सच्चा दानवीर कौन? — राजा विक्रमादित्य की कथा
राजा विक्रमादित्य से जुड़ी लोककथाओं में उनके साहस के साथ उदारता की भी चर्चा होती है। उन्हीं भावों पर आधारित यह कहानी है।
एक दिन राजा विक्रमादित्य के दरबार में दो व्यापारी आए। दोनों नगर के बड़े दानी कहलाते थे, लेकिन उनके बीच विवाद था कि अधिक उदार कौन है।
पहले व्यापारी ने कहा, “महाराज, मैंने नगर में एक विशाल धर्मशाला बनवाई है। प्रतिदिन सैकड़ों यात्री उसमें ठहरते हैं।”
दूसरा बोला, “मैं हर महीने गरीबों को अन्न और वस्त्र देता हूँ। मेरे द्वार से कोई खाली हाथ नहीं लौटता।”
राजा ने दोनों की बात सुनी और कहा, “कल सुबह मेरे साथ चलना। तुम्हारे प्रश्न का उत्तर रास्ते में मिलेगा।”
अगली सुबह राजा साधारण वस्त्र पहनकर दोनों व्यापारियों को नगर से बाहर ले गए। चलते-चलते उन्हें एक वृद्धा की झोंपड़ी दिखाई दी। राजा ने उसके द्वार पर पहुंचकर कहा, “माता, हम यात्री हैं। कुछ खाने को मिल सकता है?”
वृद्धा ने उन्हें भीतर बैठाया। उसके पास थोड़े आटे से बनी केवल दो रोटियाँ थीं। उसने रोटियों के टुकड़े किए और तीनों अतिथियों के सामने रख दिए।
राजा ने पूछा, “आप नहीं खाएँगी?”
वृद्धा मुस्कराई, “तुम लोग रास्ता चलकर आए हो। पहले खा लो। मेरे लिए बाद में कुछ व्यवस्था हो जाएगी।”
पास बैठी उसकी छोटी पोती धीरे से बोली, “दादी, घर में तो और आटा नहीं है।”
दोनों व्यापारी एक-दूसरे को देखने लगे। राजा ने वृद्धा से पूछा, “जब आपके पास इतना ही भोजन था, तो हमें क्यों दे दिया?”
वृद्धा बोली, “बेटा, भूख मैंने भी देखी है। भूखा आदमी द्वार पर आए तो उसे बैठाकर अपना दुख सुनाऊँ या रोटी दूँ?”
भोजन के बाद तीनों बाहर निकले। कुछ दूर जाकर राजा ने व्यापारियों से कहा, “तुम दोनों के दान से बहुत लोगों को सहायता मिलती है। लेकिन आज उस माता ने अपना भोजन दे दिया। उसे हमारा नाम तक नहीं मालूम। वह यह भी नहीं जानती कि उसके इस काम की चर्चा कभी होगी।”
पहले व्यापारी ने सिर झुका लिया। दूसरे ने कहा, “महाराज, हम अपने दान का हिसाब लेकर आए थे। उस वृद्धा ने तो हिसाब ही नहीं रखा।”
राजा ने लौटकर वृद्धा के भोजन और आजीविका की नियमित व्यवस्था करवाई। दोनों व्यापारियों ने भी उस दिन से अपने दान की प्रशंसा करने के बजाय जरूरतमंदों की कठिनाइयाँ समझने पर अधिक ध्यान दिया।
कथा की सीख: दान का मूल्य केवल उसकी मात्रा से नहीं, देने वाले की संवेदना और त्याग से भी तय होता है।
