अनन्त चतुर्दशी का शास्त्रीय आधार
अनन्त चतुर्दशी का मुख्य शास्त्रीय आधार पुराणोक्त अनन्त-व्रत है। इसका विधान भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी को भगवान विष्णु के ‘अनन्त’ स्वरूप की उपासना के रूप में मिलता है। इसका विस्तृत वर्णन विशेषतः भविष्योत्तर पुराण की व्रत-कथा, धर्मशास्त्रीय व्रत-ग्रन्थों तथा बाद के निर्णय-ग्रन्थों में उद्धृत है।
‘अनन्त’ कौन हैं?
शास्त्रों में ‘अनन्त’ भगवान विष्णु का नाम भी है और भगवान के शेषनाग स्वरूप का भी। श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं—
अनन्तश्चास्मि नागानां वरुणो यादसामहम्।
—श्रीमद्भगवद्गीता 10.29
अर्थात नागों में मैं अनन्त हूँ।

महाभारत के अनुशासन पर्व में आए विष्णुसहस्रनाम में भी ‘अनन्त’ भगवान विष्णु के नामों में सम्मिलित है। अतः अनन्त-व्रत में पूजित देवता मूलतः अनन्त नारायण—भगवान विष्णु हैं, जो अनन्त शेष पर विराजमान हैं और काल की अनन्तता के भी अधिष्ठाता माने गए हैं।
व्रत की तिथि
धर्मशास्त्रीय परम्परा में इसका विधान—
भाद्रपद-शुक्ल-चतुर्दश्याम् अनन्तव्रतम्
अर्थात भाद्रपद मास की शुक्ल चतुर्दशी को अनन्त-व्रत करना बताया गया है। इसी कारण इसका नाम अनन्त चतुर्दशी पड़ा।
श्रीकृष्ण–युधिष्ठिर संवाद
पुराणोक्त व्रत-कथा श्रीकृष्ण और धर्मराज युधिष्ठिर के संवाद के रूप में वर्णित है। वनवास और राज्य-नाश से दुःखी युधिष्ठिर भगवान श्रीकृष्ण से संकटों से मुक्ति का उपाय पूछते हैं। श्रीकृष्ण उन्हें अनन्त भगवान का व्रत करने का उपदेश देते हैं।
यहाँ ‘अनन्त’ को स्वयं भगवान विष्णु का स्वरूप बताते हुए उनकी आराधना, अनन्त-सूत्र धारण करने और चौदह वर्ष तक व्रत पालन का विधान समझाया गया है।
कौण्डिन्य और सुशीला की कथा
अनन्त-व्रत की शास्त्रीय कथा में ब्राह्मण सुमन्त की पुत्री सुशीला और उनके पति कौण्डिन्य ऋषि का वर्णन मिलता है। सुशीला ने नदी-तट पर स्त्रियों को अनन्त भगवान की पूजा करते देखा और उनसे विधि जानकर चौदह गाँठों वाला अनन्त-सूत्र धारण किया। इसके प्रभाव से परिवार में समृद्धि आई।
कौण्डिन्य ने अहंकारवश उस सूत्र का अपमान किया, जिसके बाद उन्हें विपत्तियों का सामना करना पड़ा। पश्चात्ताप करके उन्होंने अनन्त भगवान की खोज की। भगवान ने दर्शन देकर उन्हें चौदह वर्ष तक अनन्त-व्रत करने का निर्देश दिया। व्रत के प्रभाव से उनका संकट दूर हुआ।
इस कथा का शास्त्रीय संदेश है कि प्राप्त समृद्धि को केवल मनुष्य का अहंकारजनित पुरुषार्थ न मानकर उसमें ईश्वर-कृपा को भी स्वीकार किया जाए।
चौदह गाँठों का आधार
अनन्त-सूत्र में चौदह गाँठें लगाई जाती हैं। व्रत-परम्परा में ये चौदह गाँठें चौदह लोकों तथा अनन्त भगवान की व्यापक सत्ता का संकेत मानी गई हैं। चौदह की संख्या का संबंध चतुर्दशी तिथि से भी है।
पूजा के बाद अनन्त-सूत्र धारण करते समय यह प्रार्थना प्रचलित है—
अनन्तसंसारमहासमुद्रे मग्नं समभ्युद्धर वासुदेव।
अनन्तरूपे विनियोजयस्व ह्यनन्तरूपाय नमो नमस्ते॥
अर्थात—हे वासुदेव! इस अनन्त संसाररूपी महासमुद्र में डूबे हुए मेरा उद्धार कीजिए। मुझे अपने अनन्त स्वरूप में लगाइए। अनन्तरूप आपको बार-बार नमस्कार है।

व्रत का शास्त्रीय स्वरूप
शास्त्रीय विधान में कलश-स्थापना, कुश से अनन्त भगवान का स्वरूप बनाना, भगवान विष्णु का पूजन, चौदह गाँठों वाले सूत्र की पूजा, नैवेद्य, कथा-श्रवण और अनन्त-सूत्र धारण करना सम्मिलित है। व्रत का संकल्प सामान्यतः चौदह वर्षों के लिए बताया गया है, जिसके बाद उद्यापन का विधान है।
अतः शास्त्रीय दृष्टि से अनन्त चतुर्दशी मुख्यतः भगवान विष्णु के अनन्त स्वरूप की आराधना, अनन्त-सूत्र धारण और संकट-निवारण के संकल्प का पुराणोक्त व्रत है। इसका मूल स्वरूप गणेश-विसर्जन नहीं, बल्कि अनन्त नारायण का व्रत है।
