श्रीमद्भगवद्गीता का कर्म-धर्म: पूजा से आगे, जीवन में उतरने वाला धर्म (अंक -3)
चौथा अंक
धर्म सत्ता पाने का साधन है या सबके कल्याण का मार्ग?
धर्म और शासन का संबंध भारत में बहुत पुराना है। शासक से न्याय, सत्य, करुणा और लोककल्याण की अपेक्षा की गई है। लेकिन धर्म से प्रेरित शासन और सत्ता प्राप्त करने के लिए धर्म के उपयोग में बड़ा अंतर है।
धर्म शासन को मर्यादा दे सकता है, लेकिन यदि धर्म को भय, घृणा, विभाजन या चुनावी लाभ का साधन बनाया जाए, तो यह धर्म का पालन नहीं, धर्म का उपयोग है।
श्रीकृष्ण का लोकसंग्रह
गीता में श्रीकृष्ण कहते हैं कि श्रेष्ठ व्यक्ति जैसा आचरण करता है, सामान्य लोग उसका अनुसरण करते हैं—
“यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जनः।”
—अध्याय 3, श्लोक 21
इसलिए शासक, नेता, धर्मगुरु, अधिकारी और समाज के प्रभावशाली लोगों की जिम्मेदारी सामान्य व्यक्ति से अधिक है। वे जो बोलते हैं, उससे कहीं अधिक महत्वपूर्ण है कि वे क्या करते हैं।
श्रीकृष्ण कर्म करने का एक उद्देश्य “लोकसंग्रह” बताते हैं। इसका सरल अर्थ है—समाज को जोड़े रखना, व्यवस्था को संभालना और सबके कल्याण के लिए काम करना।
यदि राजनीति लोगों को जोड़ती है, न्याय दिलाती है, गरीब को अवसर देती है और निर्बल की रक्षा करती है, तो उसमें धर्म की भावना हो सकती है। लेकिन यदि धर्म के नाम पर लोगों को बांटा जाए, विरोधी को शत्रु बताया जाए और वास्तविक समस्याओं से ध्यान हटाया जाए, तो वह लोकसंग्रह नहीं है।
धार्मिकता की कसौटी: द्वेष या करुणा?
भक्त के गुण बताते हुए श्रीकृष्ण कहते हैं—
“अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्रः करुण एव च।”
—अध्याय 12, श्लोक 13
अर्थात सच्चा भक्त किसी प्राणी से द्वेष नहीं करता। वह सबके प्रति मैत्री और करुणा रखता है।
यह श्लोक धर्म के राजनीतिक उपयोग की सबसे सरल कसौटी देता है। जिस भाषण से मनुष्यों के बीच घृणा बढ़े, जिसमें किसी समुदाय को डराया या अपमानित किया जाए, उसे केवल धार्मिक शब्दों के कारण धर्म नहीं माना जा सकता।
गीता के सोलहवें अध्याय में दैवी गुणों में निर्भयता, मन की शुद्धि, दान, संयम, सत्य, अहिंसा, क्रोध का अभाव, दया, क्षमा और अहंकार का अभाव बताया गया है। किसी व्यक्ति की धार्मिकता को उसके नारों से नहीं, इन गुणों से जांचना चाहिए।
शासन का कर्म-धर्म
शासन का धर्म किसी एक वर्ग को प्रसन्न करना नहीं, सभी नागरिकों के साथ न्याय करना है। सरकार के लिए अस्पताल ठीक चलाना, विद्यालयों में शिक्षक देना, कमजोर की सुरक्षा करना, भ्रष्टाचार रोकना और न्यायपूर्ण व्यवस्था बनाना भी धर्म है।
जनता को भी केवल धार्मिक पहचान देखकर प्रतिनिधि नहीं चुनना चाहिए। उसे देखना चाहिए कि उम्मीदवार ईमानदार है या नहीं, योग्य है या नहीं और जनहित के काम कर सकता है या नहीं।
जो व्यक्ति मंच से धर्म की बड़ी-बड़ी बातें करे, लेकिन सत्ता मिलने पर अन्याय करे, वह गीता के कर्म-धर्म की कसौटी पर सफल नहीं माना जा सकता। वहीं कोई व्यक्ति कम धार्मिक प्रदर्शन करे, लेकिन ईमानदारी से जनता की सेवा करे, तो उसका कर्म धर्म के अधिक निकट हो सकता है।
कृष्ण की पूजा और कृष्ण का मार्ग
श्रीकृष्ण की मूर्ति के आगे सिर झुकाना श्रद्धा है। लेकिन अहंकार, झूठ और अन्याय को न छोड़ना अधूरी श्रद्धा है। जन्माष्टमी पर झांकी सजाना सुंदर है, लेकिन जीवन में कृष्ण के गुण उतारना उससे भी अधिक आवश्यक है।
कृष्ण हमें कर्म से भागना नहीं, उचित कर्म करना सिखाते हैं। वे अंधानुकरण नहीं, विचार करना सिखाते हैं। वे दिखावे का यज्ञ नहीं, समर्पित कर्म सिखाते हैं। वे द्वेष नहीं, लोकसंग्रह सिखाते हैं। वे सत्ता का अहंकार नहीं, शक्ति का न्यायपूर्ण उपयोग सिखाते हैं।
इस जन्माष्टमी पर हमें स्वयं से पूछना चाहिए—
क्या हमारी पूजा ने हमें अधिक सत्यवादी बनाया?
क्या हमारी कथा ने हमें अधिक करुणामय बनाया?
क्या हमारे धर्म ने हमें अन्याय के विरुद्ध खड़ा किया?
क्या हमारे कर्म से किसी निर्बल का जीवन आसान हुआ?
क्या धर्म हमें जोड़ रहा है या हम धर्म के नाम पर बंट रहे हैं?
यदि इन प्रश्नों का उत्तर हमारे आचरण में दिखाई देता है, तभी जन्माष्टमी का उत्सव सार्थक होगा।
श्रीकृष्ण को केवल मंदिर में खोजना पर्याप्त नहीं है। उन्हें उस किसान के परिश्रम में, उस मजदूर के पसीने में, उस शिक्षक की ईमानदारी में, उस चिकित्सक की सेवा में, उस व्यापारी की सच्चाई में और उस शासक के न्याय में भी देखना होगा।
कृष्ण का सच्चा स्मरण केवल उनका नाम लेना नहीं—सत्य को समझना, धर्म के पक्ष में खड़ा होना और निष्काम भाव से लोककल्याण का कर्म करना है।
