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वीर विक्रमादित्य की अमर कथाएँ

प्रकाशित: 7 September 2026, 4:06 pm

पहला अंक

पद्मावती का रहस्य—सबसे बड़ा दोषी कौन?

उज्जयिनी के राजा वीर विक्रमादित्य भारतीय साहित्य और लोकमानस में साहस, न्याय, बुद्धि और वचनपालन के प्रतीक माने जाते हैं। वे कठिन से कठिन परिस्थिति में भी भयभीत नहीं होते थे और किसी निर्णय तक पहुँचने से पहले उसके प्रत्येक पक्ष पर विचार करते थे। ‘बेताल पच्चीसी’ की कथाओं में यही न्यायप्रिय राजा हर बार बेताल की उलझी हुई पहेलियों का उत्तर अपने विवेक से देता है।

योगी को दिया गया वचन

एक दिन राजा विक्रमादित्य के दरबार में एक योगी आया। उसने राजा को एक फल भेंट किया और बिना कुछ कहे चला गया। इसके बाद वह प्रतिदिन आता और राजा को एक फल देकर लौट जाता।

एक दिन संयोग से राजा का दिया हुआ फल नीचे गिरकर फूट गया। उसके भीतर से एक बहुमूल्य रत्न निकला। राजा ने पहले मिले सभी फल मँगवाकर देखे तो प्रत्येक फल में वैसा ही अनमोल रत्न छिपा हुआ था।

राजा ने योगी से पूछा, “आप प्रतिदिन मुझे इतने मूल्यवान रत्न क्यों दे रहे हैं?”

योगी ने कहा, “राजन्, मुझे एक कठिन साधना पूरी करनी है। उस साधना में मुझे आपके जैसे निर्भय और वचन के पक्के पुरुष की सहायता चाहिए।”

विक्रमादित्य ने उसकी सहायता करने का वचन दे दिया।

योगी ने कहा, “अमावस्या की रात नगर से दूर श्मशान में मेरे पास आइएगा। वहाँ एक पुराने वृक्ष पर एक शव लटका हुआ है। आप उसे उतारकर मेरे पास ले आइए।”

अंधेरी रात और श्मशान

अमावस्या की रात आकाश में घना अंधकार छाया हुआ था। तेज हवा चल रही थी। श्मशान में जलती चिताओं का धुआँ उठ रहा था और दूर-दूर तक जंगली जीवों की आवाजें सुनाई दे रही थीं।

लेकिन वीर विक्रमादित्य बिना डरे उस वृक्ष तक पहुँचे। उन्होंने देखा कि उसकी एक ऊँची शाखा पर एक शव उलटा लटका हुआ था।

राजा पेड़ पर चढ़े, रस्सी काटी और शव को नीचे उतार लिया। शव धरती पर गिरते ही जोर-जोर से हँसने लगा और अगले ही क्षण उड़कर फिर उसी शाखा से जा लटका।

राजा समझ गए कि उस शव में कोई बेताल रह रहा है।

उन्होंने दोबारा पेड़ पर चढ़कर शव को उतारा, उसे अपने कंधे पर रखा और योगी की ओर चल पड़े।

तभी बेताल बोला, “राजा विक्रम! रास्ता बहुत लंबा है। समय बिताने के लिए मैं तुम्हें एक कथा सुनाता हूँ। लेकिन मेरी एक शर्त है। तुम पूरे रास्ते मौन रहोगे। यदि जानते हुए भी मेरे प्रश्न का उत्तर नहीं दोगे तो तुम्हारा सिर फट जाएगा और यदि बोलोगे तो मैं वापस इसी वृक्ष पर आ जाऊँगा।”

राजा शांत रहे और बेताल ने अपनी पहली कथा आरंभ की।

राजकुमार वज्रमुकुट और रहस्यमयी युवती

काशी में प्रतापमुकुट नामक राजा राज्य करता था। उसका पुत्र वज्रमुकुट अत्यंत सुंदर और पराक्रमी था। राजकुमार की अपने मंत्री के बुद्धिमान पुत्र से गहरी मित्रता थी।

एक दिन दोनों मित्र शिकार करते हुए वन में बहुत दूर निकल गए। वहाँ उन्हें एक सुंदर सरोवर दिखाई दिया। सरोवर के किनारे कुछ युवतियाँ स्नान कर रही थीं। उनमें एक राजकुमारी जैसी सुंदर युवती भी थी।

राजकुमार की दृष्टि उस युवती पर पड़ी तो वह उसे देखता ही रह गया। युवती ने भी राजकुमार को देखा, लेकिन उसने बोलकर अपना परिचय नहीं दिया। उसने कमल का एक फूल उठाया और संकेतों से कुछ बताने लगी।

पहले उसने कमल को अपने कान से लगाया। फिर उसे दाँतों से दबाया। इसके बाद फूल को अपने पैर के नीचे रखा और अंत में उसे अपने हृदय से लगा लिया।

इतना करके वह अपनी सखियों के साथ चली गई।

राजकुमार उसके प्रेम में पड़ चुका था, लेकिन वह यह नहीं जानता था कि युवती कौन थी और कहाँ रहती थी। उसने निराश होकर अपने मित्र से कहा, “उसने कुछ कहा भी नहीं। अब मैं उसे कहाँ खोजूँगा?”

मंत्री का पुत्र मुस्कराया और बोला, “मित्र, उसने अपना पूरा परिचय दे दिया है। कमल को कान से लगाने का अर्थ है कि वह कर्णाटक प्रदेश से है। दाँतों से दबाने का संकेत है कि उसके पिता का नाम दंतवाट है। फूल को पैर के नीचे रखने से उसने अपना नाम पद्मावती बताया और हृदय से लगाकर संकेत दिया कि उसने तुम्हें अपने हृदय में स्थान दे दिया है।”

दोनों मित्र पद्मावती की खोज में निकल पड़े और अंततः उसके नगर पहुँच गए। वहाँ उन्हें एक वृद्धा मिली, जो कभी राजकुमारी की परिचारिका रह चुकी थी। राजकुमार ने उसे अपना संदेश लेकर पद्मावती के पास भेजा।

पद्मावती ने भी संकेतों के माध्यम से मिलने का समय और मार्ग बता दिया। निर्धारित रात को राजकुमार गुप्त मार्ग से उसके महल पहुँचा। दोनों की भेंट हुई और कुछ समय तक वे इसी प्रकार मिलते रहे।

मंत्रीपुत्र को हटाने का प्रयास

एक दिन पद्मावती को पता चला कि उसके संकेतों का अर्थ राजकुमार ने स्वयं नहीं, बल्कि मंत्री के बुद्धिमान पुत्र ने समझा था। उसे भय हुआ कि यह व्यक्ति भविष्य में उनके संबंध में बाधा बन सकता है।

उसने राजकुमार को कुछ मिठाइयाँ देते हुए कहा, “इन्हें अपने मित्र के लिए ले जाइए।”

मंत्री के पुत्र को संदेह हुआ। उसने मिठाई का थोड़ा-सा हिस्सा एक कुत्ते को खिलाया। मिठाई खाते ही कुत्ता मर गया। स्पष्ट था कि उसमें विष मिला हुआ था।

मंत्रीपुत्र ने राजकुमार से कहा, “पद्मावती ने मुझे मरवाने का प्रयास किया है। अब हमें यहाँ से सुरक्षित निकलने के लिए एक उपाय करना होगा।”

दोनों ने पद्मावती को दोषी सिद्ध करने के लिए छलपूर्ण योजना बनाई। उन्होंने उसके कुछ आभूषण अपने पास ले लिए और उसकी जाँघ पर त्रिशूल जैसा निशान बना दिया।

अगले दिन मंत्रीपुत्र साधु का वेश बनाकर श्मशान में बैठ गया। राजकुमार पद्मावती का एक बहुमूल्य हार बेचने बाजार पहुँचा। सैनिकों ने राजकुमार को पकड़ लिया और राजा के सामने उपस्थित किया।

पूछने पर राजकुमार ने कहा कि यह हार उसे श्मशान में बैठे उसके गुरु ने दिया है।

राजा ने उस साधु को बुलाया। साधु बने मंत्रीपुत्र ने कहा, “रात को मैंने श्मशान में कुछ मायावी स्त्रियों को देखा था। उनमें से एक के पास यह हार था। मैंने उसका हार ले लिया और उसकी जाँघ पर त्रिशूल का निशान बना दिया।”

राजा ने जाँच करवाई तो पद्मावती के शरीर पर वैसा ही निशान मिला। बिना पूरा सत्य जाने राजा ने मान लिया कि पद्मावती कोई मायावी स्त्री है। उसने उसे राज्य से निकालने का आदेश दे दिया।

राजकुमार और मंत्रीपुत्र पहले से जंगल में उसकी प्रतीक्षा कर रहे थे। निर्वासित पद्मावती वहाँ पहुँची तो वे उसे अपने साथ ले गए।

बेताल का प्रश्न

इतनी कथा सुनाने के बाद बेताल ने विक्रमादित्य से पूछा—

“राजन्! पद्मावती ने मंत्रीपुत्र को विष देकर मरवाने का प्रयास किया। राजकुमार और मंत्रीपुत्र ने छल करके उसे अपराधी सिद्ध कराया। राजा ने बिना उचित जाँच के उसे राज्य से निकाल दिया। बताओ, इन सबमें सबसे बड़ा दोषी कौन था?”

राजा विक्रमादित्य ने उत्तर दिया—

“पद्मावती का विष देना अनुचित था। राजकुमार और मंत्रीपुत्र ने भी छल किया। परंतु सबसे बड़ा दोष उस राजा का था जिसने बिना पूरी जाँच किए न्याय कर दिया। राजकुमार और मंत्रीपुत्र निजी स्वार्थ और भय से प्रेरित थे, लेकिन राजा के हाथ में न्याय की शक्ति थी। उसका कर्तव्य था कि वह दोनों पक्षों को सुनता, प्रमाणों की परीक्षा करता और सत्य का पता लगाता। न्यायासन पर बैठा व्यक्ति बिना जाँच के निर्णय करे तो उसका दोष सबसे बड़ा माना जाएगा।”

बेताल जोर से हँसा और बोला, “राजा विक्रम! तुम्हारा निर्णय न्यायपूर्ण है। लेकिन तुमने मौन तोड़ दिया, इसलिए मैं फिर चला!”

इतना कहकर वह राजा के कंधे से उड़ गया और वापस उसी वृक्ष पर जा लटका।

विक्रमादित्य तनिक भी विचलित नहीं हुए। वे फिर श्मशान की ओर मुड़े और बेताल को उतारने के लिए उस वृक्ष पर चढ़ गए।

कथा की सीख

न्याय केवल सामने दिखाई देने वाले प्रमाण पर नहीं किया जा सकता। न्याय करने वाले का पहला धर्म है—दोनों पक्षों को सुनना, तथ्यों की पूरी जाँच करना और उसके बाद निष्पक्ष निर्णय देना।