पंचतंत्र की अमर कथाएँ: कबूतरों की एकता और चूहे की मित्रता
एक विशाल पेड़ के नीचे एक शिकारी ने जाल बिछाया और उस पर अनाज के दाने बिखेर दिए। कुछ देर बाद कबूतरों का एक झुंड वहाँ पहुँचा। उनका राजा चित्रग्रीव था। दाने देखकर कबूतर नीचे उतरे और चुगने लगे। तभी उनके पैर जाल में फँस गए।
संकट देखकर कबूतर घबरा गए। कोई अपने पंख फड़फड़ाने लगा, तो कोई दूसरे को दोष देने लगा। चित्रग्रीव ने समझाया, “इस समय आपस में झगड़ने से कुछ नहीं होगा। हम सब एक साथ जोर लगाएँ, तो जाल सहित उड़ सकते हैं।”
राजा के संकेत पर सभी कबूतरों ने एक साथ पंख फैलाए और उड़ान भरी। देखते ही देखते पूरा जाल जमीन से ऊपर उठ गया। शिकारी उनके पीछे दौड़ा, लेकिन कबूतर दूर निकल गए।
चित्रग्रीव उन्हें अपने मित्र हिरण्यक चूहे के पास ले गया। हिरण्यक ने कबूतरों को जाल में फँसा देखा, तो तुरंत बाहर आया। वह पहले चित्रग्रीव के बंधन काटने लगा।
चित्रग्रीव ने उसे रोकते हुए कहा, “मित्र, पहले मेरे साथियों को मुक्त करो। मेरे बंधन बाद में काटना।”
हिरण्यक ने पूछा, “तुम राजा हो। पहले तुम्हें मुक्त करना उचित नहीं होगा?”
चित्रग्रीव बोला, “ये सब मुझ पर विश्वास करके मेरे साथ आए हैं। इनकी रक्षा करना मेरा कर्तव्य है। इन्हें संकट में छोड़कर मैं अकेला कैसे मुक्त हो सकता हूँ?”
मित्र की बात सुनकर हिरण्यक प्रसन्न हुआ। उसने पहले सभी कबूतरों के बंधन काटे और अंत में चित्रग्रीव को मुक्त किया। कबूतर अपने राजा और उसके मित्र का आभार मानकर उड़ गए।
कथा की सीख
संकट में एकता हमारी शक्ति बनती है और सच्चा मित्र सहायता के लिए आगे आता है। अच्छा नेतृत्व वही है, जो अपने साथियों की भलाई को प्राथमिकता दे। परिवार, समाज और व्यापार में परस्पर विश्वास तथा सहयोग कठिन परिस्थितियों से निकलने का रास्ता बनाते हैं।

