ब्रेकिंग न्यूज़
सेवा एवं जीवन दर्शन

​रुपहले पर्दे का ‘क्रांतिवीर’, असल ज़िंदगी का ‘मसीहा’: नाना पाटेकर की कहानी

प्रकाशित: 8 October 2026, 4:12 pm

मुंबई की चकाचौंध और बॉलीवुड के ग्लैमरस सितारों के बीच एक शख्स ऐसा है, जो कैमरे के सामने आते ही अपनी दमदार आवाज़ से पर्दा फाड़ देता है, लेकिन असल ज़िंदगी में किसी आम इंसान से भी ज़्यादा ज़मीन से जुड़ा है। यह कहानी है विश्वनाथ पाटेकर की, जिन्हें दुनिया नाना पाटेकर के नाम से जानती है।

चकाचौंध से दूर

एक सादा जीवननाना पाटेकर का जीवन इस बात का प्रमाण है कि इंसान की महानता उसके कपड़ों या घर के आकार से नहीं, बल्कि उसके विचारों से तय होती है। करोड़ों की संपत्ति होने के बावजूद, नाना दशकों तक मुंबई के अंधेरी स्थित एक छोटे से वन-बीएचके (1 BHK) फ्लैट में अपनी माँ के साथ रहे। उनका व्यावहारिक वेश कभी बॉलीवुड के स्टारडम का मोहताज नहीं रहा। वे अक्सर साधारण सूती कुर्ते-पायजामे या एक आम टी-शर्ट और पैंट में नज़र आते हैं। उनके पैरों में महंगी जूतियों की जगह अक्सर साधारण चप्पलें होती हैं। वे उस दौर के अभिनेता हैं जो अपनी फिल्म के सेट पर भी खुद खाना पकाकर पूरी यूनिट को खिलाना पसंद करते हैं।

किसानों का दर्द और एक मसीहा का उदय

नाना का दिल हमेशा खेतों की मिट्टी के लिए धड़कता रहा है। जब महाराष्ट्र के मराठवाड़ा और विदर्भ इलाकों में सूखे के कारण किसानों ने आत्महत्याएं करनी शुरू कीं, तो बॉलीवुड के इस ‘क्रांतिवीर’ से एसी कमरों में नहीं बैठा गया। उन्होंने केवल सोशल मीडिया पर संवेदनाएं नहीं जताईं, बल्कि वे खुद उन धूल भरी पगडंडियों पर निकल पड़े।

उन्होंने उन विधवाओं के आंसू पोछे जिनके पतियों ने कर्ज के बोझ तले अपनी जान दे दी थी। नाना ने अपनी जमापूंजी से करोड़ों रुपये निकालकर उन बेसहारा परिवारों में 15-15 हज़ार रुपये के चेक बांटे। उनका मानना था, “किसान हमारा अन्नदाता है। अगर वह रो रहा है, तो हमें सुकून से रोटी खाने का कोई हक नहीं।

“मदद के लिए हमेशा आगे: ‘नाम फाउंडेशन’

नाना केवल एक बार मदद करके रुकने वालों में से नहीं थे। उन्होंने इस समस्या को जड़ से मिटाने की ठानी। उन्होंने अपने साथी अभिनेता मकरंद अनासपुरे के साथ मिलकर ‘नाम फाउंडेशन’ (NAAM Foundation) की स्थापना की। इस फाउंडेशन ने न सिर्फ किसानों की आर्थिक मदद की, बल्कि नदियों को गहरा करने, कुएं खुदवाने और जल संरक्षण के ऐसे बड़े प्रोजेक्ट चलाए, जिन्होंने कई सूखे गांवों की तस्वीर बदल दी।

अदाकार से कहीं बढ़कर एक इंसान

चाहे करगिल युद्ध के दौरान सीमा पर जाकर जवानों का हौसला बढ़ाना हो, या किसी गरीब की चुपचाप आर्थिक मदद करना, नाना हमेशा पहली पंक्ति में खड़े नज़र आए। उन्होंने कभी अपने सामाजिक कार्यों का पीआर (PR) नहीं करवाया।

नाना पाटेकर की कहानी हमें यह सिखाती है कि पर्दे पर चाहे आप कितनी भी तालियां बटोर लें, असली सम्मान तब मिलता है जब आपके कर्म किसी रोते हुए इंसान के चेहरे पर मुस्कान ले आएं। वे साबित करते हैं कि बेहतरीन अदाकार होना एक कला है, लेकिन उससे भी बेहतर इंसान होना, एक तपस्या है।