योगिराज श्री जलंधरनाथ जी महाराज
जीवन, साधना, यात्राएं और दर्शन
अंक–3

मारवाड़ के राजवंश और नाथ गुरु-परम्परा
मारवाड़ के इतिहास में नाथ सिद्धों और यहां के राजवंशों के बीच गहरा संबंध दिखाई देता है। विशेषकर जोधपुर के महाराजा मानसिंह का जलंधरनाथ पीठ और सिरे मंदिर के प्रति श्रद्धापूर्ण संबंध बताया जाता है।
उपलब्ध परम्परागत विवरणों के अनुसार महाराजा मानसिंह जलंधरनाथ जी की गुरु-परम्परा के भक्त थे। उनके धार्मिक भावों, काव्य और संरक्षण कार्यों में नाथ सम्प्रदाय के प्रति गहरी निष्ठा दिखाई देती है।
मारवाड़ के राजाओं के लिए नाथ सिद्ध केवल पूजा के पात्र संत नहीं थे। वे कठिन राजनीतिक परिस्थितियों में आध्यात्मिक मार्गदर्शन देने वाले, राजधर्म की मर्यादा समझाने वाले और सत्ता के अहंकार को नियंत्रित करने वाले गुरु भी माने जाते थे।
राजस्थान की सांस्कृतिक परम्परा में राजा और योगी का संबंध अत्यंत विशेष रहा है। राजा के पास राजसत्ता होती थी, लेकिन योगी को आत्मसत्ता का स्वामी माना जाता था। योगी राजमहल से दूर रहकर भी राजा को यह स्मरण कराता था कि राज्य, शक्ति, धन और प्रतिष्ठा स्थायी नहीं हैं। धर्म, न्याय और लोककल्याण ही शासन का वास्तविक आधार हैं।
महाराजा मानसिंह स्वयं साहित्य और अध्यात्म में रुचि रखते थे। उनके समय में नाथ मठों, साधना-स्थलों, काव्य, आख्यानों, चित्रकला और धार्मिक अभिलेखों को संरक्षण मिला।
जलंधरनाथ जी से संबंधित मारवाड़ शैली का एक प्रसिद्ध लघुचित्र भी उन्नीसवीं शताब्दी के प्रारम्भिक काल से जोड़ा जाता है। इससे यह स्पष्ट होता है कि उनकी स्मृति केवल मौखिक कथा तक सीमित नहीं रही, बल्कि राजस्थानी चित्रकला और दरबारी संस्कृति में भी प्रतिष्ठित हुई।
नाथ गुरु-परम्परा ने मारवाड़ के राजाओं को यह संदेश दिया कि शक्ति का महत्व तभी है, जब उसका उपयोग न्याय, सेवा और जनकल्याण के लिए किया जाए।
क्रमशः… (अगले अंक में : मारवाड़ के लोकजीवन में जलंधरनाथ जी का प्रभाव)
