भारतीय जीवन के सर्वाधिक उपयोगी खेल हैं कबड्डी और खो-खो
लेखक: बाबूलाल सुंदेशा
संपादक एवं सेवानिवृत्त वरिष्ठ खेल प्रशिक्षक
जीवन में खेलों का महत्व केवल मनोरंजन या प्रतियोगिता तक सीमित नहीं है। खेल मनुष्य को स्वस्थ शरीर, सजग मस्तिष्क, अनुशासित जीवन और सामूहिकता की भावना प्रदान करते हैं। भारत जैसे विशाल और ग्रामीण संस्कृति वाले देश में ऐसे खेलों की आवश्यकता है, जिन्हें कम साधनों में हर आयु और आर्थिक वर्ग के बच्चे एवं युवा खेल सकें। इस दृष्टि से कबड्डी और खो-खो भारत के सबसे उपयोगी खेलों में शामिल हैं।
पुराने समय में जब मनोरंजन के आधुनिक साधन उपलब्ध नहीं थे, तब गांवों और कस्बों में कबड्डी एवं खो-खो जैसे खेल लोगों के मनोरंजन, व्यायाम और आपसी मेल-जोल का प्रमुख माध्यम हुआ करते थे। विद्यालयों के मैदानों, गांवों की चौपालों और खुले स्थानों पर बच्चे तथा युवा उत्साहपूर्वक इन खेलों में भाग लेते थे। इनसे शरीर का व्यायाम होने के साथ ही सामाजिक संबंध भी मजबूत होते थे।
आज मोबाइल फोन, इंटरनेट, वीडियो गेम और टेलीविजन ने मनोरंजन के अनेक साधन उपलब्ध करा दिए हैं, लेकिन इनके अत्यधिक उपयोग के कारण बच्चों और युवाओं की शारीरिक सक्रियता कम होती जा रही है। मोटापा, कमजोरी, तनाव, एकाकीपन और जीवनशैली से जुड़ी अनेक समस्याएं बढ़ रही हैं। ऐसे समय में कबड्डी और खो-खो जैसे पारंपरिक खेलों को पुनः प्रोत्साहित करना अत्यंत आवश्यक है।

कबड्डी शक्ति, गति, साहस, श्वास नियंत्रण, चतुराई और तत्काल निर्णय लेने की क्षमता का खेल है। इसमें खिलाड़ी को विरोधी क्षेत्र में जाकर अंक प्राप्त करने के साथ सुरक्षित वापस लौटना होता है। इसके लिए केवल शारीरिक बल पर्याप्त नहीं होता, बल्कि मानसिक सजगता, रणनीति और साथियों के साथ बेहतर तालमेल भी आवश्यक होता है। एक खिलाड़ी की छोटी-सी गलती पूरी टीम के परिणाम को प्रभावित कर सकती है। इसलिए कबड्डी व्यक्ति को सावधानी, जिम्मेदारी और सामूहिक हित का महत्व सिखाती है।
इसी प्रकार खो-खो गति, फुर्ती, संतुलन और समझदारी का खेल है। इसमें सही समय पर दिशा बदलना, साथी को ‘खो’ देना और विरोधी खिलाड़ी की चाल को समझना अत्यंत महत्वपूर्ण होता है। यह खेल शरीर को लचीला बनाता है तथा मस्तिष्क को सक्रिय रखता है। इसमें प्रत्येक खिलाड़ी को अपनी भूमिका के साथ-साथ पूरी टीम की रणनीति को भी समझना पड़ता है।

कबड्डी और खो-खो की सबसे बड़ी विशेषता उनकी मितव्ययिता है। इन्हें खेलने के लिए महंगे उपकरण, विशेष पोशाक या अत्यधिक विकसित मैदान की आवश्यकता नहीं होती। सामान्य खुले मैदान और निर्धारित सीमाओं के माध्यम से इनका आयोजन किया जा सकता है। यही कारण है कि आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के बच्चे भी इन खेलों में समान रूप से भाग ले सकते हैं। ये खेल अमीर-गरीब और ग्रामीण-शहरी का भेद मिटाकर सभी को एक मैदान पर समान अवसर देते हैं।
इन दोनों खेलों से अनुशासन, नेतृत्व, पारस्परिक सहयोग और टीम भावना विकसित होती है। खिलाड़ी यह सीखता है कि व्यक्तिगत योग्यता का वास्तविक महत्व तभी है, जब उसका उपयोग पूरी टीम की सफलता के लिए किया जाए। जीत मिलने पर विनम्र बने रहना और हार के बाद अपनी कमियों को सुधारकर दोबारा प्रयास करना भी खेलों से ही सीखा जा सकता है। यही गुण आगे चलकर व्यक्ति को परिवार, समाज और कार्यक्षेत्र में जिम्मेदार नागरिक बनाते हैं।
भारत के विद्यालयों, महाविद्यालयों और ग्रामीण क्षेत्रों में कबड्डी तथा खो-खो की नियमित प्रतियोगिताएं आयोजित की जानी चाहिए। प्रत्येक विद्यालय में इन खेलों के लिए निश्चित समय, मैदान और प्रशिक्षक की व्यवस्था होनी चाहिए। गांवों में पंचायतों, सामाजिक संस्थाओं और युवा मंडलों को स्थानीय प्रतियोगिताओं का आयोजन करना चाहिए। प्रतिभाशाली खिलाड़ियों की पहचान कर उन्हें जिला, राज्य और राष्ट्रीय स्तर तक पहुंचाने के प्रयास भी आवश्यक हैं।
कबड्डी और खो-खो केवल हमारे पारंपरिक खेल नहीं, बल्कि स्वस्थ, अनुशासित और सहयोगी समाज के निर्माण के सशक्त माध्यम हैं। इन खेलों में मनोरंजन भी है, स्वास्थ्य भी है, रणनीति भी है और सामूहिक जीवन का प्रशिक्षण भी। भारत की परिस्थितियों को देखते हुए इतने कम खर्च में इतने अधिक शारीरिक, मानसिक और सामाजिक लाभ देने वाले खेल बहुत कम हैं। अतः कबड्डी और खो-खो को हमारे खेल-संस्कार, विद्यालयी शिक्षा और ग्रामीण जीवन में पुनः प्रमुख स्थान दिया जाना चाहिए।
