बाबा रामदेवजी : रूणीचा धाम विशेष (अंक – 6)
छठा अंक
लीले घोड़े रा असवार: नेजा, जम्मा, ब्यावला और तेरहताली की भक्तिमय दुनिया
रात गहरी हो चुकी है। गाँव के चौक में दीपक जल रहे हैं। बीच में बाबा रामदेवजी की तस्वीर, सामने पाँच रंगों का नेजा और चारों ओर बैठे श्रद्धालु। तंबूरे की ध्वनि उठती है, मंजीरे ताल पकड़ते हैं और कोई गायक स्वर लगाता है—
“खम्मा-खम्मा ओ म्हारा रूणीचे रा धणिया।”
धीरे-धीरे पूरा वातावरण भक्ति में डूब जाता है। यही बाबा रामदेवजी का ‘जम्मा’ है—रात्रि जागरण, जिसमें कथा, भजन, संगीत और सामूहिक श्रद्धा एक हो जाते हैं।
बाबा की परंपरा केवल मंदिर और मेले तक सीमित नहीं है। उसने लोकसंगीत, नृत्य, चित्रकला, हस्तशिल्प, मौखिक इतिहास और सामाजिक मेलजोल की विशाल सांस्कृतिक दुनिया विकसित की है।
लीला घोड़ा: सहायता के लिए तत्पर लोकदेवता
बाबा को ‘लीले घोड़े रा असवार’ कहा जाता है। चित्रों में वे घोड़े पर सवार, हाथ में नेजा लिए दिखाई देते हैं। राजस्थान पर्यटन विभाग भी उनकी छवि घोड़े पर सवार राजा के समान बताता है।
भक्त की कल्पना में यह घोड़ा गति और तत्परता का प्रतीक है। बाबा किसी महल में स्थिर बैठे देवता नहीं, बल्कि पुकार सुनते ही भक्त तक पहुँचने वाले लोकनायक हैं।
श्रद्धालु लकड़ी अथवा कपड़े से बने छोटे घोड़े भी अर्पित करते हैं। इनके रूप और निर्माण-शैली में अलग-अलग क्षेत्रों की हस्तकला दिखाई देती है। यह घोड़ा मन्नत, यात्रा और बाबा की सवारी—तीनों का प्रतीक बन गया है।
पाँच रंगों का नेजा

बाबा का ध्वज ‘नेजा’ कहलाता है। कई श्रद्धालु इसे कंधे पर लेकर सैकड़ों किलोमीटर पैदल चलते हैं। नेजा केवल कपड़े का ध्वज नहीं; वह जातरू की प्रतिज्ञा और बाबा के प्रति समर्पण का चिह्न है।
यात्रा में नेजा आगे चलता है और पूरा जत्था उसके पीछे। वह दिशा भी देता है और समूह को एक सूत्र में भी बाँधता है। नेजा उठाने वाला व्यक्ति विशेष अनुशासन रखता है। कई परिवार पीढ़ियों से एक निश्चित तिथि पर नेजा लेकर रामदेवरा जाते हैं।
लोकभाव है—
“नेजो आगे चालसी, जातरू पीछे आय।”
अर्थात बाबा का ध्वज आगे चलेगा और श्रद्धालु विश्वास के साथ उसके पीछे चलते रहेंगे।
जम्मा: पूरी रात जागती श्रद्धा
बाबा के रात्रि-जागरण को अनेक स्थानों पर ‘जम्मा’ कहा जाता है। इसमें केवल लोकप्रिय भजन नहीं गाए जाते; बाबा के जन्म, विवाह, पराक्रम, पर्चों, भक्तों और समाधि से जुड़े प्रसंग भी सुनाए जाते हैं।
जम्मा लोकशिक्षा का माध्यम भी रहा है। जिन लोगों के पास पुस्तकों और औपचारिक शिक्षा की पहुँच नहीं थी, उन्होंने बाबा का जीवन गायकों और कथावाचकों से सुना। एक पीढ़ी ने जो कथा सुनी, वह अगली पीढ़ी को सुना दी। इस प्रकार लोकस्मृति जीवित रही।
ब्यावला और लोकगाथा
‘रामदेवजी रो ब्यावलौ’ बाबा से जुड़ी प्रमुख लोकगायन परंपरा है। राजस्थान की लोकगाथाओं के अध्ययन में भी इसका उल्लेख मिलता है। इसमें उनके जीवनवृत्त, विवाह और चमत्कारों का वर्णन किया जाता है।
अलग-अलग गायकों के ब्यावले में प्रसंगों का क्रम और शब्द बदल सकते हैं। यही मौखिक साहित्य की विशेषता है। वह स्थिर पुस्तक नहीं, बल्कि हर प्रस्तुति में फिर से जीवित होने वाली परंपरा है।
चौबीस वाणियाँ: भक्ति के भीतर ज्ञान
बाबा रामदेवजी के नाम से चौबीस सबदों अथवा वाणियों की परंपरा उपलब्ध है। इनमें ज्ञान, गुरु, संसार की नश्वरता, साधना और भाव-भक्ति पर विचार मिलता है।
एक छोटा भाव है—
“देखो भाव भगति री बातां।”
यह पंक्ति मानो कहती है कि पूजा की बाहरी भव्यता से अधिक महत्त्वपूर्ण हृदय का भाव है। यदि मन में अहंकार और व्यवहार में अन्याय है, तो केवल भजन गाना पूर्ण भक्ति नहीं हो सकता।
तेरहताली: शरीर स्वयं वाद्य बन जाता है

कामड़ समुदाय की तेरहताली प्रस्तुति बाबा की भक्ति से विशेष रूप से जुड़ी है। कलाकार अपने शरीर पर मंजीरे बाँधते हैं और बैठी हुई अवस्था में अद्भुत लय के साथ उन्हें बजाते हैं। हाथों में बँधे मंजीरे शरीर के अन्य भागों से बँधे मंजीरों पर पड़ते हैं और पूरा शरीर मानो वाद्य बन जाता है।
तंबूरा, गायन और मंजीरों की संयुक्त ध्वनि में बाबा के पर्चे, डालीबाई की भक्ति और रूणीचा की महिमा सुनाई जाती है। यह केवल मनोरंजन नहीं, साधना और सामूहिक स्मृति का माध्यम है।
हरजी भाटी और भक्त कवियों की भूमिका
लोकपरंपरा में हरजी भाटी का नाम बाबा के प्रमुख भक्त और यशगायक के रूप में लिया जाता है। रतना राइका और लक्खी बंजारा भी प्रमुख भक्तों में गिने जाते हैं। इन भक्तों और लोकगायकों ने बाबा के संदेश को राजमहलों से अधिक गाँवों, ढाणियों और श्रमिक बस्तियों तक पहुँचाया।
उनकी वाणी ने बाबा को पुस्तक के पन्नों से बाहर निकालकर जनता की बोलचाल में स्थापित किया।
भजन केवल स्वर नहीं, सामाजिक स्मृति है
“रूणीचा रा धणी”, “अजमलजी रा कंवरा”, “लीले घोड़े रा असवार” और “रामसा पीर”—ये संबोधन बाबा के अलग-अलग स्वरूपों को जोड़ते हैं। किसी में पारिवारिक अपनापन है, किसी में राजसी छवि, किसी में पर्चाधारी देवता और किसी में धार्मिक सद्भाव।
जब हजारों लोग एक साथ भजन गाते हैं तो व्यक्ति की निजी पीड़ा सामूहिक आशा में बदल जाती है। शायद इसीलिए थका हुआ यात्री भजन सुनते ही फिर चल पड़ता है।
भक्ति-संदेश: बाबा का सच्चा भजन वह है जो मनुष्य के भीतर दया जगाए। मंजीरे की ध्वनि समाप्त होने के बाद भी यदि हमारे व्यवहार में समानता और सेवा की लय बनी रहे, तभी जम्मा सफल माना जाएगा।
अगले अंक में :- (समाधि से संसार तक: बाबा रामदेवजी की अमर विरासत और रूणीचा का सबसे बड़ा पर्चा)
