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राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ: 101 वर्षों की संकल्प यात्रा, चिंतन, चुनौतियाँ और प्रासंगिकता

प्रकाशित: 27 September 2026, 3:49 am

धर्मेन्द सुन्देशा

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) की स्थापना 27 सितंबर 1925 को नागपुर में विजयादशमी के पर्व पर डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार द्वारा की गई थी। अंग्रेजी कैलेंडर के अनुसार सितंबर 2026 में संगठन ने अपने 101 वर्ष पूरे कर लिए हैं।

स्थापना की पृष्ठभूमि और नामकरण का इतिहास

27 सितंबर 1925 को विजयादशमी के पावन अवसर पर नागपुर के मोहिते बाड़े में डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार द्वारा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की नींव रखी गई थी। स्वतंत्रता संग्राम में सक्रिय भूमिका निभाने के बाद डॉ. हेडगेवार इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि केवल राजनीतिक स्वतंत्रता पाना ही देश की सभी समस्याओं का समाधान नहीं है, बल्कि पराधीनता के मुख्य कारण रहे सामाजिक बिखराव और अनुशासित चरित्र के अभाव को दूर करना अनिवार्य है। अपनी स्थापना के शुरुआती सात महीनों तक इस संगठन का कोई निश्चित नाम या लिखित ढाँचा नहीं था। 17 अप्रैल 1926 को डॉ. हेडगेवार के निवास पर हुई 26 प्रमुख कार्यकर्ताओं की बैठक में ‘भारत उद्धारक मंडल’ और ‘हिंदू स्वयंसेवक संघ’ जैसे विकल्पों पर विचार करने के बाद सर्वसम्मति से ‘राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ’ नाम तय किया गया। इस नामकरण का मूल उद्देश्य किसी व्यक्ति या वर्ग विशेष का संगठन न बनकर संपूर्ण राष्ट्र की सेवा में समर्पित अनुशासित कार्यकर्ताओं का निर्माण करना था।

मूल चिंतन और वैचारिक आधार

संघ का संपूर्ण वैचारिक चिंतन ‘सांस्कृतिक राष्ट्रवाद’, ‘हिंदुत्व’ और ‘व्यक्ति निर्माण’ के सिद्धांतों पर आधारित है। संघ भारत को केवल एक राजनीतिक या भौगोलिक भू-भाग न मानकर एक प्राचीन और जीवंत सांस्कृतिक राष्ट्र स्वीकार करता है। ‘व्यक्ति निर्माण से राष्ट्र निर्माण’ के मूल मंत्र पर चलते हुए संघ ने किसी बड़े राजनीतिक आंदोलन के बजाय ‘दैनिक शाखा’ को अपने काम का मुख्य केंद्र बनाया। शाखा के मैदान में एक घंटे के खेल, योग, समता (परेड) और बौद्धिक चर्चाओं के माध्यम से व्यक्ति में अनुशासन, देशभक्ति, निःस्वार्थ सेवा और भ्रातृभाव के संस्कार सिंचित किए जाते हैं। इसके साथ ही, छुआछूत और जातिगत भेदों से ऊपर उठकर संपूर्ण समाज में ‘सामाजिक समरसता’ स्थापित करना संघ के चिंतन का सबसे प्रमुख लक्ष्य रहा है।

101 वर्षों का ऐतिहासिक सफर और सांगठनिक विस्तार

संघ की एक शताब्दी से अधिक लंबी विकास यात्रा को तीन प्रमुख चरणों में समझा जा सकता है। पहला चरण (1925-1947) संगठन के बुनियादी ढाँचे के निर्माण और शाखा पद्धति के प्रसार का रहा, जिसमें डॉ. हेडगेवार के बाद दूसरे सरसंघचालक श्री गुरुजी (एम. एस. गोलवलकर) ने संगठन को वैचारिक और सांगठनिक मजबूती दी। दूसरा चरण (1947-1980) विभाजन की विभीषिका के दौरान शरणार्थियों की सुरक्षा, युद्ध के समय नागरिक राहत कार्यों और समाज के विविध क्षेत्रों में ‘विद्या भारती’, ‘अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद’ (ABVP), ‘भारतीय मजदूर संघ’ और ‘सेवा भारती’ जैसे अनुषांगिक संगठनों के गठन का रहा। तीसरा चरण (1980 के बाद) राम जन्मभूमि आंदोलन के बाद भारतीय राजनीति, नीति-निर्माण और सामाजिक विमर्श के केंद्र में संघ के विचारों के प्रभाव और उसकी वैश्विक स्वीकार्यता के रूप में उभरा।

अग्निपरीक्षाएँ, विवाद और प्रमुख चुनौतियाँ

अपनी 101 वर्षों की इस यात्रा में संघ को अभूतपूर्व जनसमर्थन के साथ-साथ गंभीर कानूनी, राजनीतिक और सामाजिक चुनौतियों का सामना भी करना पड़ा है। संघ पर इतिहास में तीन बार सरकारी प्रतिबंध लगाए गए—1948 में महात्मा गांधी की हत्या के बाद, 1975 में आपातकाल के दौरान और 1992 में बाबरी ढांचा ढहने के बाद। हालाँकि, तीनों ही बार संघ न्यायालयों और जांच आयोगों से बेदाग होकर बाहर निकला और विशेषकर आपातकाल के दौरान लोकतंत्र की बहाली में इसकी भूमिका ऐतिहासिक मानी गई। इसके अलावा, आलोचकों द्वारा संघ पर अक्सर बहुसंख्यकवादी सोच का पक्षधर होने और समावेशी धर्मनिरपेक्षता से दूरी बनाने के आरोप लगते रहे हैं। वहीं, 21वीं सदी के इस आधुनिक दौर में डिजिटल तकनीक से घिरी युवा पीढ़ी को मैदानी ‘शाखा’ की परंपरा से जोड़े रखना भी संघ के सामने एक निरंतर सांगठनिक चुनौती बना हुआ है।

समय के साथ परिवर्तन और भविष्य का दृष्टिकोण

101 वर्ष पूरे करने के बाद संघ ने अपनी मूल विचारधारा से समझौता किए बिना खुद को आधुनिक परिवेश के अनुसार ढालने के कई प्रयास किए हैं। संगठन ने खाकी हाफ पैंट की अपनी 90 साल पुरानी पारंपरिक पोशाक को बदलकर भूरे रंग की फुल पैंट को अपनाया, वहीं कामकाजी युवाओं को जोड़ने के लिए ‘सप्ताह मिलन’ और ‘आईटी मिलन’ जैसे नए माध्यम शुरू किए हैं। आज संघ के स्वयंसेवक देशभर में शिक्षा, स्वास्थ्य, ग्राम विकास और आपदा प्रबंधन के क्षेत्र में 1 लाख से अधिक सेवा प्रकल्प संचालित कर रहे हैं।

अंततः, शताब्दी पार कर चुकी संघ की यह यात्रा साबित करती है कि भारतीय समाज और राजनीति पर इसके प्रभाव को अनदेखा नहीं किया जा सकता। आने वाले समय में भारत की सांस्कृतिक और भाषाई विविधता को संजोते हुए सर्वसमावेशी राष्ट्र निर्माण में योगदान देना ही संघ की वास्तविक परीक्षा होगी।