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शासन एवं न्यायिक आदेश

महिला होने के आधार पर नौकरी से वंचित करना गलत, सुप्रीम कोर्ट ने दिलाया ₹12 लाख मुआवजा

प्रकाशित: 18 September 2026, 11:19 am

सिलेंडर उठाने में असमर्थ मानकर IOCL ने नहीं दी थी नियुक्ति; सेवानिवृत्ति की आयु पार होने पर न्यायालय ने दिया एकमुश्त प्रतिकर

नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने महिला उम्मीदवार को केवल उसके लिंग के आधार पर एलपीजी बॉटलिंग प्लांट में नौकरी के लिए अनुपयुक्त मानने पर इंडियन ऑयल कॉरपोरेशन लिमिटेड—IOCL—को कड़ी फटकार लगाई है। न्यायालय ने लंबे समय तक रोजगार के अवसर से वंचित रहीं सुमित्रा को ₹12 लाख का एकमुश्त मुआवजा देने का निर्देश दिया।

सुमित्रा बनाम इंडियन ऑयल कॉरपोरेशन लिमिटेड एवं अन्य, SLP (Civil) No. 19874/2026 की सुनवाई 17 सितंबर 2026 को न्यायमूर्ति अरविंद कुमार और न्यायमूर्ति विपुल एम. पंचोली की पीठ ने की।

क्या था मामला

हरियाणा के गांव गुढ़ा निवासी सुमित्रा उन 49 लोगों में शामिल थीं, जिनके नाम स्थानीय उपायुक्त की अध्यक्षता वाली समिति ने इंडियन ऑयल के एलपीजी बॉटलिंग प्लांट में रोजगार के लिए अनुशंसित किए थे। उन्होंने कैजुअल खलासी, चपरासी अथवा रिफिलिंग हेल्पर पद के लिए साक्षात्कार दिया था। अनुशंसित उम्मीदवारों में से 43 लोगों को नियुक्ति-पत्र मिले, लेकिन सुमित्रा को नौकरी नहीं दी गई।

सुमित्रा का आरोप था कि निर्धारित योग्यता पूरी करने के बावजूद उन्हें केवल महिला होने और सिलेंडर उठाने जैसे शारीरिक कार्य के लिए अनुपयुक्त मानकर नियुक्ति से वंचित किया गया।

सुप्रीम कोर्ट की कड़ी टिप्पणी

सुनवाई के दौरान IOCL की ओर से कहा गया कि रिफिलिंग हेल्पर का काम शारीरिक श्रम वाला है, जिसमें एलपीजी सिलेंडर उठाने और रात की पाली में काम करने की आवश्यकता पड़ती है। इस दलील पर पीठ ने सवाल किया कि क्या केवल महिला होने के कारण किसी उम्मीदवार को नियुक्ति से वंचित किया जा सकता है।

न्यायमूर्ति अरविंद कुमार ने मौखिक टिप्पणी करते हुए कहा:

“You denied her appointment just because she is a lady? This is disrespect to womanhood.”

पीठ ने यह भी कहा कि महिलाएं अपने घरों में आवश्यकता पड़ने पर स्वयं गैस सिलेंडर बदलती और उठाती हैं। इसलिए व्यक्तिगत क्षमता की जांच किए बिना यह मान लेना कि कोई महिला सिलेंडर नहीं उठा सकती, उसकी गरिमा और समान अवसर के अधिकार के विपरीत है।

निचली अदालत ने दिया था नियुक्ति का आदेश

सुमित्रा की याचिका पर विचारण न्यायालय ने माना था कि वह निर्धारित पात्रता पूरी करती थीं। IOCL की ओर से प्रस्तुत गवाह के साक्ष्य के आधार पर अदालत ने यह भी पाया कि महिला होने के कारण उन्हें नियुक्ति नहीं दी गई। निचली अदालत ने निगम को उन्हें कैजुअल कर्मचारी, प्रशासनिक कर्मचारी अथवा चपरासी जैसे उपयुक्त पद पर समायोजित करने का निर्देश दिया था।

हालांकि, प्रथम अपीलीय अदालत ने यह आदेश पलट दिया। अपीलीय अदालत का कहना था कि समिति द्वारा भेजी गई सूची केवल अनुशंसा थी, चयन सूची नहीं। पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने भी 14 अक्टूबर 2025 को सुमित्रा की अपील खारिज करते हुए कहा था कि केवल नाम की अनुशंसा से नियुक्ति का कानूनी अधिकार उत्पन्न नहीं होता।

इसके बाद सुमित्रा ने सुप्रीम कोर्ट में विशेष अनुमति याचिका प्रस्तुत की।

नियुक्ति के बजाय मुआवजा

मामले की लंबी न्यायिक प्रक्रिया के दौरान सुमित्रा सेवानिवृत्ति की निर्धारित आयु पार कर चुकी थीं। इस कारण अब उन्हें संबंधित पद पर नियुक्त करना संभव नहीं था। उनके वर्षों तक अपने अधिकार के लिए मुकदमा लड़ने और रोजगार के अवसर से वंचित रहने को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने IOCL को ₹12 लाख का एकमुश्त मुआवजा देने का निर्देश दिया।

यह राशि नियुक्ति, पिछला वेतन अथवा पेंशन के रूप में नहीं, बल्कि रोजगार का अवसर गंवाने और भेदभावपूर्ण व्यवहार के प्रतिकर के रूप में दी गई है।

यह आदेश स्पष्ट करता है कि किसी उम्मीदवार का नाम अनुशंसित सूची में होने मात्र से उसे नियुक्ति का स्वतः अधिकार भले न मिले, लेकिन सार्वजनिक क्षेत्र का नियोक्ता किसी महिला को रूढ़ लैंगिक धारणा के आधार पर अवसर से वंचित नहीं कर सकता। यदि किसी पद के लिए विशेष शारीरिक क्षमता आवश्यक हो तो उसका मूल्यांकन समान और वस्तुनिष्ठ परीक्षण से किया जाना चाहिए, न कि केवल उम्मीदवार के महिला या पुरुष होने के आधार पर।