अलग-अलग हैं। कहीं बाबा उन्हें अपनी धर्मबहन बनाकर घर लाते हैं, कहीं उनके पालन-पोषण और आध्यात्मिक दीक्षा का वर्णन मिलता है।

इस कथा का भाव यह है कि जिस बालिका का समाज में कोई सहारा नहीं था, उसे बाबा ने अपनापन और सम्मान दिया। डालीबाई केवल दया की पात्र बनकर नहीं रहीं; वे बाबा की सबसे प्रतिष्ठित भक्तों में गिनी गईं।

यहीं बाबा की सामाजिक दृष्टि दिखाई देती है। उन्होंने किसी व्यक्ति को उसकी जाति या जन्म से नहीं, उसके भाव और साधना से पहचाना।

डालीबाई की समाधि का लोकप्रसंग

राजस्थान सरकार के बाबा रामदेवजी पैनोरमा में ‘डालीबाई की जीवित समाधि’ का प्रसंग प्रस्तुत किया गया है। लोककथा के अनुसार जब डालीबाई को समाचार मिला कि बाबा समाधि लेने वाले हैं, तो वे दौड़ती हुई रूणीचा पहुँचीं। उन्होंने उस स्थान पर स्वयं समाधि लेने की इच्छा जताई जो बाबा के लिए तैयार किया गया था।

कथा कहती है कि डालीबाई ने बाबा से पहले समाधि ली और बाद में निकट ही बाबा की समाधि बनाई गई। यह धार्मिक लोकविश्वास है, जिसका स्वतंत्र समकालीन अभिलेख उपलब्ध नहीं है। फिर भी भक्त इसे गुरु के प्रति पूर्ण समर्पण का अद्वितीय उदाहरण मानते हैं।

डालीबाई कथा का सामाजिक अर्थ

डालीबाई का प्रसंग केवल भक्त और गुरु की कथा नहीं है। यह उस समाज के लिए प्रश्न भी है जो जन्म के आधार पर मनुष्यों का मूल्य निर्धारित करता रहा।

यदि बाबा की सबसे निकटस्थ भक्तों में एक वंचित समुदाय की महिला थीं, तो बाबा की पूजा करते हुए जातिगत भेदभाव कैसे उचित हो सकता है? यदि बाबा ने डालीबाई को अपने पास स्थान दिया, तो उनका भक्त किसी मनुष्य को मंदिर, भोजन, शिक्षा अथवा सामाजिक सम्मान से वंचित कैसे कर सकता है?

लोकभाव में कहा जाता है—

“बाबा रा दरबार में, भाव बड़ा—जात नहीं।”

यह बाबा की समतामूलक परंपरा को प्रकट करने वाली जन-अभिव्यक्ति है।

समाज के अंतिम व्यक्ति के देवता

बाबा रामदेवजी की लोकप्रियता मेहनतकश और सामाजिक रूप से वंचित समुदायों में विशेष रूप से दिखाई देती है। इसका कारण केवल चमत्कारों का विश्वास नहीं है। उनके भक्त मानते हैं कि बाबा ने उन लोगों को सम्मान दिया जिन्हें तत्कालीन समाज ने बराबरी नहीं दी थी।

डालीबाई के अतिरिक्त सारथिया खाती, रतना राइका, लक्खी बंजारा और हरजी भाटी जैसे भक्त-चरित्र इस व्यापक सामाजिक आधार को प्रकट करते हैं। इनके व्यवसाय, समुदाय और जीवनस्थितियाँ अलग थीं, लेकिन बाबा के साथ संबंध में सब समान थे।

डालीबाई के भजन

डालीबाई से जुड़े लोकभजनों में शरणागति, गुरु-भक्ति और विरह का स्वर मिलता है। अलग-अलग गायन परंपराओं में शब्द बदलते हैं। कहीं वे बाबा से अपने पास रहने की प्रार्थना करती दिखाई देती हैं तो कहीं बाबा की समाधि की सूचना सुनकर व्याकुल होकर दौड़ती हैं।

संक्षिप्त भक्ति-भाव है—

“डाली बाई री अरज, सुनो रूणीचा नाथ।”

ऐसी पंक्तियों को किसी एक प्राचीन प्रमाणित रचना का अंश मानने के बजाय लोकभक्ति के भाव के रूप में ग्रहण करना उचित है।

डालीबाई का पर्चा

डालीबाई के जीवन में कोई सोना बरसने अथवा महल खड़ा होने का चमत्कार सबसे महत्त्वपूर्ण नहीं है। उनका वास्तविक पर्चा यह है कि सामाजिक सीढ़ी के सबसे नीचे रखी गई महिला लोकदेवता की आध्यात्मिक परंपरा के केंद्र में स्थापित हो गई।

जिस समाज में जाति और लिंग दोनों के आधार पर भेदभाव था, वहाँ डालीबाई की समाधि बाबा की समाधि के समीप होना अपने आप में सामाजिक क्रांति का प्रतीक है।

वर्तमान समाज के लिए प्रश्न

आज लाखों लोग बाबा के मंदिरों में जाते हैं, नेजा चढ़ाते हैं और भजन गाते हैं। लेकिन यदि हमारे घर, सामाजिक संस्थाओं और धार्मिक आयोजनों में छुआछूत, जातिगत अपमान अथवा महिलाओं के प्रति भेदभाव बना रहता है, तो क्या हमने बाबा और डालीबाई की कथा को वास्तव में समझा?

डालीबाई हमें बताती हैं कि भक्त की महानता उसके वस्त्र, वंश या संपत्ति से नहीं मापी जा सकती। उसका समर्पण, सत्य और करुणा ही उसकी पहचान है।

भक्ति-संदेश: बाबा की समाधि पर चढ़ाया गया पुष्प तभी सार्थक होगा जब हमारे व्यवहार से किसी डालीबाई का अपमान न हो। जिसे समाज दूर बैठाता है, उसे सम्मान से अपने पास बैठाना बाबा रामदेवजी की सबसे बड़ी पूजा है।

अगले अंक में :- (लीले घोड़े रा असवार: नेजा, जम्मा, ब्यावला और तेरहताली की भक्तिमय दुनिया)