वीर विक्रमादित्य का लोकधर्म : अनाथों का पिता और असुरक्षितों का रक्षक
सोमदेव के विक्रमादित्य में प्रजापालन का मानवीय अर्थ
एक व्यक्ति शक्तिशाली होकर भी दूसरों के लिए अनुपयोगी रह सकता है। राजत्व की कसौटी इससे आगे जाती है। राजा के पास पहुंचने वाला कमजोर व्यक्ति यदि पहले से अधिक डरा हुआ लौटे, तो वैभव के बीच भी शासन की मूल जिम्मेदारी अधूरी रह जाती है। विक्रमादित्य की साहित्यिक छवि इसी जिम्मेदारी को हृदय का विषय बनाती है।
सोमदेव के ‘कथासरित्सागर’ के तरंग 120 में उज्जयिनी के राजा महेन्द्रादित्य के पुत्र विक्रमादित्य का वर्णन है। उसमें उन्हें अनाथों के पिता, मित्रहीनों के मित्र और असुरक्षित लोगों के रक्षक के भाव में प्रस्तुत किया गया है। वीरता के साथ उनके स्वभाव की कठोरतारहित विशेषता भी बताई गई है। इस वर्णन में प्रजा संख्याओं का समूह नहीं, संबंध और संरक्षण की अधिकारी है।
‘अनाथों का पिता’ कहना जन्म-संबंध का विवरण नहीं, प्रजापालन का गहरा रूपक है। वह राजा की जिम्मेदारी को वहां तक पहुंचाता है जहां व्यक्ति के पास अपनी बात रखने वाला कोई नहीं। मित्रहीन का मित्र होना उस अकेलेपन को स्वीकारना है जिसमें गरीबी, बीमारी अथवा संकट और कठिन हो जाते हैं। असुरक्षित का रक्षक होना व्यवस्था के उद्देश्य को स्पष्ट करता है।
आज इस भाव को छोटे और ठोस कामों में उतारा जा सकता है। किसी बुजुर्ग को आवेदन भरने में सहायता देना, दिव्यांग व्यक्ति को सेवा तक पहुंचाना, परेशान कर्मचारी की बात पूरी सुनना और जरूरतमंद की सहायता में उसका सम्मान बचाए रखना—ये आधुनिक जीवन में प्रजावत्सलता के रूप हैं। यह वर्तमान की व्याख्या है, किसी प्राचीन शासन-योजना का विवरण नहीं।
करुणा का अर्थ केवल दुख देखकर व्यथित हो जाना नहीं। उससे अगला कदम निकलना चाहिए। किसे भोजन चाहिए, किसे इलाज, किसे कानूनी सहायता और किसे केवल एक भरोसेमंद साथ—इन प्रश्नों तक पहुंचने पर करुणा सेवा बनती है।
विक्रमादित्य का यह रूप हमें बताता है कि मजबूत कंधों का सौंदर्य सहारा देने में है। समाज को ऐसे व्यक्तियों की जरूरत है जिनके पास पहुंचकर कोई असहाय अपने को बोझ न समझे।
कविता 2 जिसकी शक्ति सहारा हो
अनाथ आंख में जो ठहरा,
उस आंसू को नाम दो;
वीर विक्रम की स्मृति लेकर,
अपनी बांहों से थाम लो।
मित्रहीन की सूनी चौखट,
कितनी संध्या गिनती है;
भीड़ भरे इस नगर के भीतर,
चुप्पी कैसी बिनती है!
एक कदम उस ओर बढ़ाओ,
जहां पुकार दब जाती है;
जिस घर में दीपक कम पड़ते,
रात वहीं बढ़ जाती है।
सहायता का हाथ बढ़े तो,
मन में ऊंच-नीच न आए;
रोटी देते समय किसी का,
मान न पैरों में रखवाए।
राजा की करुणा का अर्थ,
दुख में मिलना और निभाना;
कमजोरों के बीच उतरकर,
उनका जीवन सरल बनाना।
हमें वही सामर्थ्य चाहिए,
जिसकी शक्ति सहारा हो;
जिसके आने से निर्बल को,
जीवन फिर से प्यारा हो।
