ब्रेकिंग न्यूज़
उत्सव और इवेंट्स

रक्षाबंधन: रक्षा, उत्तरदायित्व और पारिवारिक विश्वास का सांस्कृतिक पर्व

प्रकाशित: 26 August 2026, 2:21 pm

लेखक: धर्मेंद्र सुंदेशा

श्रावण मास की पूर्णिमा को मनाया जाने वाला रक्षाबंधन भारतीय संस्कृति का अत्यंत आत्मीय पर्व है। सामान्यतः इसे भाई-बहन के प्रेम और भाई द्वारा बहन की रक्षा के संकल्प से जोड़ा जाता है, परंतु इसका मूल शास्त्रीय स्वरूप इससे अधिक व्यापक है। “रक्षा” का अर्थ केवल किसी बाहरी संकट से बचाना नहीं, बल्कि धर्म, मर्यादा, सम्मान और आत्मीय संबंधों की रक्षा करना भी है। “बंधन” का अर्थ ऐसा सूत्र है, जो व्यक्ति को उसके कर्तव्य से जोड़ता है।

यह कहना पूरी तरह सही नहीं होगा कि रक्षाबंधन केवल भारत में ही मनाया जाता है। इसका मुख्य सांस्कृतिक केंद्र भारत अवश्य है, लेकिन नेपाल में यह जनै पूर्णिमा अथवा ऋषितर्पणी के रूप में मनाया जाता है। भारतीय और हिंदू समुदायों के कारण विश्व के अनेक देशों में भी राखी का उत्सव प्रचलित है।

रक्षाबंधन का शास्त्रीय आधार

रक्षाबंधन का प्रमुख शास्त्रीय उल्लेख भविष्य पुराण के उत्तरपर्व, अध्याय 137 में मिलता है। इसमें भगवान श्रीकृष्ण युधिष्ठिर को श्रावण पूर्णिमा के दिन रक्षा-विधान करने की विधि बताते हैं। इस विधान में पुरोहित द्वारा मंत्रोच्चार के साथ राजा की दाहिनी कलाई पर रक्षा-सूत्र बांधने का वर्णन है। इसके बाद समाज के अन्य वर्गों के लिए भी रक्षा-सूत्र धारण करने का विधान बताया गया है।

इस अवसर पर बोला जाने वाला प्रसिद्ध मंत्र है—

येन बद्धो बली राजा दानवेन्द्रो महाबलः।
तेन त्वामभिबध्नामि रक्षे मा चल मा चल॥

इसका भावार्थ है—“जिस रक्षा-सूत्र से महाबली दानवराज बलि को बांधा गया था, उसी से मैं तुम्हें बांधता हूं। हे रक्षा-सूत्र! तुम अडिग रहना और इसकी रक्षा करना।”

ध्यान देने योग्य बात यह है कि इसे प्रायः “वैदिक मंत्र” कहा जाता है, जबकि इसका उपलब्ध स्पष्ट पाठ भविष्य पुराण की रक्षा-विधि में मिलता है। इसलिए इसे “पौराणिक रक्षा-सूत्र मंत्र” कहना अधिक तथ्यसम्मत है।

इंद्र और दानवों के युद्ध से जुड़ी परंपरा में भी रक्षा-सूत्र का महत्व बताया गया है। कथा के अनुसार इंद्राणी अर्थात शची ने मंत्रों से अभिमंत्रित रक्षा-सूत्र इंद्र की कलाई पर बांधा, जिसके बाद वे युद्ध में विजयी हुए। इससे स्पष्ट होता है कि रक्षा-सूत्र का प्रारंभिक अर्थ केवल बहन द्वारा भाई को राखी बांधना नहीं था। पत्नी पति को, पुरोहित यजमान को तथा कोई शुभचिंतक दूसरे व्यक्ति को मंगल और सुरक्षा की कामना से रक्षा-सूत्र बांध सकता था। बाद में यह परंपरा भाई-बहन के संबंध के साथ विशेष रूप से जुड़ गई।

द्रौपदी-कृष्ण, लक्ष्मी-बलि तथा यम-यमुना की कथाएं भी रक्षाबंधन से जोड़ी जाती हैं, लेकिन इनके लोकप्रिय स्वरूप और प्राचीन ग्रंथों के मूल पाठ में अंतर पाया जाता है। अतः इन्हें प्रमाणित ऐतिहासिक घटना के बजाय लोक एवं पौराणिक परंपरा के रूप में समझना उचित है।

आज के समय में रक्षाबंधन का संदेश

रक्षाबंधन बहन को कमजोर और भाई को केवल रक्षक मानने का पर्व नहीं है। इसका आधुनिक और न्यायपूर्ण अर्थ परस्पर रक्षा एवं उत्तरदायित्व है। बहन भाई के स्वास्थ्य, सफलता और सद्बुद्धि की कामना करती है तथा भाई उसके सम्मान, स्वतंत्रता और कठिन समय में साथ निभाने का संकल्प लेता है। वास्तव में परिवार में दोनों एक-दूसरे के संरक्षक होते हैं।

आज रक्षा-सूत्र को समाज की रक्षा, पर्यावरण संरक्षण, सैनिकों के सम्मान और सामाजिक सद्भाव से भी जोड़ा जा सकता है। इस प्रकार राखी केवल कलाई पर बांधा गया धागा नहीं, बल्कि यह स्मरण है कि प्रेम तभी सार्थक है, जब उसके साथ कर्तव्य, सम्मान और विश्वास भी जुड़ा हो।