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धागों का अमर इतिहास: रक्षाबंधन की पौराणिक और ऐतिहासिक लोक गाथाएँ

प्रकाशित: 27 August 2026, 4:37 am

धर्मेन्द्र सुन्देशा

रक्षाबंधन केवल धागों का पर्व नहीं है, बल्कि यह स्नेहातिशय, विश्वास और सुरक्षा के वचन का एक जीवंत अनुष्ठान है। भारत की सांस्कृतिक विविधता में इस पर्व का स्थान अत्यंत अनूठा है, जहाँ यह पौराणिक काल से लेकर ऐतिहासिक युग तक फैली कई लोक कथाओं के माध्यम से जन-मन में बसा हुआ है। इन कथाओं ने रक्षाबंधन को केवल भाई-बहन के प्रेम तक सीमित न रखकर इसे कर्तव्य, धर्म और मानवीय संवेदनशीलता के एक महान प्रतीक के रूप में स्थापित किया है।​

वैदिक और पौराणिक साहित्य में रक्षाबंधन की सबसे प्रसिद्ध कथा इंद्रदेव और उनकी पत्नी शची (अमरावती) से जुड़ी है। कथा के अनुसार, एक बार देवों और असुरों के बीच भीषण युद्ध छिड़ गया, जिसमें असुरराज बलि की सेना देवताओं पर भारी पड़ने लगी। जब देवताओं का पराजय निश्चित प्रतीत होने लगा, तब इंद्रदेव अत्यंत व्याकुल होकर महर्षि बृहस्पति के पास पहुँचे। इंद्र की व्यथा देखकर उनकी पत्नी शची ने एक पवित्र रेशमी धागा तैयार किया और मंत्रोच्चार के साथ उसे राजा इंद्र की कलाई पर बाँध दिया। इस सुरक्षा सूत्र के प्रभाव से इंद्रदेव में असीम ऊर्जा और साहस का संचार हुआ, और उन्होंने असुरों को परास्त कर अपना स्वर्ग का राज्य पुनः प्राप्त किया। यह कथा दर्शाती है कि रक्षासूत्र केवल बहन ही नहीं, बल्कि सुरक्षा और विजय की कामना से कोई भी शुभचिंतक बाँध सकता है।​

पौराणिक संदर्भों में ही एक अन्य अत्यंत लोकप्रिय कथा भगवान विष्णु और राजा बलि की मिलती है। कथा के अनुसार, राजा बलि ने अपने सौ यज्ञ पूरे करके पाताल लोक का अटूट साम्राज्य प्राप्त कर लिया था और भगवान विष्णु से अपने महल में रहने का वरदान माँग लिया। जब विष्णु जी वैकुण्ठ छोड़कर बलि के यहाँ रहने लगे, तब देवी लक्ष्मी अत्यंत दुखी हो गईं। वे एक गरीब स्त्री का रूप धारण करके राजा बलि के पास पहुँचीं और उन्हें रक्षासूत्र बाँधकर अपना भाई बना लिया। जब बलि ने अपनी बहन से उपहार माँगने को कहा, तो देवी लक्ष्मी ने अपने वास्तविक रूप में आकर भगवान विष्णु को वैकुण्ठ वापस लौटाने का वरदान माँग लिया। राजा बलि ने सहर्ष अपनी बहन का वचन पूरा किया। तभी से श्रावण पूर्णिमा को रक्षाबंधन और ‘बलिद्विक’ के रूप में मनाया जाता है।​

महाभारत काल की एक अन्य अत्यंत मार्मिक और भावुक लोक कथा भगवान श्रीकृष्ण और द्रौपदी से जुड़ी है। जब भगवान श्रीकृष्ण ने शिशुपाल का वध करने के लिए अपना सुदर्शन चक्र चलाया, तो उनकी उंगली में गहरी चोट लग गई और रक्त बहने लगा। उपस्थित सभी लोग उपचार की व्यवस्था में लग गए, किंतु द्रौपदी ने बिना एक पल की देरी किए अपनी रेशमी साड़ी का किनारा फाड़कर श्रीकृष्ण की उंगली पर बाँध दिया। इस आत्मीयता और प्रेम से द्रौपदी ने श्रीकृष्ण का हृदय जीत लिया। श्रीकृष्ण ने उसी क्षण द्रौपदी को हर संकट में रक्षा का वचन दिया। आगे चलकर जब कौरवों की सभा में द्रौपदी का चीर हरण हो रहा था, तब श्रीकृष्ण ने उसी वस्त्र के एक-एक धागे का ऋण चुकाते हुए द्रौपदी की साख और सम्मान की रक्षा की थी।​

मध्यकालीन भारतीय इतिहास में भी रक्षाबंधन से जुड़ी एक अत्यंत प्रसिद्ध लोक कथा महारानी कर्णवती और मुगल सम्राट हुमायूँ की है। मेवाड़ की चित्तौड़गढ़ रियासत पर जब गुजरात के शासक बहादुर शाह ने आक्रमण कर दिया, तो असहाय विधवा महारानी कर्णवती ने अपने राज्य की सुरक्षा के लिए मुगल सम्राट हुमायूँ को रक्षासूत्र भेजा। उस दौर में धार्मिक और राजनीतिक मतभेदों के बावजूद, हुमायूँ ने उस राखी के मूल्य को समझा और कर्णवती को अपनी बहन स्वीकार कर अपनी सेना के साथ मेवाड़ की रक्षा के लिए निकल पड़ा। यद्यपि हुमायूँ के पहुँचने तक महारानी ने जौहर कर लिया था, किंतु हुमायूँ ने बहादुर शाह को खदेड़कर महारानी के पुत्र को चित्तौड़ का सिंहासन लौटाया। यह कथा इतिहास में भावात्मक एकता और भाईचारे का अनूठा उदाहरण बनी हुई है।​

ये समस्त पौराणिक और ऐतिहासिक लोक कथाएं इस बात का जीवंत प्रमाण हैं कि भारत में रक्षाबंधन का पर्व केवल एक सामाजिक औपचारिकता या अनुष्ठान नहीं है। यह पर्व निस्वार्थ प्रेम, आत्मसमर्पण, रक्षा के संकल्प और मानवीय संबंधों की पवित्रता का अमर दस्तावेज है, जो युगों-युगों से भारतीय समाज को एक सूत्र में पिरोए हुए है।