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वीर विक्रमादित्य की अमर कथाएँ : अंक 4

प्रकाशित: 11 September 2026, 3:52 pm

बेताल पच्चीसी की आज की कथा

पुनर्जीवित मंदारवती किसकी पत्नी?

उज्जयिनी के वीर विक्रमादित्य भारतीय लोक-साहित्य में साहस, वचनपालन और न्याय के आदर्श राजा माने जाते हैं। बेताल पच्चीसी की कथाओं में राजा एक योगी को दिए वचन के कारण श्मशान के वृक्ष से बेताल को उतारकर लाते हैं। रास्ते में बेताल उन्हें एक रहस्यमयी कथा सुनाता और अंत में न्याय का कठिन प्रश्न पूछता है। सही उत्तर देते ही बेताल फिर उड़कर उसी वृक्ष पर जा लटकता है।

एक बार राजा विक्रमादित्य बेताल को कंधे पर लेकर घने अंधकार में श्मशान से गुजर रहे थे। चारों ओर सन्नाटा था। अचानक बेताल बोला—

“राजन्! रास्ता लंबा है। मैं तुम्हें तीन युवकों और एक सुंदर कन्या की कथा सुनाता हूं। अंत में तुम्हें बताना होगा कि उस कन्या का वास्तविक पति कौन था।”

तीन युवकों ने मांगा मंदारवती का हाथ

यमुना नदी के किनारे ब्रह्मस्थल नाम का एक नगर था। वहां केशव नाम का एक विद्वान ब्राह्मण रहता था। उसकी मंदारवती नाम की अत्यंत सुंदर, सुशील और गुणवान पुत्री थी।

मंदारवती विवाह योग्य हुई तो उसके रूप और गुणों की चर्चा दूर-दूर तक फैल गई। एक दिन समान कुल, समान विद्या और लगभग समान आयु वाले तीन ब्राह्मण युवक उसके घर आए। तीनों ने मंदारवती से विवाह करने की इच्छा प्रकट की।

केशव असमंजस में पड़ गया। तीनों युवक हर प्रकार से योग्य थे। वह किसी एक को चुनता तो शेष दोनों का अपमान होता। मंदारवती भी कोई निर्णय नहीं कर सकी।

तीनों युवकों ने प्रण कर लिया कि यदि मंदारवती का विवाह उनमें से किसी एक के साथ नहीं हुआ तो वे आजीवन अविवाहित रहेंगे। इस कारण विवाह का निर्णय टलता गया।

अचानक छा गया दुःख

इसी बीच मंदारवती गंभीर रूप से बीमार पड़ गई। बहुत उपचार किए गए, लेकिन उसकी दशा बिगड़ती चली गई। कुछ दिनों बाद उसने प्राण त्याग दिए।

मंदारवती की मृत्यु से परिवार पर दुःख का पहाड़ टूट पड़ा। तीनों युवक भी शोक में डूब गए। उसका अंतिम संस्कार कर दिया गया, लेकिन तीनों के हृदय से उसका प्रेम समाप्त नहीं हुआ।

पहले युवक ने श्मशान भूमि नहीं छोड़ी। उसने मंदारवती की चिता की राख को संभालकर वहीं एक छोटी-सी कुटिया बना ली। वह राख के पास ही सोता और अपनी प्रिय की स्मृति में जीवन बिताने लगा।

दूसरे युवक ने उसकी अस्थियां एकत्र कीं और उन्हें पवित्र गंगाजल में प्रवाहित करने के लिए तीर्थयात्रा पर निकल पड़ा।

तीसरा युवक विरक्त होकर संन्यासी बन गया। वह देश-देशांतर में घूमने और साधु-संतों से ज्ञान प्राप्त करने लगा।

संजीवनी विद्या का रहस्य

यात्रा करते हुए तीसरा युवक एक दिन एक गांव में पहुंचा। सूर्य अस्त हो चुका था। उसने एक ब्राह्मण के घर रात्रि विश्राम के लिए आश्रय मांगा। गृहस्वामी ने उसका सम्मान किया और भोजन के लिए बैठाया।

उसी समय घर का छोटा बच्चा जोर-जोर से रोने लगा। उसकी माता ने उसे चुप कराने का बहुत प्रयास किया, किंतु वह नहीं माना। क्रोध में आकर माता ने बच्चे को उठाया और जलती हुई आग में डाल दिया।

यह देखकर अतिथि युवक भय से कांप उठा। उसने भोजन करने से इनकार करते हुए कहा, “मैं ऐसे घर में अन्न ग्रहण नहीं कर सकता, जहां एक माता ने अपने ही बच्चे को अग्नि में डाल दिया हो!”

गृहस्वामी शांत स्वर में बोला, “आप घबराइए नहीं। मेरे पास एक ऐसी विद्या है जिससे मृत व्यक्ति को फिर जीवित किया जा सकता है।”

उसने एक गुप्त ग्रंथ निकाला, उसमें लिखा मंत्र पढ़ा और अग्नि में भस्म हुए बालक पर अभिमंत्रित जल छिड़क दिया। देखते ही देखते बच्चा फिर जीवित होकर खेलने लगा।

युवक यह चमत्कार देखकर आश्चर्यचकित रह गया। उसके मन में तुरंत मंदारवती को जीवित करने का विचार आया।

रात में जब सभी लोग सो गए, तब उसने वह संजीवनी ग्रंथ चुरा लिया और शीघ्रता से श्मशान की ओर चल पड़ा।

मंदारवती फिर जीवित हुई

उधर दूसरा युवक मंदारवती की अस्थियां गंगा में प्रवाहित करके लौट आया था। तीनों युवक श्मशान में एकत्र हुए। संन्यासी बने युवक ने कहा, “यदि तुम दोनों मेरी सहायता करो तो मैं मंदारवती को पुनः जीवित कर सकता हूं।”

पहले युवक ने सुरक्षित रखी हुई राख प्रस्तुत की। दूसरे ने बताया कि वह अस्थियों का विधिपूर्वक संस्कार कर चुका है। तीसरे युवक ने ग्रंथ खोलकर संजीवनी मंत्र का उच्चारण किया और राख पर अभिमंत्रित जल छिड़क दिया।

तत्क्षण राख के बीच से एक दिव्य प्रकाश प्रकट हुआ। कुछ ही क्षणों में मंदारवती उसी सुंदर रूप में जीवित होकर उनके सामने खड़ी थी।

तीनों युवकों का दुःख आनंद में बदल गया, लेकिन शीघ्र ही उनके बीच एक नया विवाद खड़ा हो गया।

तीनों ने जताया अधिकार

संजीवनी विद्या लाने वाला युवक बोला, “मंदारवती को मैंने जीवन दिया है। यदि मैं मंत्र नहीं लाता तो वह कभी जीवित नहीं होती। इसलिए वही मेरी पत्नी होनी चाहिए।”

अस्थियां गंगा में प्रवाहित करने वाला युवक बोला, “मैंने उसके लिए पुत्र के समान सभी धार्मिक संस्कार किए और लंबी यात्रा का कष्ट सहा। उस पर सबसे अधिक अधिकार मेरा है।”

श्मशान में रहकर राख की रक्षा करने वाला युवक बोला, “मैंने उसका साथ मृत्यु के बाद भी नहीं छोड़ा। संसार से विरक्त होकर उसकी राख के पास ही जीवन बिताया। इसलिए मंदारवती मेरी पत्नी है।”

तीनों अपनी-अपनी बात को उचित बताते रहे, लेकिन कोई निर्णय नहीं हो सका।

बेताल का प्रश्न

कथा सुनाकर बेताल ने राजा विक्रमादित्य से पूछा—

“राजन्! एक युवक ने मंदारवती की राख की रक्षा की, दूसरे ने उसकी अस्थियां गंगा में प्रवाहित कीं और तीसरे ने संजीवनी विद्या से उसे पुनर्जीवित किया। बताओ, इन तीनों में से मंदारवती का वास्तविक पति किसे माना जाना चाहिए?”

बेताल ने फिर चेतावनी दी—

“यदि उत्तर जानते हुए भी तुम मौन रहे तो तुम्हारा सिर टुकड़े-टुकड़े हो जाएगा।”

विक्रमादित्य का न्याय

राजा विक्रमादित्य ने उत्तर दिया—

“मंदारवती को संजीवनी विद्या से जीवित करने वाला युवक उसके पिता के समान है, क्योंकि पिता ही संतान को जीवन देता है।

उसकी अस्थियां गंगा में प्रवाहित करके अंतिम संस्कार पूरा करने वाला युवक उसके पुत्र के समान है, क्योंकि माता-पिता के निधन के बाद पुत्र ही उनके धार्मिक संस्कार करता है।

लेकिन जिस युवक ने मंदारवती की राख को अपने हृदय से लगाकर रखा, श्मशान में रहकर उसकी स्मृति की रक्षा की और सुख-दुःख में उसका साथ नहीं छोड़ा, उसका व्यवहार एक निष्ठावान पति के समान था। इसलिए मंदारवती पर पति के रूप में उसी का अधिकार होना चाहिए।”

राजा का तर्कपूर्ण उत्तर सुनकर बेताल प्रसन्न हुआ और बोला—

“राजन्! तुमने संबंधों को केवल चमत्कार या कर्म से नहीं, बल्कि उनके वास्तविक स्वरूप और कर्तव्य से पहचानकर उचित न्याय किया है। तुम्हारा उत्तर बिल्कुल सही है। किंतु तुम बोल पड़े, इसलिए मैं फिर चला!”

इतना कहकर बेताल राजा के कंधे से उड़ गया और पुनः श्मशान के उसी पुराने वृक्ष पर जाकर उल्टा लटक गया।

वीर विक्रमादित्य निराश नहीं हुए। उन्होंने अपनी तलवार संभाली और बेताल को फिर पकड़ने के लिए निर्भय होकर श्मशान की ओर बढ़ चले।

कथा का संदेश

किसी संबंध का निर्णय केवल बड़े दावे अथवा चमत्कारी कार्य से नहीं होता। जीवन देने वाला पिता के समान, अंतिम संस्कार करने वाला पुत्र के समान और सुख-दुःख में अटूट निष्ठा निभाने वाला पति के समान होता है। सच्चा न्याय व्यक्ति के दावे से नहीं, उसके कर्तव्य और आचरण से संबंध की पहचान करता है।

अगले अंक में पढ़िए—बेताल की एक और रोमांचक कथा और वीर विक्रमादित्य का अद्भुत न्याय।