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सुप्रीम कोर्ट ने ‘इंडस्ट्री’ की परिभाषा से जुड़ा 48 वर्ष पुराना परीक्षण परिष्कृत किया

प्रकाशित: 21 August 2026, 9:37 am अपडेट: 30 August 2026, 12:45 pm

नई दिल्ली, 21 अगस्त। सुप्रीम कोर्ट की नौ न्यायाधीशों वाली संविधान पीठ ने औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 की धारा 2(जे) के अंतर्गत किसी संस्था या गतिविधि को ‘इंडस्ट्री’ मानने के लिए वर्ष 1978 के ऐतिहासिक बैंगलोर वाटर सप्लाई एंड सीवरेज बोर्ड बनाम ए. राजप्पा निर्णय में निर्धारित ‘ट्रिपल टेस्ट’ के कुछ पहलुओं को परिष्कृत किया है। मामला स्टेट ऑफ उत्तर प्रदेश बनाम जयबीर सिंह से संबंधित था।

पुराने ट्रिपल टेस्ट के अनुसार किसी गतिविधि को इंडस्ट्री मानने के लिए तीन मुख्य तत्व देखे जाते थे—गतिविधि संगठित और व्यवस्थित हो, उसमें नियोक्ता एवं कर्मचारी के बीच सहयोग हो और उसका उद्देश्य मानवीय आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए वस्तुओं या सेवाओं का उत्पादन अथवा वितरण करना हो। संस्था का लाभ कमाना अनिवार्य शर्त नहीं माना गया था। इसी व्यापक व्याख्या के कारण पारंपरिक कारखानों से अलग अनेक सेवा और कल्याणकारी संस्थानों पर भी श्रम कानून लागू होने की संभावना बनी थी।

सुप्रीम कोर्ट ने बहुमत से माना कि पुराने परीक्षण के कुछ पहलुओं को नए सिरे से स्पष्ट और परिष्कृत करने की आवश्यकता है। हालांकि न्यायालय ने यह सुनिश्चित किया कि नए स्पष्टीकरण के कारण पहले से तय हो चुके मामलों और वर्तमान में लंबित विवादों में अनिश्चितता उत्पन्न न हो। नया परिष्कृत मानदंड भविष्य के मामलों पर लागू होगा, जबकि औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 के तहत लंबित कार्यवाही का निर्णय पुराने बैंगलोर वाटर सप्लाई परीक्षण के अनुसार होगा।

न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि यह निर्णय पुराने औद्योगिक विवाद अधिनियम की परिभाषा तक सीमित है। औद्योगिक संबंध संहिता, 2020 में दी गई ‘इंडस्ट्री’ की परिभाषा की व्याख्या स्वतंत्र रूप से की जाएगी और पुराने निर्णय को उसका स्वतः आधार नहीं माना जाएगा।

इस फैसले का महत्त्व इसलिए है क्योंकि किसी संस्था को इंडस्ट्री मानने पर उसके कर्मचारियों और प्रबंधन के बीच विवाद, सेवा-समाप्ति, छंटनी, औद्योगिक न्यायाधिकरण तथा अन्य श्रम-कानूनी अधिकार प्रभावित हो सकते हैं। निर्णय की विस्तृत कानूनी व्याख्या पूर्ण लिखित आदेश के आधार पर ही की जानी चाहिए।