बाबा रामदेवजी : रूणीचा धाम विशेष (अंक – 4)
चौथा अंक
मक्का के पाँच पीर: कटोरों का पर्चा और ‘रामसा पीर’ की अमर पहचान
बाबा रामदेवजी की महिमा का सबसे विलक्षण पक्ष यह है कि उनके सामने हिंदू श्रद्धालु ‘बाबा रामदेवजी’ कहकर धोक लगाते हैं और मुस्लिम श्रद्धालु ‘रामसा पीर’ कहकर सिर झुकाते हैं। राजस्थान पर्यटन विभाग उन्हें सभी धर्मों में पूजनीय और हिंदू-मुस्लिम एकता का प्रतीक बताता है।
उनके ‘रामसा पीर’ कहलाने के पीछे मक्का से आए पाँच पीरों की अत्यंत लोकप्रिय लोककथा है। यह कथा सदियों से भजनों, पड़, ब्यावलों और जागरणों के माध्यम से सुनाई जाती रही है।
पाँच पीरों का रूणीचा आगमन

लोकमान्यता के अनुसार बाबा रामदेवजी की ख्याति दूर-दूर तक फैलने लगी। जब उनकी सिद्धि और पर्चों की चर्चा मक्का तक पहुँची तो पाँच पीर उनकी परीक्षा लेने रूणीचा आए।
बाबा ने अतिथि मानकर उनका स्वागत किया। भोजन का समय हुआ तो बाबा ने उन्हें भोजन ग्रहण करने का आग्रह किया। पाँचों पीरों ने कहा कि वे अपने विशेष पात्रों—कटोरों अथवा ‘सीपियों’—में ही भोजन करते हैं और वे पात्र मक्का में रह गए हैं।
कथा के अनुसार बाबा ने विनम्रता से कहा कि घर आए अतिथि को भोजन कराए बिना विदा करना उनकी परंपरा नहीं है। उन्होंने अपनी शक्ति का स्मरण किया और कुछ ही क्षणों में पाँचों पीरों के पात्र उनके सामने उपस्थित हो गए। प्रत्येक पीर का पात्र उसी के सामने रखा मिला।
राजस्थान सरकार के बाबा रामदेवजी पैनोरमा में इस कथा को ‘मक्का के पाँच पीरों को चमत्कार दिखाना’ शीर्षक से प्रस्तुत किया गया है। पैनोरमा के विवरण में दातूनों के पीपल वृक्ष बनने और भोजन के पात्र मक्का से आने, दोनों प्रसंगों का उल्लेख है।
पाँचों पीर बाबा की शक्ति और आतिथ्य से इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने उन्हें ‘पीरों का पीर’ स्वीकार किया। इसी लोकविश्वास से रामदेवजी के लिए ‘रामसा पीर’ और ‘रामापीर’ जैसे संबोधन लोकप्रिय हुए।
कथा का अर्थ चमत्कार से कहीं बड़ा
कटोरों का हवा में मक्का से रूणीचा पहुँचना धार्मिक लोककथा है; इसे प्रमाणित ऐतिहासिक घटना के रूप में प्रस्तुत नहीं किया जा सकता। लेकिन इस कथा का संदेश अत्यंत गहरा है।
बाबा ने पाँच पीरों को पराजित शत्रु नहीं बनाया। उन्होंने उन्हें अतिथि बनाया, भोजन कराया और सम्मान दिया। दूसरी ओर पाँच पीरों ने सत्य का अनुभव होने पर अपने पूर्वाग्रह त्याग दिए। यह कथा बताती है कि धार्मिक संवाद का श्रेष्ठ मार्ग विवाद नहीं, आतिथ्य और परस्पर सम्मान है।
यहाँ चमत्कार कटोरों का आना भर नहीं है। बड़ा चमत्कार दो अलग परंपराओं का एक थाली के सामने बैठना है।
पंच पीपली की स्मृति
रामदेवरा से जुड़ी परंपरा में ‘पंच पीपली’ का उल्लेख पाँच पीरों के प्रसंग से किया जाता है। श्रद्धालु इसे उस संवाद और पर्चे की स्मृति मानते हैं। कथा के अलग-अलग संस्करण मिलते हैं; कहीं केवल कटोरों का उल्लेख है, तो कहीं पीरों द्वारा दातून रोपने और उनके पीपल बनने की बात भी आती है।
लोककथाओं में इस प्रकार के अंतर स्वाभाविक हैं। कथा गायक और क्षेत्र बदलने के साथ शब्द बदल सकते हैं, लेकिन मूल संदेश बना रहता है—सत्य, विनम्रता और सद्भाव।
बाबा के दरबार में धर्म नहीं पूछा जाता
रामदेवरा में आने वाले श्रद्धालुओं के पूजा-रूप अलग हो सकते हैं। कोई प्रसाद, नारियल और नेजा अर्पित करता है, कोई चादर चढ़ाता है, कोई घोड़े की प्रतिकृति और कोई केवल मौन प्रार्थना। लेकिन समाधि के सामने पहुँचकर सभी की भाषा एक हो जाती है—श्रद्धा।
राजस्थान के शैक्षिक पाठ्यस्रोतों में भी रामसा पीर को राजस्थान के पाँच प्रतिष्ठित पीरों में विशेष स्थान दिया गया है।
बाबा की ख्याति राजस्थान से निकलकर गुजरात, मध्य प्रदेश, पंजाब, हरियाणा, दिल्ली, महाराष्ट्र और सिंध तक पहुँची। गुजरात में ‘रामापीर’ की भक्ति विशेष रूप से दिखाई देती है। विभिन्न समुदायों ने बाबा की कथा को अपनी भाषा और संगीत में अपनाया।
लोककहावत का भाव
जनमानस में बाबा के दरबार के लिए एक भाव प्रचलित है—
“रामसा पीर रा द्वार, सब रो एक अधिकार।”
यहाँ इसे किसी प्राचीन लिखित कहावत का दावा न मानकर बाबा की समतामूलक लोकपरंपरा की अभिव्यक्ति समझना चाहिए।
भजन में एकता
जागरणों में बाबा को कभी ‘रूणीचा रा धणी’ और कभी ‘रामसा पीर’ पुकारा जाता है। नाम बदलता है, श्रद्धा नहीं। एक छोटा भजन-स्मरण है—
“खम्मा रे खम्मा, म्हारा रामसा पीर।”
इन शब्दों में न कोई विवाद है, न श्रेष्ठता की होड़। केवल प्रणाम है।
पाँच पीरों का आज के लिए संदेश
आज जब धर्म के नाम पर दूरी बढ़ाने वाली आवाजें सुनाई देती हैं, पाँच पीरों की कथा हमें रूणीचा की ओर देखने को कहती है। बाबा का घर वह स्थान है जहाँ परीक्षा लेने आया व्यक्ति भी सम्मानित अतिथि बनता है।
यदि हम बाबा को रामसा पीर कहते हैं, तो हमें उनके सद्भाव को भी स्वीकार करना होगा। केवल समाधि पर धोक लगाकर लौटना पर्याप्त नहीं; दूसरे धर्म के व्यक्ति के सम्मान और सुरक्षा की रक्षा करना भी बाबा के प्रति सच्ची श्रद्धा है।
भक्ति-संदेश: बाबा के दरबार की सबसे बड़ी मर्यादा यह है कि वहाँ मनुष्य पहले है और उसकी धार्मिक पहचान बाद में। जिस दिन हमारे गाँव, मोहल्ले और समाज में भी यह भाव उतर जाएगा, पाँच पीरों का पर्चा फिर जीवित हो उठेगा।
अगले अंक में :- (डालीबाई की भक्ति: जिसे समाज ने पीछे रखा, बाबा ने अपने पास स्थान दिया)
