सेवा एवं जीवन दर्शन

विजयादशमी – नैतिकता की विजय का अमर-पाथेय

प्रकाशित: 22 October 2026, 8:10 am अपडेट: 23 October 2026, 8:14 am

जबलपुर।

प्रतिवर्ष विजयादशमी के पावन पर्व को उत्साह और उल्लास पूर्वक मनाने की भारतीय पर्व परम्परा सम्पूर्ण भारतीय समाज को “आत्म-मंथन”, निजी जीवन में आत्म-संयम और सामाजिक जीवन में नैतिक मूल्यों के अनुपालन व उनके संरक्षण की प्रेरणा देने वाला महान पर्व है। जिसे राम-रावण के मध्य हुए युद्ध की गौरव-गाथा के माध्यम से भारत की नवोदित पीढ़ी और युवावर्ग के बीच संस्कार स्थापित करने का “अमर-पाथेय” माना गया है।

दुराधर्ष रावण का श्री राम के द्वारा वध इसलिए हुआ कि श्री राम नैतिक नियमों से सुसज्जित रहे, उनके विपरीत लंकाधिपति रावण अनैतिक आचरण के माध्यम से विजयश्री का वरण चाहता था। परन्तु विजयश्री ने श्री राम के नैतिक साहस का न केवल साथ दिया, बल्कि विजयश्री की माला ने श्री राम के कण्ठ को सुशोभित किया और रावण के कण्ठ में पराजय की अपयशी पीड़ा ने उसे रुलाया।

सिद्धांत यह स्थापित हुआ कि – “समाज को रुलाने वाला कभी विजयश्री का अधिकारी नहीं होता, रुलाने वाला स्वयं तो नष्ट हो जाता है परन्तु उसकी मौत पर आंसू बहाने वाला कोई नहीं बचता।” “रहा न कोऊ कुल रोवनहारा” धर्माधर्म, सत्यासत्य, प्रकाश और अंधकार जब-जब भी परस्पर जय और पराजय के लिये संघर्ष-रत हुए हैं, इतिहास साक्षी है – धर्म से अधर्म पराजित हुआ है, अंधकार सदैव प्रकाश के समक्ष नतमस्तक हुआ है तथा असत्य, सत्य के समक्ष धराशायी हुआ है, यही ऐतिहासिक तथ्य और पारम्परिक सत्य है।

तभी तो भारतीय ऋषियों ने हुंकार भरी है – सत्यमेव जयते नानृतम्। उपनिषद् काल के ऋषि कहते हैं – असतो मा सद्गमय। तमसो मा ज्योतिर्गमय। मृत्योर्मा अमृतं गमय।

विजयादशमी का पावन पर्व हमें प्रतिवर्ष यही संदेश देता है – हम सत्य के मार्ग पर चलें, धर्म के दिखाये रास्ते पर चलें, अनित्य को जीवन का साध्य न मानकर नित्य और शाश्वत की साधना में जीवन पर्यंत लगे रहें। अगर मुझसे पूर्व किसी ने जीवन का परम लक्ष्य प्राप्त किया है तो मैं भी उसे पा सकता हूँ, यह दृढ़ विश्वास मन में निरंतर सुदृढ़ होता रहे। जीवन का प्राप्तव्य मुझे मिलेगा ही।

धर्मं चर। सत्यं वद। स्वाध्याय-प्रवचनाभ्यां मा प्रमदितव्यम्।

भगवान श्री राम ने ऐसे ही नैतिक बल पर दुराधर्ष रावण का वध किया है। हम आप भी नैतिक साहस और अपने दृढ़ संकल्प के पराक्रम के बल पर अपने अंदर विराजमान काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मात्सर्य, अहंकार, घृणा, तृष्णा और छल-दंभ-कपट-पाखंड रूपी दुराधर्ष रावण को समाप्त करने का संकल्प लें।

विजयादशमी के पुनीत अवसर पर आपको अनंतानंत शुभकामनाएँ।

भवदीय,

महामंडलेश्वर स्वामी श्री अखिलेश्वरानंद गिरि जी महाराज, समन्वय सेवा केन्द्र, आदि शंकराचार्य चौक, जबलपुर