द्वापर युग के महानायक भगवान श्रीकृष्ण का दिव्य प्राकट्य

आलेख-
महामण्डलेश्वर स्वामी अखिलेश्वरानन्द गिरि जी
द्वापरयुग के महानायक भगवान श्रीकृष्ण का जन्म मथुरा में हुआ था, इसलिए उस युग को द्वापर युग के नाम से जाना गया है। श्रीकृष्ण ने अपने जन्मकाल से ही अपने चमत्कारी व्यक्तित्व का परिचय देना आरम्भ कर दिया था।
पहला चमत्कार –
आकाशवाणी-पहला चमत्कार उनके जन्म के पूर्व ही हुआ। तत्कालीन मथुरा का शासक कंस अपनी चचेरी बहन देवकी के विवाह के उपरांत उसकी विदाई की रस्म कर रहा था। वह बड़े धूमधाम से अपनी बहन देवकी और बहनोई वसुदेव को रथ पर बिठाकर विदा कर रहा था, उसी समय आकाश से देववाणी हुई –
“कंस! जिस बहन को तू बड़े हर्ष-उल्लास के साथ विदा कर रहा है, तुझे ज्ञात नहीं है कि इसी बहन का आठवाँ पुत्र ही तेरा वध करेगा।”
इतना सुनते ही कंस ने तलवार निकालकर बहन देवकी का वध करना चाहा। किन्तु नवविवाहित वसुदेव जी ने अपनी शालीनता और विनम्रता का परिचय देते हुए कहा -“प्रिय साले! इसे मत मारो, मैं इसके आठवें बालक को जन्म लेते ही तुम्हें सौंप दूँगा।”
वसुदेव जी सत्यभाषी थे। कंस ने विश्वासपूर्वक बहन देवकी को छोड़ दिया, किन्तु उन्हें सम्मानपूर्वक उनके गृह भेजने के स्थान पर क्रूर कंस ने अपनी बहन-बहनोई को कारागार में डालकर निग्रहीत कर दिया।
कारागार में जन्मलीला
बहन देवकी के गर्भ से क्रमशः छह बालक हुए – वसुदेव उन्हें कंस को सौंप देते और कंस उन्हें पत्थर पर पटक कर उनका वध कर देता।जब आठवें गर्भ में श्रीकृष्ण आये, तो जन्मकाल में अनेक चमत्कार हुए और भगवान श्रीकृष्ण ने अपने माता-पिता को चतुर्भुज रूप में दर्शन दिया। यह भी लीलापुरुषोत्तम का चमत्कार ही है।
उन्होंने पिता वसुदेव जी से कहा – “आप मुझे गोकुल में नंद बाबा के घर छोड़ आइये ताकि मैं सुरक्षित रह सकूँ और वहाँ मैया यशोदा (नंदरानी) के यहाँ जो पुत्री हुई है, उसे उठाकर यहाँ कारागार में ले आइये।
“वसुदेव जी ने वैसा ही किया।
जैसे ही वह कन्या कंस के कारागार में आई, उसने रोना प्रारम्भ कर दिया। कंस को खबर लगी, कंस ने उस कन्या को पत्थर पर पटकना चाहा तो वह कन्या उसके हाथ से छूटकर तेजस्विनी विद्युत के रूप में आकाश में चमक उठी और उद्घोषित करने लगी
“कंस! तेरा वध करने वाला तो गोकुल में, ब्रजमंडल में पहुँच गया है, उसका जन्म हो चुका है।”
यह रही द्वापरयुग के महामानव, ईश्वरीय ऐश्वर्य से सम्पन्न लीलापुरुषोत्तम भगवान श्रीकृष्ण के जन्म की दिव्य कथा, उनके प्राकट्य का चमत्कारी वृत्त।
चमत्कारों से भरा जीवन
इसके बाद छठवें दिन क्रूर स्वभाव वाली दुष्टा पूतना के वध की कथा है। ऐसे अनेक चमत्कारों से श्रीकृष्ण का जीवन-वृत्त भरा हुआ है।
श्रीकृष्ण युगावतार हैं। उनकी बाललीलाएँ मन का हरण करती हैं, इसलिए श्रीकृष्ण का बाल चरित्र अद्भुत व मनोहारी है। वह जीवों के जन्म-जन्मांतर के मानसिक कालुष्य को निर्मल कर देने का सामर्थ्य रखता है।
श्रीकृष्ण के विवाहों के प्रसंग, उनके किशोर वय और प्रौढ़ चरित्र की निर्मल गाथा है। उनका यह जीवन भारतीय संस्कृति, वैदिक परम्पराओं के अनुपालन से एक आदर्श चरित्र प्रस्तुत करता है।
महाभारत युद्ध में कौरव-पांडवों के मध्य उनकी मध्यस्थता, उनकी तटस्थता और राग-द्वेष से परे उनके ईश्वरत्व की पुष्टि तथा निर्लिप्तता का सर्वश्रेष्ठ उदाहरण है। युद्ध रोकना उनकी प्राथमिकता है, किन्तु विधि के विधान को मान्यता प्रदान करना भी उनकी सृष्टि-संचालन की पूर्व-निर्धारित योजना और उनकी लीला का अभिन्न अंग है।श्रीकृष्ण नीति, प्रीति, परमार्थ के मर्मज्ञ हैं और उन्होंने अपनी विभिन्न लीलाओं से यह सिद्ध कर दिया।
चार प्रकार की माया
उनके सौंदर्य, माधुर्य और ऐश्वर्य तथा भगवत्ता से परिपूर्ण दिव्य लीलाएँ और उनकी कीर्तिमय करनी जीव मात्र को सम्मोहित करती हैं। इसी दृष्टि से उनकी प्रकृति (माया) जो उनकी आज्ञा और इच्छा की अनुगामिनी है, वह तीन प्रकार से श्रीकृष्ण के सम्पूर्ण जीवन में चमत्कार का रस घोल देती है। उसे शास्त्रीय भाषा में *स्वजन मोहिनी, सज्जन मोहिनी, दुर्जन मोहिनी माया* कहते हैं।
किन्तु चमत्कार तो यह है जिसे चौथी माया कहते हैं – *”स्वमोहिनी माया”*।
सर्व समर्थ ईश्वर जब तक अपनी भगवत्ता का अपनी स्वमोहिनी माया के माध्यम से विस्मरण नहीं करता, तब तक उसकी जगत-लीला सम्भव ही नहीं है। स्वमोहिनी माया के कारण ही षडैश्वर्य सम्पन्न भगवान जनसामान्य में अपना साधारणीकरण कर लेते हैं, तभी वे लोकप्रियता के चरम का स्पर्श करते हैं और अपने भक्तों का कल्याण करते हैं।

