आधी रात वाहन जब्त करना वित्तीय समावेशन को उत्पीड़न में बदलना: सुप्रीम कोर्ट
कर्ज वसूली में बाहुबल के प्रयोग पर रोक; ट्रक मालिक को ₹10 लाख मुआवजा, बिक्री राशि ब्याज सहित लौटाने का आदेश
नई दिल्ली। सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया है कि ऋण की किस्तों में चूक होने से बैंक या गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनी को बलपूर्वक वाहन छीनने का अधिकार नहीं मिल जाता। वित्तीय संस्थान को वाहन वापस लेने का संविदात्मक अधिकार हो सकता है, लेकिन उसका प्रयोग ऋण अनुबंध, भारतीय रिजर्व बैंक के निर्देशों और विधिसम्मत प्रक्रिया के भीतर ही किया जाना चाहिए।
न्यायमूर्ति पामिडिघंटम श्री नरसिम्हा और न्यायमूर्ति आलोक अराधे की पीठ ने Hari Dutta Sharma v. State of Uttar Pradesh & Others, 2026 INSC 998; Civil Appeal No. 12950/2026 में 16 सितंबर 2026 को यह निर्णय दिया। निर्णय न्यायमूर्ति आलोक अराधे ने लिखा।
न्यायालय ने कहा—
“converting a facility meant to promote financial inclusion into an instrument of oppression against the very class it was designed to serve.”
अर्थात जिस वाहन-पुनर्ग्रहण सुविधा का उद्देश्य सामान्य और सीमित साधनों वाले लोगों तक संस्थागत ऋण पहुंचाना है, वही सुविधा अनियंत्रित प्रयोग होने पर उसी वर्ग के उत्पीड़न का साधन बन सकती है।
क्या था पूरा मामला
हरि दत्ता शर्मा ने 25 मार्च 2019 को चोलामंडलम इन्वेस्टमेंट एंड फाइनेंस कंपनी लिमिटेड से टाटा एसएफसी-407 ट्रक खरीदने के लिए व्यावसायिक वाहन ऋण लिया था। ₹10,40,080.75 स्वीकृत राशि में से ₹9.36 लाख वितरित किए गए थे। ऋण 75 मासिक किस्तों में चुकाया जाना था और ट्रक कंपनी के पक्ष में हाइपोथिकेटेड था। जून 2021 में लगभग ₹1.04 लाख का पूरक ऋण भी दिया गया।
कर्जदार द्वारा किस्तों में चूक होने पर कंपनी ने जनवरी 2022 में मांग नोटिस दिया और बाद में ट्रक अपने कब्जे में लिया। कर्जदार द्वारा ₹86,726 जमा कराने तथा खाते को नियमित करने का आश्वासन देने पर वाहन लौटा दिया गया। इसके बाद फिर चूक हुई और कंपनी ने जुलाई तथा दिसंबर 2022 में नोटिस भेजे।
कर्जदार का आरोप था कि 9 अप्रैल 2023 की रात करीब एक बजे अयोध्या में माल पहुंचाने के बाद खड़े ट्रक का स्टीयरिंग लॉक चार अज्ञात व्यक्तियों ने तोड़ा और वाहन ले गए। उसने उसी दिन ई-एफआईआर दर्ज कराई। सितंबर 2023 में कंपनी के कानूनी नोटिस से उसे पता चला कि ट्रक कंपनी ने अपने कब्जे में लेकर 31 अगस्त 2023 को ₹4.50 लाख में बेच दिया था। इसके बावजूद कंपनी ने उस पर ₹1,25,571 की अतिरिक्त देनदारी बताई।
मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट के समक्ष दायर आवेदन खारिज होने के बाद शर्मा ने इलाहाबाद हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। हाईकोर्ट ने ऋण चूक और देरी के आधार पर 4 अप्रैल 2025 को याचिका खारिज कर दी। इसके विरुद्ध सर्वोच्च न्यायालय में अपील की गई।
कर्ज वसूली का अधिकार असीमित नहीं
सर्वोच्च न्यायालय ने माना कि ऋण अनुबंध में प्रावधान होने पर वित्तीय संस्था को वाहन वापस लेने का अधिकार हो सकता है। ऐसी व्यवस्था अपने आप में अवैध नहीं है, क्योंकि इसके सहारे सीमित साधनों वाले ट्रक संचालकों और छोटे परिवहन कारोबारियों को बिना पारंपरिक जमानत के ऋण उपलब्ध हो पाता है।
लेकिन यह अधिकार पहली अवस्था में न्यायालय या अधिकरण की निगरानी के बाहर प्रयोग होता है, इसलिए इसकी अत्यंत सावधानी से व्याख्या आवश्यक है। इसे संपत्ति को चोरी-छिपे, बलपूर्वक अथवा आधी रात को उठा ले जाने का खुला लाइसेंस नहीं बनाया जा सकता।
पीठ ने पाया कि ऋण अनुबंध का अनुच्छेद 11 वाहन कब्जे में लेने से पहले सात दिन के नोटिस की व्यवस्था करता था। इसके विपरीत कंपनी ने आवश्यक नोटिस दिए बिना आधी रात वाहन उठाया। कब्जा ज्ञापन पर कर्जदार के हस्ताक्षर भी नहीं थे। इस कारण कंपनी को वाहन पुनर्ग्रहण का संविदात्मक अधिकार उत्पन्न ही नहीं हुआ था।
अनुबंध की मनमानी शर्तें भी अमान्य
ऋण अनुबंध में कंपनी को अपने विवेक से पूर्व और पश्चात नोटिस माफ करने, वाहन मिलने की सम्भावना वाले किसी भी स्थान में प्रवेश करने तथा बिक्री की प्रक्रिया स्वयं निर्धारित करने की शक्ति दी गई थी।
सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि ऐसी शर्तें कर्जदार को पूरी तरह वित्तदाता की एकतरफा इच्छा पर छोड़ देती हैं। एक पक्ष को दूसरे पक्ष की सुरक्षा के लिए बनाई गई प्रक्रिया स्वयं हटाने का अधिकार देने वाली शर्त निष्पक्ष संविदा और आरबीआई के निर्देशों के अनुरूप नहीं मानी जा सकती।
आरबीआई के नियमों पर न्यायालय की टिप्पणी
न्यायालय ने बैंकिंग विनियमन अधिनियम, 1949 की धारा 35-ए का उल्लेख करते हुए कहा कि इसके अंतर्गत आरबीआई द्वारा जारी निर्देश वैधानिक और बैंकों पर बाध्यकारी होते हैं।
आरबीआई ने वर्ष 2003 से बैंकों और एनबीएफसी के लिए निष्पक्ष व्यवहार संहिता तथा कर्ज-वसूली संबंधी अनेक दिशानिर्देश जारी किए हैं। इनमें अनुचित समय पर कर्जदार को परेशान करने, बाहुबल प्रयोग करने और अपमानजनक वसूली प्रक्रिया अपनाने पर रोक है। न्यायालय ने खेद जताया कि ये दिशानिर्देश वर्षों से कागजों पर ही बने रहे और उनका प्रभावी पालन सुनिश्चित नहीं किया गया।
वित्तीय संस्थानों के लिए प्रमुख सिद्धांत
सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि—
- ऋण वसूली में कर्जदार को अनुचित समय पर परेशान या बाहुबल का प्रयोग नहीं किया जा सकता।
- वाहन केवल कानूनी और शांतिपूर्ण प्रक्रिया से कब्जे में लिया जा सकता है।
- बैंक अथवा वित्तीय संस्थान बलपूर्वक वाहन लेने के लिए ‘गुंडों’ को नियुक्त नहीं कर सकते।
- रिकवरी एजेंट नियुक्त करते समय निर्धारित जांच और प्रशिक्षण आवश्यक है।
- वाहन पुनर्ग्रहण की शर्त भारतीय संविदा अधिनियम तथा आरबीआई निर्देशों के अनुरूप होनी चाहिए।
- अनुबंध में पूर्व नोटिस, अंतिम भुगतान अवसर, कब्जे की प्रक्रिया, वाहन लौटाने और पारदर्शी बिक्री या नीलामी का तरीका स्पष्ट होना चाहिए।
- आरबीआई को अनुचित वसूली की शिकायतों को गंभीरता से लेकर लगातार उल्लंघन करने वाले संस्थान पर रिकवरी एजेंट रखने का प्रतिबंध लगाने सहित कार्रवाई करनी चाहिए।
जीविका के अधिकार का उल्लंघन
न्यायालय ने माना कि अपीलकर्ता सीमित साधनों वाला व्यक्ति था और परिवहन व्यवसाय में प्रयुक्त ट्रक उसकी आजीविका का एकमात्र साधन था। उसे मनमाने तथा अनुचित ढंग से वाहन से वंचित करना संविधान के अनुच्छेद 14 और 21 का उल्लंघन था।
पीठ ने इलाहाबाद हाईकोर्ट का आदेश निरस्त करते हुए कहा कि वाहन पहले ही बेचा जा चुका है, इसलिए बिक्री रद्द करना व्यावहारिक नहीं होगा। इसके स्थान पर वित्तीय कंपनी को निर्देश दिया गया कि—
कर्जदार के दोनों ऋण खाते बंद किए जाएं।
- वाहन की ₹4.50 लाख बिक्री राशि बिक्री की तारीख से भुगतान तक छह प्रतिशत वार्षिक ब्याज सहित लौटाई जाए।
- मानसिक पीड़ा और लंबे समय तक आजीविका से वंचित रखने के लिए ₹10 लाख मुआवजा दिया जाए।
- अपीलकर्ता को ₹50 हजार मुकदमा खर्च भी दिया जाए।
सर्वोच्च न्यायालय ने आरबीआई को बैंकों और एनबीएफसी द्वारा निष्पक्ष वसूली संबंधी दिशानिर्देशों का वास्तविक अनुपालन सुनिश्चित करने के लिए प्रभावी कदम उठाने का निर्देश भी दिया।
आधिकारिक निर्णय: सुप्रीम कोर्ट का निर्णय—2026 INSC 998
