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ईवीएम मतगणना में ‘टोटलाइजर’ के उपयोग पर सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र से मांगा जवाब

प्रकाशित: 2 September 2026, 4:49 pm

बूथवार नतीजों के स्थान पर कई मतदान केंद्रों के मत एक साथ गिनने की मांग; मतदाताओं की गोपनीयता और चुनाव बाद प्रतिशोध से जुड़ा मामला

नई दिल्ली। इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों से दर्ज मतों की बूथवार गणना के स्थान पर कई मतदान केंद्रों के मत एक साथ मिलाकर गिनने वाली ‘टोटलाइजर’ प्रणाली का मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा है। न्यायालय ने केंद्र सरकार से पूछा है कि क्या निर्वाचन संचालन नियम, 1961 में उपयुक्त संशोधन करके ईवीएम मतगणना में इस प्रणाली को लागू किया जा सकता है।

मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ में न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना शामिल हैं। पीठ उन याचिकाओं पर सुनवाई कर रही है, जिनमें प्रत्येक मतदान केंद्र के अलग-अलग परिणाम सार्वजनिक करने के बजाय पूरे संसदीय निर्वाचन क्षेत्र अथवा मतदान केंद्रों के समूह का संयुक्त परिणाम घोषित करने की मांग की गई है।

क्या है टोटलाइजर प्रणाली?

टोटलाइजर एक ऐसा उपकरण है, जिसके माध्यम से लगभग 14 मतदान केंद्रों की ईवीएम में दर्ज मतों को एक साथ मिलाकर गिना जा सकता है। इससे यह पता नहीं चलता कि किसी विशेष बूथ या मोहल्ले के मतदाताओं ने किस राजनीतिक दल अथवा प्रत्याशी के पक्ष में कितने मत दिए।

वर्तमान व्यवस्था में प्रत्येक मतदान केंद्र की ईवीएम के मत अलग गिने जाते हैं। इसके कारण राजनीतिक दलों को यह जानकारी मिल जाती है कि किसी विशेष गांव, कॉलोनी, समुदाय अथवा बूथ से उन्हें कितने मत मिले। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि बूथवार आंकड़े सामने आने से मतदाताओं को चुनाव बाद भेदभाव, धमकी, हिंसा अथवा विकास कार्यों में उपेक्षा का सामना करना पड़ सकता है।

याचिकाकर्ताओं ने क्या कहा?

याचिकाकर्ता अधिवक्ता अश्विनी कुमार उपाध्याय ने न्यायालय में कहा कि टोटलाइजर प्रणाली चुनाव बाद होने वाली हिंसा को रोकने और मतदाताओं की गोपनीयता सुरक्षित रखने में सहायक हो सकती है। उनका तर्क था कि राजनीतिक दलों को किसी विशेष बूथ का मतदान व्यवहार पता नहीं चलने पर उस क्षेत्र के मतदाताओं को निशाना बनाना कठिन होगा।

एक अन्य याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल शंकरनारायणन ने कहा कि राजनीतिक दलों की बूथवार चुनाव प्रबंधन की आवश्यकता मतदाताओं की सुरक्षा और गोपनीयता से अधिक महत्वपूर्ण नहीं हो सकती। उन्होंने न्यायालय को बताया कि विधि आयोग, निर्वाचन आयोग और संबंधित केंद्रीय मंत्रालय ने वर्ष 2010 में भी टोटलाइजर के उपयोग की सिफारिश की थी।

निर्वाचन आयोग ने बताईं व्यावहारिक और कानूनी बाधाएं

निर्वाचन आयोग की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता डी.एस. नायडू ने बताया कि इस विषय पर आयोजित सर्वदलीय बैठक में करीब 50 प्रतिशत राष्ट्रीय दलों और 68 प्रतिशत राज्य स्तरीय दलों ने टोटलाइजर प्रणाली का विरोध किया था। मंत्रियों के समूह के स्तर पर भी प्रस्ताव को समर्थन नहीं मिला।

आयोग ने कहा कि वह केवल सिफारिश कर सकता है। निर्वाचन नियमों में आवश्यक संशोधन करने का अधिकार केंद्र सरकार के पास है। आयोग के अनुसार वर्तमान कानून में ईवीएम मतों के टोटलाइजेशन का स्पष्ट प्रावधान नहीं है।

आयोग ने मतगणना की लेखा-परीक्षण व्यवस्था पर पड़ने वाले प्रभाव का मुद्दा भी उठाया। वर्तमान व्यवस्था में फॉर्म 17सी के माध्यम से प्रत्येक मतदान केंद्र पर दर्ज मतों का आधिकारिक विवरण सुरक्षित रखा जाता है। कई ईवीएम के मत मिलाने पर किसी एक मशीन के आंकड़ों में अंतर होने की स्थिति संयुक्त आंकड़े में छिप सकती है। इससे गड़बड़ी का स्रोत पहचानने में कठिनाई हो सकती है।

सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?

न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची ने कहा कि टोटलाइजर मतदाताओं की पसंद को गोपनीय रखने का एक साधन हो सकता है, लेकिन इसके लिए वैधानिक आधार आवश्यक है। पीठ ने यह भी पूछा कि क्या उन क्षेत्रों में इसका चयनात्मक उपयोग किया जा सकता है, जहां मतदाताओं को चुनाव के बाद प्रताड़ित या निशाना बनाए जाने की वास्तविक आशंका हो।

सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल टोटलाइजर लागू करने का कोई आदेश नहीं दिया है। न्यायालय ने केंद्र सरकार से इस व्यवस्था की कानूनी और व्यावहारिक संभावना पर अपना पक्ष रखने को कहा है। केंद्र का उत्तर और आगे की सुनवाई पूरी होने के बाद ही यह स्पष्ट होगा कि ईवीएम मतगणना की वर्तमान बूथवार प्रणाली में कोई बदलाव किया जाएगा या नहीं।