योगिराज श्री जलंधरनाथ जी महाराज (अंक–6)
अंक–6

पंजाब, हिमालय और नेपाल में जलंधरनाथ परम्परा
जलंधरनाथ जी महाराज का व्यक्तित्व किसी एक स्थान या धार्मिक शाखा तक सीमित नहीं रहा। उनकी स्मृति पंजाब, उत्तर भारत, हिमालय और नेपाल की नाथ तथा सिद्ध परम्पराओं में भी सुरक्षित है।
जलंधरनाथ नाम को पंजाब के जालंधर क्षेत्र से जोड़ने वाली परम्परा अत्यंत प्रसिद्ध है। प्राचीन भारत में जालंधर क्षेत्र शैव, शाक्त और तांत्रिक साधना का महत्वपूर्ण केन्द्र रहा है।
हिमालय की तलहटी में स्थित होने के कारण यह क्षेत्र मैदानी भारत और पर्वतीय साधना-स्थलों के बीच सेतु की तरह था। यहां से साधक कांगड़ा, हिमाचल, जम्मू, कश्मीर और अन्य हिमालयी क्षेत्रों की ओर जा सकते थे।
कुछ परम्पराओं में माना जाता है कि जलंधरनाथ जी ने इस क्षेत्र में साधना की और इसी कारण उन्हें जलंधरनाथ या जालंधरिपा कहा गया। कुछ विद्वानों का मत है कि किसी प्रसिद्ध साधना-क्षेत्र से संबंध स्थापित होने के बाद यह नाम या उपाधि प्रचलित हुई।
नाथ योगियों के लिए हिमालय केवल पर्वत नहीं, बल्कि तप, मौन और आत्मविजय का प्रतीक रहा है। पर्वत, गुफाएं, निर्जन वन और श्मशान साधना के प्रमुख स्थल माने जाते थे।
तिब्बती परम्परा की एक कथा में जलंधरिपा के श्मशान में ध्यान करने और किसी योगिनी या डाकिनी से साधना का मार्गदर्शन प्राप्त करने का उल्लेख मिलता है। इसका आध्यात्मिक अर्थ यह है कि मृत्यु का चिंतन मनुष्य को जीवन की नश्वरता समझाता है।
नेपाल में नाथ योगियों की प्राचीन और प्रभावशाली परम्परा रही है। मत्स्येन्द्रनाथ और गोरखनाथ के अनेक तीर्थ वहां प्रसिद्ध हैं। जलंधरनाथ जी भी नाथ गुरु-परम्परा के प्रमुख सिद्ध के रूप में नेपाल की धार्मिक स्मृति में प्रतिष्ठित हैं।
नेपाल भारत और तिब्बत के बीच योग, मंत्र, तंत्र, ध्यान और गुरु-शिष्य परम्परा के आदान-प्रदान का महत्वपूर्ण केन्द्र रहा।
क्रमशः… (अगले अंक में :बंगाल, सहजयान और तिब्बती परम्परा में जालंधरिपा)
