भगवान बुद्ध का संदेश: सत्य जानते हुए भी मनुष्य क्यों भटकता है?

लेखक: वगताराम चौधरी
एसोसिएट प्रोफेसर, इतिहास
श्री राजेंद्र सूरी कुंदन जैन राजकीय महिला महाविद्यालय, जालौर, राजस्थान
मानव जीवन की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि मनुष्य प्रतिदिन दूसरों को वृद्ध होते और संसार से जाते देखता है, फिर भी स्वयं को स्थायी मानकर धन, पद, प्रतिष्ठा और संग्रह की अंतहीन दौड़ में लगा रहता है। जीवन के अंत में उसे अनुभव होता है कि उसने सुख की खोज तो बहुत की, लेकिन शांति प्राप्त नहीं की। इस मानवीय स्थिति की सबसे स्पष्ट दार्शनिक व्याख्या भगवान बुद्ध के जीवन और विचारों में मिलती है।
भगवान बुद्ध का जन्म ईसा पूर्व छठी–पाँचवीं शताब्दी के आसपास लुंबिनी में शाक्य कुल के राजकुमार सिद्धार्थ गौतम के रूप में हुआ। उनके पिता शुद्धोधन और माता महामाया थीं। परंपरा के अनुसार सिद्धार्थ का प्रारंभिक जीवन राजमहल की सुख-सुविधाओं के बीच बीता। लेकिन वृद्ध व्यक्ति, रोगी, मृतक और संन्यासी को देखने के बाद उनके सामने जीवन का वास्तविक प्रश्न उपस्थित हुआ—यदि यौवन, स्वास्थ्य और जीवन स्थायी नहीं हैं तो मनुष्य का सच्चा सुख किसमें है?
लगभग 29 वर्ष की आयु में सिद्धार्थ ने राजसी जीवन छोड़कर सत्य की खोज प्रारंभ की। कठोर तपस्या के बाद उन्होंने समझा कि न तो असीमित भोग और न ही शरीर को अत्यधिक कष्ट देना मुक्ति का मार्ग है। उन्होंने मध्यम मार्ग अपनाया और बोधगया में पीपल के वृक्ष के नीचे गहन ध्यान के पश्चात बोध प्राप्त किया। इसके बाद वे ‘बुद्ध’ अर्थात जाग्रत कहलाए। उन्होंने सारनाथ में प्रथम उपदेश दिया और लगभग 45 वर्षों तक करुणा, विवेक तथा आत्मानुशासन का संदेश दिया। कुशीनगर में उनका महापरिनिर्वाण हुआ।
बुद्ध ने मानव दुःख का मूल कारण तृष्णा बताया। तृष्णा केवल धन की इच्छा नहीं है; यह सुख, सत्ता, प्रशंसा, संबंध, पहचान और स्थायित्व को पकड़कर रखने की वह मानसिक प्रवृत्ति है, जो परिवर्तनशील संसार से स्थायी संतोष चाहती है। मनुष्य जानता है कि शरीर नश्वर है, संपत्ति यहीं रह जाएगी और परिस्थितियाँ बदलेंगी; फिर भी उसका मन कहता है—“थोड़ा और मिल जाए तो मैं संतुष्ट हो जाऊँगा।” यही भ्रम उसे बार-बार दौड़ाता है।
बुद्ध के अनुसार संसार की प्रत्येक वस्तु अनित्य है। यौवन वृद्धावस्था में, स्वास्थ्य रोग में, मिलन वियोग में और जीवन मृत्यु में परिवर्तित होता है। समस्या परिवर्तन में नहीं, बल्कि परिवर्तनशील वस्तुओं को स्थायी मान लेने में है। मनुष्य मृत्यु को जानता तो है, लेकिन उसे अपने जीवन का जीवंत सत्य नहीं मानता। इसलिए जानकारी होने पर भी उसमें वास्तविक ज्ञान उत्पन्न नहीं होता।
बुद्ध का दर्शन निराशा नहीं, जागरण का दर्शन है। उन्होंने बताया कि दुःख है, उसका कारण है, उसका निरोध संभव है और निरोध का मार्ग भी है। सम्यक दृष्टि, सम्यक संकल्प, सम्यक वाणी, सम्यक कर्म, सम्यक आजीविका, सम्यक प्रयास, सम्यक स्मृति और सम्यक समाधि—यह अष्टांगिक मार्ग ज्ञान को व्यवहार में उतारने की प्रक्रिया है।
बुद्ध का संदेश आज भी उतना ही प्रासंगिक है—मनुष्य को सत्य की कमी नहीं है; उसके जीवन में सजगता की कमी है। वास्तविक विकास अधिक संग्रह करने में नहीं, बल्कि तृष्णा को समझने, अहंकार को शांत करने और करुणा तथा विवेक के साथ जीने में है। मृत्यु को याद रखना जीवन से भागना नहीं, बल्कि प्रत्येक दिन को सही ढंग से जीना सीखना है।
