ब्रेकिंग न्यूज़
वित्त एवं व्यापार जगत

मुफ्त UPI का दौर खत्म? आर्थिक लाभ और डिजिटल संप्रभुता की लड़ाई

प्रकाशित: 11 August 2026, 4:12 pm अपडेट: 12 August 2026, 6:00 am

धर्मेंद्र सुंदेशा
फाउंडर, मारवाड़ पत्रिका

UPI पर शुल्क की मौजूदा चर्चा केवल कोई नया टैक्स या चार्ज जोड़ने का मामला नहीं है। यह सवाल इससे कहीं बड़ा है कि भारत अपनी डिजिटल अर्थव्यवस्था को किस दिशा में ले जाना चाहता है, ऑनलाइन भुगतान व्यवस्था को चलाने का खर्च कैसे निकलेगा और विदेशी भुगतान कंपनियों पर देश की निर्भरता कितनी रहेगी।

UPI की सबसे बड़ी खूबी यह रही है कि इसने ऑनलाइन पैसों के लेन-देन को महंगी बैंकिंग सेवा बनाने के बजाय आम नागरिक की पहुंच वाली बुनियादी डिजिटल सुविधा बना दिया। जुलाई 2026 में UPI के जरिए रिकॉर्ड 23.66 अरब लेन-देन हुए, जिनका मूल्य लगभग ₹29.88 लाख करोड़ रहा। इतनी विशाल व्यवस्था के पीछे बैंकिंग नेटवर्क, सर्वर, साइबर सुरक्षा, भुगतान सेवा प्रदाता और लगातार तकनीकी सुधार की आवश्यकता होती है।

इसी कारण UPI के आर्थिक मॉडल को टिकाऊ बनाने का सवाल उठ रहा है। हाल में ऐसी रिपोर्टें सामने आई हैं कि सरकार बड़े व्यापारिक प्रतिष्ठानों को किए जाने वाले कुछ UPI भुगतानों पर Merchant Discount Rate (MDR) की संभावना पर विचार कर रही है। जुलाई में प्रकाशित रिपोर्टों के अनुसार ₹2,000 से अधिक के कुछ बड़े merchant transactions पर 0.5 प्रतिशत से कम MDR का प्रस्ताव विचाराधीन रहा है। हालांकि अभी इसे अंतिम रूप से लागू शुल्क नहीं माना जाना चाहिए।

वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने अब स्पष्ट किया है कि आम उपभोक्ताओं तथा छोटे व्यापारियों के लिए UPI भुगतान मुफ्त बने रहेंगे। इसलिए चाय, सब्जी या सामान्य छोटे भुगतान करने वाले व्यक्ति पर फिलहाल किसी UPI शुल्क की बात नहीं है।

इस बहस का एक अंतरराष्ट्रीय पहलू भी है। UPI के विस्तार ने भारत को अपनी घरेलू डिजिटल भुगतान संरचना मजबूत करने और विदेशी कार्ड नेटवर्क पर निर्भरता कम करने में सहायता की है। इस दृष्टि से UPI केवल भुगतान का माध्यम नहीं, बल्कि भारत की डिजिटल संप्रभुता का भी महत्वपूर्ण हिस्सा है।

असली सवाल यह है कि क्या UPI को सड़क और सार्वजनिक डिजिटल ढांचे जैसी बुनियादी सुविधा माना जाए या उसके संचालन की लागत का कुछ हिस्सा बड़े व्यावसायिक उपयोगकर्ताओं से लिया जाए? यदि व्यवस्था हमेशा पूरी तरह मुफ्त रखी जाती है तो उसके संचालन की लागत कहीं न कहीं सरकार, बैंकों अथवा भुगतान कंपनियों को वहन करनी होगी। दूसरी तरफ, यदि शुल्क का दायरा बहुत व्यापक हुआ तो डिजिटल भुगतान से नकदी की ओर वापसी का जोखिम भी पैदा हो सकता है।

इसलिए संतुलित रास्ता यह हो सकता है कि आम नागरिक, रेहड़ी-पटरी वाले और छोटे व्यापारी UPI की शून्य-शुल्क व्यवस्था में बने रहें, जबकि बड़े व्यावसायिक लेन-देन के लिए यदि कोई शुल्क व्यवस्था बनाई जाए तो वह न्यूनतम, स्पष्ट और पारदर्शी हो।

अंततः यह बहस केवल “भारत बनाम अमेरिका” की नहीं है। मूल प्रश्न यह है कि भारत अपने बनाए विश्वस्तरीय डिजिटल भुगतान ढांचे को सुलभ, टिकाऊ और राष्ट्रीय हितों के अनुरूप किस प्रकार चलाता है। भारत ने दुनिया को दिखाया है कि डिजिटल भुगतान को करोड़ों लोगों तक कैसे पहुंचाया जा सकता है; अगली चुनौती यह साबित करने की है कि इस व्यवस्था को आर्थिक रूप से टिकाऊ रखते हुए उसकी सार्वभौमिक पहुंच भी कैसे कायम रखी जाए।