योगिराज श्री जलंधरनाथ जी महाराज (अंक–7)
अंक–7
बंगाल, सहजयान और तिब्बती परम्परा में जालंधरिपा

बंगाल और पूर्वी भारत में आठवीं से बारहवीं शताब्दी के बीच बौद्ध सिद्ध, सहजयान और वज्रयान परम्पराएं अत्यंत प्रभावशाली रहीं। इन परम्पराओं के सिद्धाचार्यों ने संस्कृत के साथ लोकभाषाओं और सांकेतिक भाषा में भी अपनी आध्यात्मिक अनुभूतियां व्यक्त कीं।
बौद्ध सिद्ध परम्परा में जलंधरनाथ जी को जालंधरिपा, जलंधरपाद या हाडिपा जैसे नामों से स्मरण किया जाता है। सहजयान और वज्रयान की परम्पराओं में उन्हें चौरासी महासिद्धों में स्थान दिया गया है।
‘पा’ अथवा ‘पाद’ शब्द का प्रयोग सिद्ध, गुरु या आचार्य के लिए किया जाता था। इससे स्पष्ट होता है कि उनकी प्रतिष्ठा केवल स्थानीय साधक के रूप में नहीं, बल्कि मान्य सिद्धाचार्य के रूप में थी।
उनके प्रमुख शिष्यों में कान्हपा, कान्हुपाद, कृष्णपाद अथवा कानिफनाथ का नाम विशेष रूप से लिया जाता है। कान्हपा बंगाल की चर्यापद परम्परा के प्रसिद्ध सिद्ध कवियों में गिने जाते हैं।
एक परम्परा के अनुसार जलंधरिपा ने कान्हपा को हेवज्र साधना की दीक्षा दी थी। यह गुरु-शिष्य संबंध महत्वपूर्ण है, क्योंकि कान्हपा को एक ओर बौद्ध सहजयान के सिद्ध कवि के रूप में देखा जाता है और दूसरी ओर महाराष्ट्र तथा उत्तर भारत की नाथ परम्परा में कानिफनाथ के रूप में सम्मानित किया जाता है।
तिब्बती वज्रयान में जलंधरिपा को प्रत्यक्ष आध्यात्मिक अनुभव, गुरु-दीक्षा और चेतना के रूपांतरण से जुड़े सिद्ध के रूप में देखा जाता है। उन्हें हेवज्र तंत्र की साधना और उसकी व्याख्या से भी जोड़ा जाता है, यद्यपि सभी ग्रंथों की रचनाकारिता और तिथियों पर पूर्ण सहमति नहीं है।
जलंधरनाथ जी का व्यक्तित्व इस प्रकार शैव नाथ योग और बौद्ध सिद्ध साधना के बीच एक महत्वपूर्ण सांस्कृतिक सेतु के रूप में दिखाई देता है।
क्रमशः… (अगले अंक में :कानिफनाथ, राजा गोपीचंद और गुरु-शिष्य परम्परा)
