सेवा एवं जीवन दर्शन

मैं गांधी हूँ… क्या यही वह भारत है, जिसका मैंने सपना देखा था? गांधी जयंती पर राष्ट्रपिता की अंतरात्मा से निकला एक कल्पित आत्मकथ्य

प्रकाशित: 2 October 2026, 8:23 am

धर्मेन्द सुन्देशा

मैं गांधी हूँ।

वही गांधी, जिसकी तस्वीर तुम्हारी अदालतों, सरकारी कार्यालयों और विद्यालयों की दीवारों पर टंगी है। वही गांधी, जिसका चेहरा तुम्हारी मुद्रा पर छपा है। वही गांधी, जिसका नाम तुम हर वर्ष 2 अक्टूबर को श्रद्धा से लेते हो—पर शायद जिसकी आवाज सुनने का समय तुम्हारे पास नहीं रहा।

आज मैं फिर इस भारत की धरती पर खड़ा हूँ। मेरे हाथ में लाठी है, शरीर पर वही साधारण धोती और आँखों में वही सपना—जिसे लेकर मैं नंगे पाँव इस देश की पगडंडियों पर चला था।

पर आज मेरे कदम ठिठक रहे हैं।

मैं उस भारत को ढूँढ़ रहा हूँ, जिसके लिए लाखों लोगों ने जेलें भरीं, लाठियाँ खाईं, अपना सुख छोड़ा और प्राण न्योछावर कर दिए। वह भारत, जहाँ सत्ता का अर्थ शासन करना नहीं, सेवा करना था; राजनीति का उद्देश्य पद पाना नहीं, अंतिम व्यक्ति के आँसू पोंछना था।मैंने हिंसा का मार्ग क्यों नहीं चुना थामेरे सामने अंग्रेजी साम्राज्य था। वह कोई साधारण सत्ता नहीं थी। उसके पास सेना थी, हथियार थे, कानून था, जेलें थीं और दमन का विशाल तंत्र था।यदि हम हिंसा का रास्ता चुनते तो हम उसके ही मैदान में उतरते—जिसमें वह हमसे कहीं अधिक शक्तिशाली था। अंग्रेज हिंसा करना भी जानते थे और हिंसा करवाना भी। लेकिन अहिंसा के सामने उनकी शक्ति असहाय होने लगी।

हमने तलवार के सामने सत्य रखा।

बंदूक के सामने निर्भयता रखी।

लाठी के सामने अपना सीना रखा।

घृणा के सामने प्रेम रखा।

जब निहत्थे लोगों पर प्रहार हुआ और उन्होंने पलटकर प्रहार नहीं किया, तब केवल शरीर घायल नहीं हुए—साम्राज्य की नैतिकता भी घायल हुई। सत्याग्रह ने जनता को उसकी शक्ति का बोध कराया। मैंने लोगों को यह समझाने का प्रयास किया कि अन्याय करने वाला तभी तक शक्तिशाली है, जब तक अन्याय सहने वाला उसके सामने स्वयं को असहाय मानता है।

मैंने उपवास किए। वे किसी को पराजित करने के लिए नहीं थे। वे स्वयं को शुद्ध करने, समाज की सोई हुई अंतरात्मा जगाने और हिंसा के बीच मनुष्य को मनुष्य की याद दिलाने के प्रयास थे।

आज देखता हूँ कि उपवास भी प्रदर्शन बन सकता है, सत्य भी प्रचार का विषय और अहिंसा भी केवल भाषण की एक पंक्ति।

मैंने ऐसे भारत की कल्पना नहीं की थीमैंने सोचा था कि स्वतंत्र भारत में सत्ता जनता से डरेगी और जनता सत्ता से नहीं। आज कई बार जनता प्रश्न पूछने से डरती है और सत्ता प्रश्न सुनने से।

मैंने जिस लोकतंत्र की कल्पना की थी, उसमें मतदाता केवल चुनाव के दिन स्वामी नहीं होता। वह हर दिन राष्ट्र का स्वामी होता। निर्वाचित प्रतिनिधि उसका सेवक होता। पर आज चुनाव आते ही गरीब के द्वार पर हाथ जुड़ते हैं और चुनाव बीतते ही वही हाथ सत्ता की ऊँची दीवारों के पीछे खो जाते हैं।लोकतंत्र केवल मतदान का नाम नहीं है। लोकतंत्र असहमति सुनने का साहस है। आलोचक को शत्रु न मानने की परिपक्वता है। कमजोर व्यक्ति को भी निर्भय होकर अपनी बात कहने का अधिकार है।

यदि जनता पाँच वर्ष में एक बार वोट दे और शेष समय केवल आदेश सुने, तो लोकतंत्र का शरीर भले जीवित दिखाई दे, उसकी आत्मा धीरे-धीरे मरने लगती है।गरीब आज भी अंतिम पंक्ति में क्यों खड़ा है?

मैंने कहा था कि कोई निर्णय लेते समय उस सबसे गरीब और कमजोर मनुष्य का चेहरा याद करो, जिसे तुमने देखा हो। स्वयं से पूछो—क्या तुम्हारा निर्णय उसके जीवन में कोई लाभ पहुँचा सकेगा?

लेकिन आज मैं देख रहा हूँ कि गरीब का चेहरा अक्सर चुनावी पोस्टर पर तो दिखाई देता है, निर्णयों की मेज पर नहीं।

उसके नाम पर योजनाएँ बनती हैं, घोषणाएँ होती हैं और मंच सजते हैं। फिर भी उसे उपचार के लिए भटकना पड़ता है, शिक्षा के लिए कर्ज लेना पड़ता है और न्याय के लिए वर्षों प्रतीक्षा करनी पड़ती है। उसका श्रम विकास की इमारत बनाता है, पर उस इमारत में उसके परिवार के लिए एक सुरक्षित कमरा तक नहीं होता।

मैं उद्योग का विरोधी नहीं था, संपत्ति का भी शत्रु नहीं था। लेकिन मैं ऐसी व्यवस्था से भयभीत था जिसमें कुछ हाथों में अथाह संपत्ति इकट्ठी हो जाए और करोड़ों हाथ जीवन की मूल आवश्यकताओं के लिए फैले रहें।मैं पूँजी को समाज की धरोहर मानता था और संपन्न व्यक्ति को उसका न्यासी। आज पूँजी मनुष्य की सेवा करने के बजाय कई बार मनुष्य को ही अपने लाभ का साधन बना रही है। बाजार ने नागरिक को ग्राहक बना दिया है और राजनीति ने नागरिक को वोट।

मनुष्य कहाँ रह गया?

गाँवों का भारत कहाँ है?

मैंने भारत की आत्मा गाँवों में देखी थी। मेरी कल्पना का ग्राम स्वराज ऐसा था, जिसमें गाँव केवल प्रशासन की अंतिम इकाई नहीं, अपने निर्णय स्वयं करने वाला जीवंत समुदाय होता। वहाँ श्रम का सम्मान होता, स्थानीय उत्पादन होता, स्वच्छता होती और व्यक्ति आत्मनिर्भर होता।

आज गाँवों का युवा अवसर की तलाश में शहर की भीड़ में खो रहा है। किसान अपनी उपज का न्यायपूर्ण मूल्य माँगते-माँगते वृद्ध हो जाता है। कारीगर के हाथों का कौशल मशीन और बाजार के दबाव में दम तोड़ता है।एक तरफ चमकते महानगर हैं, दूसरी तरफ पानी, विद्यालय, अस्पताल और रोजगार की प्रतीक्षा करते गाँव। यदि विकास कुछ नगरों की ऊँची इमारतों से मापा जाएगा, तो उन इमारतों की छाया में खड़े करोड़ों लोगों का अँधेरा कौन देखेगा?मेरा नाम बचा लिया, मेरे विचार क्यों छोड़ दिए?

तुमने मेरी प्रतिमाएँ बनाईं, सड़कों और योजनाओं को मेरा नाम दिया। मेरे चश्मे को स्वच्छता का प्रतीक बनाया। यह सब देखकर मुझे प्रसन्न होना चाहिए था।पर मेरा मन पूछता है—क्या केवल सड़कों की गंदगी साफ करना पर्याप्त है? मन की घृणा, राजनीति का झूठ, व्यवस्था का भ्रष्टाचार, समाज का भेदभाव और सार्वजनिक जीवन का अहंकार कौन साफ करेगा?मेरे चश्मे का अर्थ केवल दो गोल शीशे नहीं थे। वह दृष्टि थी—सत्य को देखने की दृष्टि, अपने विरोधी में भी मनुष्य देखने की दृष्टि और सबसे कमजोर व्यक्ति के भीतर ईश्वर देखने की दृष्टि।

आज मेरे चित्र के नीचे बैठकर झूठ बोला जाता है। मेरी प्रतिमा पर फूल चढ़ाकर नफरत के भाषण दिए जाते हैं। मेरी जयंती पर स्वच्छता की शपथ ली जाती है और अगले दिन सार्वजनिक जीवन फिर उसी अस्वच्छता में लौट जाता है।तुमने मुझे सम्मान बहुत दिया, लेकिन मेरे सत्य को अपने जीवन में स्थान बहुत कम दिया।

मुझे सबसे अधिक पीड़ा किस बात की है? मुझे इस बात की पीड़ा नहीं कि भारत बदल गया। परिवर्तन प्रकृति का नियम है। मुझे पीड़ा इस बात की है कि प्रगति के बीच मनुष्यता पीछे छूटती दिखाई दे रही है।

धर्म मनुष्य को विनम्र बनाने के बजाय यदि उसे दूसरे से घृणा करना सिखाए, तो वह धर्म नहीं—अहंकार है। राष्ट्रप्रेम यदि दूसरे नागरिक को संदेह की दृष्टि से देखने लगे, तो वह प्रेम नहीं—भय है। विकास यदि प्रकृति को नष्ट करे और कमजोर को कुचले, तो वह विकास नहीं—भविष्य से लिया गया कर्ज है।

मैं हिंदू था, लेकिन मेरा हिंदू धर्म मुझे प्रत्येक धर्म का आदर करना सिखाता था। मैं राम का नाम लेता था, पर मेरे राम किसी एक समुदाय के नहीं थे। मेरा राम सत्य था, करुणा था और मर्यादा था।जब मैं किसी मनुष्य को उसके धर्म, जाति, भाषा या विचार के कारण अपमानित होते देखता हूँ, तब मेरे सीने पर फिर वही गोली लगती है।

फि

र भी मैं निराश नहीं हूँमेरी आँखों से आँसू अवश्य निकले हैं, लेकिन मेरा विश्वास अभी नहीं मरा।मैंने उस समय भी भारत पर विश्वास किया था, जब देश गुलाम था। फिर आज स्वतंत्र भारत से आशा कैसे छोड़ दूँ?

मुझे आज भी वह शिक्षक दिखाई देता है, जो कम साधनों में बच्चों का भविष्य बना रहा है। वह किसान दिखाई देता है, जो कठिनाइयों के बावजूद धरती को अन्न दे रहा है। वह चिकित्सक दिखाई देता है, जो गरीब रोगी की सेवा कर रहा है। वह पत्रकार दिखाई देता है, जो दबाव के बावजूद सत्य लिख रहा है। वह युवा दिखाई देता है, जो जाति और धर्म से ऊपर उठकर मनुष्य की सहायता कर रहा है।

यही लोग मेरे भारत की बची हुई आशा हैं।यदि तुम वास्तव में मुझे श्रद्धांजलि देना चाहते हो तो मेरे चित्र पर एक माला कम चढ़ा देना, लेकिन किसी पीड़ित की बात सुन लेना। मेरा एक भाषण कम पढ़ लेना, लेकिन एक झूठ बोलने से स्वयं को रोक लेना। मेरी प्रतिमा के सामने सिर झुकाने से पहले अपने भीतर बैठे अहंकार को झुका लेना। और जब भी कोई निर्णय करो, उस अंतिम व्यक्ति को याद करना—जिसके पास सत्ता नहीं, धन नहीं और अपनी आवाज दूर तक पहुँचाने का साधन भी नहीं।

मैं गांधी हूँ।

मुझे तुम्हारे सिक्कों और नोटों पर जीवित मत रखो। मुझे अपने व्यवहार में जीवित रखो। मैंने जिस भारत का सपना देखा था, वह अभी पूरी तरह नष्ट नहीं हुआ है। वह तुम्हारे संविधान में है, गाँवों की मिट्टी में है, श्रमिक के पसीने में है, स्त्री के संघर्ष में है और सत्य बोलने वाले प्रत्येक निर्भय नागरिक में है।उसे फिर से जगाना होगा।

क्योंकि जिस दिन भारत का अंतिम व्यक्ति भयमुक्त, सम्मानित और न्यायपूर्ण जीवन जी सकेगा—उसी दिन मुझे लगेगा कि मेरी यात्रा पूरी हुई।तब तक मेरी लाठी चलती रहेगी, मेरी आत्मा प्रश्न करती रहेगी और मेरी आँखों से गिरता प्रत्येक आँसू तुमसे यही पूछता रहेगा—क्या यही वह भारत है, जिसके लिए हमने स्वतंत्रता माँगी थी?–

-संपादकीय टिप्पणी: यह महात्मा गांधी के सत्य, अहिंसा, ग्राम स्वराज, सर्वोदय, न्यासिता और अंतिम व्यक्ति के कल्याण संबंधी विचारों से प्रेरित एक कल्पित आत्मकथ्य है। इसे गांधीजी का वास्तविक वक्तव्य या ऐतिहासिक उद्धरण न माना जाए।