बच्चे दूर, उम्र ढलती हुई और सूना घर: वृद्धजनों की खामोश पीड़ा
अंतर्राष्ट्रीय वृद्धजन दिवस पर विशेष
आज, 1 अक्टूबर को अंतर्राष्ट्रीय वृद्धजन दिवस है। यह दिन हमें बुजुर्गों के योगदान का सम्मान करने और उनके जीवन की कठिनाइयों को समझने का अवसर देता है। हमारे आसपास ऐसे माता-पिता हैं, जिन्होंने बच्चों का भविष्य सँवारने में पूरा जीवन लगा दिया, लेकिन आज अपनी ढलती उम्र में उन्हें किसी के पास बैठने, बात सुनने और जरूरत पड़ने पर हाथ थामने का इंतजार है।
भारत में व्यापार, नौकरी और पढ़ाई के लिए बच्चों का दूसरे शहरों या विदेश जाना अनेक परिवारों की वास्तविकता है। शहरों के फ्लैटों से लेकर गाँवों के पुराने घरों तक, कहीं वृद्ध दंपती अकेले रहते हैं तो कहीं जीवनसाथी के निधन के बाद एक बुजुर्ग का पूरा दिन अकेले गुजरता है। बच्चे अपनी जिम्मेदारियों में व्यस्त हैं और माता-पिता अपनी तकलीफ यह सोचकर छिपा लेते हैं कि उन्हें परेशान क्यों करें। फोन पर कहा गया उनका “हम ठीक हैं” कई बार बीमारी, उदासी और असुरक्षा को ढक देता है।
वृद्धावस्था की कठिनाई केवल दवा और खर्च की नहीं है। दवा खरीदने के पैसे हो सकते हैं, लेकिन अस्पताल ले जाने वाला कोई नहीं होता। घर में राशन होता है, मगर भोजन बनाने की शक्ति नहीं रहती। मोबाइल होता है, लेकिन आँखों की कमजोरी, सुनने में परेशानी या तकनीक की उलझन के कारण उसका उपयोग कठिन हो जाता है। अचानक तबीयत बिगड़ जाए या बाथरूम में गिर जाएँ तो सबसे बड़ा सवाल होता है—आवाज किसे दें?
शहरी जीवन में पड़ोस के दरवाजे पास होते हुए भी संबंध दूर हो सकते हैं। गाँवों में परिचय और अपनापन सहारा देते हैं, लेकिन बच्चों के प्रवास पर रहने से वहाँ भी देखभाल का खालीपन पैदा होता है। अस्पताल की दूरी, आने-जाने के साधन और नियमित सहायता का अभाव परेशानी बढ़ा सकते हैं। जो माता-पिता कभी पूरे परिवार का सहारा थे, उन्हें छोटी-सी जरूरत के लिए भी दूसरों की उपलब्धता देखनी पड़ती है।
अकेलेपन के साथ दूसरी पीड़ाएँ भी जुड़ी हैं—आर्थिक निर्भरता, संपत्ति को लेकर दबाव, अपमानजनक व्यवहार और परिवार के निर्णयों में उपेक्षा। हर समय यह सुनना कि “आपको समझ नहीं आएगा”, उनके आत्मसम्मान को चोट पहुँचाता है। दूसरी ओर, हर बुजुर्ग असहाय नहीं है। अनेक वृद्धजन सक्रिय और आत्मनिर्भर हैं; वे अनुभव बाँटना और समाज के काम आना चाहते हैं। उन्हें अवसर और बराबरी का व्यवहार चाहिए।
बच्चों का दूर रहना हमेशा उपेक्षा का प्रमाण नहीं है। आजीविका की मजबूरियाँ वास्तविक हैं। लेकिन दूरी के बीच भी देखभाल की व्यवस्था बन सकती है। नियमित बातचीत में केवल दवा और भोजन का हाल पूछने के साथ उनकी भावनाएँ सुनना, मिलने का समय निकालना, भरोसेमंद स्थानीय संपर्क रखना और बीमारी में साथ रहने की व्यवस्था करना जरूरी है।
समाज को भी अपनी भूमिका निभानी होगी। मोहल्लों और गाँवों में नियमित हालचाल पूछने वाले समूह, जरूरत पर अस्पताल पहुँचाने की सहायता तथा बातचीत और गतिविधियों के साझा स्थान बनाए जा सकते हैं। ऐसी व्यवस्था में वृद्धजनों की इच्छा, निजता और स्वतंत्रता का सम्मान होना चाहिए।
आज सम्मान समारोह और शुभकामनाओं के साथ यह भी पूछें—हमारे आसपास कोई बुजुर्ग अकेला तो नहीं है? जिसने हमारी पहली पुकार सुनी थी, उसकी ढलती उम्र की आवाज सुनना हमारी जिम्मेदारी है। वृद्धजनों को ऐसा जीवन मिलना चाहिए जिसमें सुरक्षा हो, अपनापन हो और यह भरोसा हो कि जरूरत पड़ने पर कोई उनके साथ खड़ा है।
