व्यापारी मार्गदर्शी : अध्याय 3 — साझेदारी (पार्टनरशिप) (भाग 8)

लेखक :- सी.ए. कमलेश सोलंकी (के. सोलंकी एंड कंपनी)
भाग 8 — व्यावसायिक संरचना मॉडल – 1
वित्तीय साझेदार (फाइनेंशियल पार्टनर) एवं कार्यकारी साझेदार (वर्किंग पार्टनर)
वास्तविक व्यावसायिक परिस्थिति (रियल बिज़नेस सिचुएशन)
श्री अरुण के पास ₹3 करोड़ की पूँजी (कैपिटल) है।
वे उद्योग (इंडस्ट्री) में निवेश करना चाहते हैं, परन्तु प्रतिदिन व्यवसाय (बिज़नेस) का संचालन नहीं करना चाहते।
दूसरी ओर श्री भारत पिछले 18 वर्षों से उसी उद्योग में कार्यरत हैं।
उनके पास—
- तकनीकी ज्ञान (टेक्निकल नॉलेज)
- उत्पादन (प्रोडक्शन) का अनुभव
- कर्मचारियों का प्रबंधन (टीम मैनेजमेंट)
- ग्राहकों का विश्वास (कस्टमर कॉन्फिडेंस)
- बाज़ार की समझ (मार्केट अंडरस्टैंडिंग)
है, लेकिन पर्याप्त पूँजी उपलब्ध नहीं है।
दोनों मिलकर साझेदारी (पार्टनरशिप) स्थापित करना चाहते हैं।
सबसे पहला प्रश्न
क्या केवल पूँजी (कैपिटल) लगाने वाला साझेदार अधिक लाभ प्राप्त करे?
या
पूरा समय व्यवसाय को देने वाला साझेदार?
या
दोनों?
उत्तर है—
दोनों का योगदान अलग है, इसलिए प्रतिफल (रिवार्ड) का स्वरूप भी अलग हो सकता है।
इस मॉडल का उद्देश्य (ऑब्जेक्टिव)
ऐसी व्यावसायिक संरचना (कमर्शियल स्ट्रक्चर) तैयार करना जिसमें—
पूँजी (कैपिटल) का सम्मान हो।
समय (टाइम) एवं प्रबंधन (मैनेजमेंट) का उचित मूल्यांकन हो।
व्यवसाय (बिज़नेस) के विकास के लिए दोनों साझेदार प्रेरित रहें।
भविष्य में विवाद की संभावना न्यूनतम रहे।
अनुशंसित प्रतिफल संरचना (रिकमेंडेड रिवार्ड स्ट्रक्चर)
एक ही साझेदार को केवल एक प्रकार का प्रतिफल मिले, यह आवश्यक नहीं है।
परिस्थिति के अनुसार निम्नलिखित प्रतिफलों का संयोजन किया जा सकता है—
1. पूँजी पर प्रतिफल
यदि साझेदारी विलेख (पार्टनरशिप डीड) में प्रावधान हो, तो पूँजी (कैपिटल) पर ब्याज (इंटरेस्ट ऑन कैपिटल)।
2. कार्यकारी प्रतिफल
पूर्णकालिक कार्य (फुल-टाइम मैनेजमेंट) करने वाले साझेदार को मासिक पारिश्रमिक (रिम्यूनरेशन)।
3. लाभ वितरण
साझेदारी विलेख (पार्टनरशिप डीड) में निर्धारित अनुपात के अनुसार लाभ (प्रॉफिट) का वितरण।
4. प्रदर्शन आधारित प्रोत्साहन
यदि कार्यकारी साझेदार पूर्व निर्धारित लक्ष्य (टार्गेट) से अधिक उत्पादन, लाभ, बिक्री या संग्रहण (कलेक्शन) प्राप्त करे, तो अतिरिक्त प्रोत्साहन (परफॉर्मेंस इंसेंटिव) का प्रावधान किया जा सकता है।
दृष्टांत मॉडल क्लॉज़ (इलस्ट्रेटिव मॉडल क्लॉज़)
नोट: निम्नलिखित केवल उदाहरणात्मक व्यावसायिक मॉडल है। वास्तविक ड्राफ्टिंग (ड्राफ्टिंग) प्रत्येक व्यवसाय, लागू कानून तथा कर प्रावधानों के अनुसार की जानी चाहिए।
धारा – पूँजी (कैपिटल)
प्रत्येक साझेदार का पूँजी योगदान (कैपिटल कॉन्ट्रिब्यूशन) पृथक पूँजी खाते (कैपिटल अकाउंट) में दर्ज किया जाएगा।
धारा – पारिश्रमिक (रिम्यूनरेशन)
पूर्णकालिक सेवाएँ देने वाले कार्यकारी साझेदार को साझेदारी विलेख एवं लागू कर प्रावधानों के अनुसार पारिश्रमिक दिया जा सकेगा।
धारा – पूँजी पर ब्याज (इंटरेस्ट ऑन कैपिटल)
जहाँ लागू हो, पूँजी पर ब्याज साझेदारी विलेख की शर्तों एवं लागू कानून के अनुसार देय होगा।
धारा – लाभ वितरण (प्रॉफिट डिस्ट्रीब्यूशन)
सभी स्वीकृत व्यय, पारिश्रमिक एवं अन्य देय भुगतान के पश्चात शेष लाभ का वितरण पूर्व निर्धारित अनुपात में किया जाएगा।
धारा – अतिरिक्त पूँजी (एडिशनल कैपिटल)
भविष्य में अतिरिक्त पूँजी की आवश्यकता होने पर उसकी शर्तें लिखित सहमति से निर्धारित की जाएँगी।
यह मॉडल किन व्यवसायों के लिए उपयुक्त है?
विनिर्माण उद्योग (मैन्युफैक्चरिंग)
व्यापार (ट्रेडिंग)
होटल एवं आतिथ्य (हॉस्पिटैलिटी)
इंजीनियरिंग इकाइयाँ
स्वास्थ्य सेवाएँ (हेल्थकेयर)
ऐसे सभी व्यवसाय जहाँ एक साझेदार पूँजी देता है और दूसरा पूर्णकालिक संचालन करता है।
गलत ड्राफ्टिंग का परिणाम
यदि कार्यकारी साझेदार (वर्किंग पार्टनर) के पारिश्रमिक की समीक्षा (रिव्यू) का कोई प्रावधान नहीं होगा, तो व्यवसाय के बढ़ने पर विवाद उत्पन्न हो सकता है।
यदि अतिरिक्त पूँजी (एडिशनल कैपिटल) के संबंध में कोई व्यवस्था नहीं होगी, तो भविष्य में लाभांश (प्रॉफिट शेयर) को लेकर असहमति हो सकती है।
सीए की व्यावहारिक सलाह
साझेदारी विलेख (पार्टनरशिप डीड) में यह प्रावधान अवश्य रखें कि—
प्रत्येक दो या तीन वर्ष में पूँजी (कैपिटल), पारिश्रमिक (रिम्यूनरेशन), लाभ वितरण (प्रॉफिट डिस्ट्रीब्यूशन) एवं कार्य की जिम्मेदारियों (रिस्पॉन्सिबिलिटीज़) की संयुक्त समीक्षा (जॉइंट रिव्यू) की जाएगी।
इससे व्यवसाय (बिज़नेस) बदलने पर भी साझेदारी (पार्टनरशिप) संतुलित बनी रहती है।
व्यापार सूत्र – 24
“स्थिर साझेदारी (पार्टनरशिप) वह नहीं है जिसमें नियम कभी न बदलें, बल्कि वह है जिसमें नियम बदलती परिस्थितियों के अनुसार समय पर संशोधित किए जाएँ।“
