ब्रेकिंग न्यूज़
सेवा एवं जीवन दर्शन

ब्रह्मर्षि श्री खेतारामजी महाराज: तप, समाज-सुधार और ब्रह्मभक्ति के प्रकाश-पुंज

By MAHIPAL SINGH RP प्रकाशित: 27 August 2026, 11:03 am

राजस्थान की संत-परंपरा में ब्रह्मर्षि संत श्री खेतारामजी महाराज—जिन्हें श्रद्धालु श्री खेतेश्वर दाता के नाम से पुकारते हैं—का स्थान अत्यंत विशिष्ट है। वे राजपुरोहित समाज के परम आराध्य एवं आध्यात्मिक पथ-प्रदर्शक माने जाते हैं, लेकिन उनकी शिक्षाओं और साधना का प्रभाव किसी एक समाज तक सीमित नहीं रहा। मारवाड़ के सनातन धर्मावलंबियों, राजपुरोहितों, राजपूतों तथा अन्य अनेक समुदायों में उनके प्रति गहरी श्रद्धा दिखाई देती है।

जन्म और बाल्यकाल से भक्ति की ओर

श्री खेतेश्वर ब्रह्मधाम तीर्थ के प्रकाशित जीवन-वृत्त के अनुसार खेतारामजी महाराज का जन्म 22 अप्रैल 1912, वैशाख शुक्ल पंचमी को तत्कालीन सांचौर क्षेत्र के बिजरौल खेड़ा में हुआ था। उनके पिता का नाम शेरसिंहजी तथा माता का नाम सिणगारी देवी था। उनका परिवार मूलतः सराणा गाँव का निवासी था।

बालक खेताराम की रुचि बचपन से ही खेती और पशुपालन के दैनिक कार्यों के साथ भजन, सत्संग और राम-नाम के स्मरण में थी। माता-पिता का साया बचपन में ही उठ जाने के बावजूद उनके भीतर वैराग्य और ईश्वर-भक्ति की भावना लगातार प्रबल होती गई। वे सांसारिक जीवन से दूर होकर लोककल्याण और अध्यात्म का मार्ग अपनाना चाहते थे।

समर्थ गुरु गुणेशानंदजी महाराज से दीक्षा प्राप्त करने के बाद उन्होंने संन्यास और साधना का पथ अपनाया। आसोतरा की सीमा में स्थित पीपलिया नामक स्थान पर उन्होंने लगभग बारह वर्षों तक कठोर तपस्या की। यह स्थान उनकी तपोभूमि के रूप में स्मरण किया जाता है।

ब्रह्मधाम आसोतरा की स्थापना

खेतारामजी महाराज के जीवन का सबसे महत्वपूर्ण कार्य भगवान ब्रह्मा और माता सावित्री को समर्पित भव्य मंदिर की स्थापना है। आसोतरा, वर्तमान बालोतरा क्षेत्र में जालोर मार्ग पर स्थित यह तीर्थ आज श्री खेतेश्वर ब्रह्मधाम के नाम से प्रसिद्ध है।

तीर्थ प्रबंधन के विवरण के अनुसार मंदिर का शिलान्यास खेतारामजी महाराज ने 20 अप्रैल 1961 को किया था। मंदिर निर्माण करीब 24 वर्षों तक चला। दाताश्री गाँव-गाँव और ढाणी-ढाणी गए तथा समाज के सहयोग से निर्माण के लिए धन एकत्र किया। इस निर्माण अभियान ने राजपुरोहित समाज को धार्मिक आस्था के साथ संगठन, सहयोग और सामूहिक उत्तरदायित्व का भी संदेश दिया।

मंदिर में भगवान ब्रह्मा के साथ माता सावित्री प्रतिष्ठित हैं। परिसर में विभिन्न ऋषियों की प्रतिमाएँ, शिवधूणा, ब्रह्म सरोवर, गौशाला और अन्य धार्मिक एवं सेवामूलक व्यवस्थाएँ भी हैं। तीर्थ प्रबंधन इसे ब्रह्मा-सावित्री की संयुक्त प्रतिष्ठा वाला अद्वितीय सिद्धपीठ मानता है।

6 मई 1984 को वैदिक मंत्रोच्चार के बीच भगवान ब्रह्मा और माता सावित्री की प्रतिमाओं की प्राण-प्रतिष्ठा सम्पन्न हुई। इसके अगले दिन, 7 मई 1984 को खेतारामजी महाराज ब्रह्मलीन हो गए। उपलब्ध तीर्थ-वृत्त के अनुसार उनकी पार्थिव देह का मंत्रोच्चार के साथ अग्नि-संस्कार किया गया और उसी पवित्र स्थान पर आज वैकुंठ धाम स्थित है। इसलिए इसे उनकी पवित्र स्मृति एवं समाधि-स्थली के रूप में श्रद्धा से देखा जाता है।

खेतारामजी महाराज के प्रमुख धार्मिक स्थान

उनके जीवन से जुड़े प्रमुख स्थानों में जन्मस्थली बिजरौल खेड़ा, पैतृक गाँव सराणा, सांईजी की बेरी, पीपलिया तपोभूमि और आसोतरा स्थित ब्रह्मधाम एवं वैकुंठ धाम विशेष उल्लेखनीय हैं। इनमें आसोतरा आज उनकी साधना, समाज-संगठन और ब्रह्मभक्ति का सबसे बड़ा केंद्र है।

राजस्थान के अतिरिक्त अहमदाबाद, सूरत, मुंबई, पुणे, बेंगलुरु, चेन्नई, हैदराबाद, दिल्ली और देश के दूसरे प्रवासी क्षेत्रों में भी श्री खेतेश्वर दाता के मंदिरों, छात्रावासों, सामाजिक संस्थानों तथा सेवा-समितियों की स्थापना हुई है।

लोकश्रद्धा में जीवित उनके “परचे”

राजस्थान की संत-परंपरा में संत की कृपा से घटित मानी जाने वाली असाधारण घटनाओं को श्रद्धालु “परचा” कहते हैं। खेतारामजी महाराज के जीवन से जुड़े अनेक प्रसंग भक्त-परंपरा में सुनाए जाते हैं।

एक प्रचलित प्रसंग के अनुसार किशोर अवस्था में वे वर्षा और अंधकार के बीच दुर्गम मार्ग से भजन के लिए जाते थे। मार्ग में व्याघ्र दिखाई देने पर भी वे भयभीत नहीं हुए और गुरु-स्मरण करते हुए उसके सामने दंडवत हो गए। श्रद्धालु इसे उनकी निर्भय भक्ति और गुरु-कृपा का परचा मानते हैं।

भगवान ब्रह्मा और माता सावित्री की प्रतिमाओं के निर्माण तथा प्राण-प्रतिष्ठा से संबंधित घटनाएँ भी भक्तों में विशेष श्रद्धा से सुनाई जाती हैं। उनके ब्रह्मलीन होने के कुछ दिनों बाद आसपास के घरों की छतों पर चंदन जैसी बूँदें दिखाई देने का वर्णन भी तीर्थ की जीवन-कथा में मिलता है। ये प्रसंग श्रद्धालुओं की मौखिक एवं धार्मिक परंपरा का हिस्सा हैं; इन्हें ऐतिहासिक रूप से प्रमाणित घटनाओं के बजाय आस्था और लोकस्मृति के रूप में समझना उचित है।

सामाजिक सुधारक के रूप में योगदान

खेतारामजी महाराज केवल तपस्वी संत नहीं, बल्कि समाज-सुधारक भी थे। वे माता-पिता की सेवा, परिवार में एकता, कन्या-सम्मान, शिक्षा के साथ संस्कार और नशामुक्त जीवन पर विशेष बल देते थे। वे हिंसा, व्यसन, सामाजिक भेदभाव और अनुचित रूढ़ियों से दूर रहने का संदेश देते थे।

उनका मानना था कि धर्म केवल कर्मकांड नहीं, बल्कि सत्य, संयम, सेवा, जीव-दया और सदाचार से परिपूर्ण जीवन है। उनके आदर्शों से प्रेरित होकर ब्रह्मधाम से जुड़ी संस्थाओं ने शिक्षा, छात्रावास, गौसेवा, चिकित्सा शिविर, भोजनशाला और पर्यावरण संरक्षण जैसे सेवा कार्यों को आगे बढ़ाया।

समाज की अटल निष्ठा

राजपुरोहित समाज खेतारामजी महाराज को अपने आराध्य गुरु और एकता के प्रतीक के रूप में देखता है। समाज के लोग देश-विदेश में रहते हुए भी जन्मोत्सव, पुण्यतिथि और धार्मिक आयोजनों के अवसर पर आसोतरा धाम पहुँचते हैं। प्रवासी क्षेत्रों में उनके नाम से बने मंदिर और सेवा-संस्थान इस अटल निष्ठा के प्रमाण हैं।

उनके प्रति यह श्रद्धा केवल चमत्कारों या परचों के कारण नहीं, बल्कि इसलिए भी है कि उन्होंने साधना को समाज-सुधार से, भक्ति को सेवा से और आध्यात्मिकता को नैतिक जीवन से जोड़ा।

ब्रह्मर्षि खेतारामजी महाराज का जीवन संदेश देता है कि संत वही है जो अपने तप से आत्मकल्याण और अपने कर्म से लोककल्याण करे। आसोतरा का ब्रह्मधाम उनकी इसी व्यापक दृष्टि का स्थायी प्रतीक है—जहाँ ब्रह्मभक्ति, गुरु-श्रद्धा, सामाजिक एकता और मानव-सेवा एक साथ दिखाई देते हैं।

खेतेश्वर जी रो आदेश

उजलो तन, उजलो मन,
उजलो पुरोहित परिवेश है।
हाजर हुजूर हरदम,
हुकमत मरूधर ज्यारो देश है।
रोजी रोटी खातीर फिरया,
बसिया देश परदेश है।
मेहनत लगन सू धंधो करजो,
रिद्धि – सिद्धी संग गणेश है।
ब्रह्मकुल ब्राह्मण पुरोहिता:,
कलंक काम निषेध है।
मिनख जमारो उत्तम पायो,
ब्रह्मा तन प्रवेश है।
वंश बदलिया वनस्पती हाणी,
खत्मा रो संदेश है।
जाति-जाति लड़जो मती,
संगठन शक्ति रो भेष है।

“ब्रह्माराधन संलीनं, ब्रह्मधाम प्रतिष्ठितम्।
ब्रह्ममार्गोपदेष्टारं, खेतेश्वरं नमाम्यहम्॥”

स्रोत: “श्री खेतेश्वर ब्रह्मधाम तीर्थ—जीवन-कथा” (https://brahmdhamtirth.org/sant-kheteshwar-maharaj/) एवं “ब्रह्मधाम आसोतरा—तीर्थ परिचय” (https://brahmdhamtirth.org/about/)