भारतीय जीवन शैली में धर्म-अध्यात्म और योग विद्या का अद्भुत समन्वय है। – स्वामी अखिलेश्वरानंद गिरि
जबलपुर,
स्वामी आदिशंकराचार्य चौक स्थित समन्वय सेवा केंद्र के जयनारायण सभागृह में त्रिदिवसीय समन्वय साधना प्रवचन माला (मासिक सत्संग) का आज शुभारम्भ हुआ। सर्वप्रथम देववंदना के समक्ष दीप प्रज्वलन कर सामूहिक प्रार्थना तदुपरान्त महामण्डलेश्वर स्वामी श्री अखिलेश्वरानंद गिरि जी ने अपने आध्यात्मिक प्रवचन में कहा कि -भारतीय धार्मिक मान्य परम्परा के अनुसार धर्म ग्रन्थों में मनुष्य शरीर और मानव जीवन को सर्वश्रेष्ठ जीवन माना गया है, यही कारण है कि भारतीय जीवन शैली में धर्म-अध्यात्म तथा योग विद्या का अद्भुत समन्वय है।
योगाभ्यास एवं अध्यात्म साधना के क्षेत्र में कदम रखने के पूर्व हमें और आपको धार्मिक जगत की प्राथमिक जानकारी होना आवश्यक है। जानकारी के अभाव में योगाभ्यास के क्षेत्र में और आध्यात्मिक साधना की दिशा में अनेक कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। हमारे भारतीय धर्म शास्त्र और पारम्परिक स्मृति ग्रन्थ बहुत स्पष्टता के साथ हमारा-आपका समुचित मार्गदर्शन करते हैं।
श्रीमद्भगवत् गीता में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को सम्बोधित करके कहते हैं –
तद्विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवया।
उपदेक्ष्यन्ति ते ज्ञानं ज्ञानिनस्तत्त्वदर्शिनः ll
योगाभ्यास या अध्यात्म साधना की विधि जानने के लिये सर्वप्रथम साधक को श्रेष्ठ महापुरुषों के पास श्रद्धापूर्वक जाकर उन्हें प्रणाम कर स्वहितकारी साधना विषयक प्रश्न करें, उनसे उपदेश ग्रहण कर ज्ञानार्जन पूर्वक तत्व बोध एवं आत्म बोध प्राप्त करके “साधना विधि” समझना चाहिये। वे तत्वदर्शी महात्मा साधना संबंधी हमारा समुचित मार्गदर्शन करेंगे, तब हमें योगाभ्यास और अध्यात्म साधना के क्रम को धीरे-धीरे बढ़ाते रहना चाहिये।
योग साधक और अध्यात्म साधक को सर्वप्रथम “आत्म संयम” करना आवश्यक है, इंद्रिय नियंत्रण पूर्वक धैर्य के साथ साधक को सफलता मिल जाती है। किसी को सफलता मिली है तो मुझे क्यों नहीं मिल सकती? यह विश्वास साधक के मन में होना चाहिये।


